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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 320 में से

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पृष्ठ 66

२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
भवतीति शेषः। काम्यं कर्म न कर्त्तव्यमित्यर्थः। काम्यं कर्म न कर्त्तव्यमिति
वक्तव्ये फलं त्यक्त्वा कर्त्तव्यमिति कथनात् काम्यानामपि कर्मणामीश्वरार्पण-
बुद्ध्या अनुष्ठानं कर्त्तव्यमिति ज्ञायते।।२२।।
'फल का त्याग कर कर्म करना चाहिये' यह सूत्र का सार अर्थ है। जहाँ
तक फल का प्रश्न है, इसके कृत्रिम फल साधन धर्म, अर्थ और काम हैं।
फल का तात्पर्य फलविषयक इच्छा ही है। इस फलाकाङ्क्षा का परित्याग कर
विहित कर्म का करना उत्तम होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि, काम्य
कर्म नहीं करना चाहिये। सूत्र में यही कहना चाहिये था। उसके स्थान पर फल
का त्याग कर करना चाहिये, यह कथन यह निर्दिष्ट करता है कि, ईश्वरार्पण
बुद्धि से काम्य कर्म सम्पादित करना चाहिये।।२२।।
एकादशं धर्ममाह
अनित्यकर्मलोपः ।।२३।।
नित्यं च तत्कर्म च नित्यकर्म, स्नानसन्ध्यापूजादि। तस्य लोपः
अननुष्ठानं नित्यकर्मलोपः। न विद्यते नित्यकर्मलोपो यस्मिन्नुपासके स
अनित्यकर्मलोपो भवेदिति शेषः। नित्यकर्म अवश्यंकर्त्तव्यमित्यर्थः। नित्य-
कर्म कर्त्तव्यमिति वक्तव्ये व्यतिरेकमुखेन कथनं, त्यागे न केवलं क्रतुवैगुण्यम्,
प्रत्यवायो निरयश्चेति ज्ञापयति।।२३।।
नित्य और कर्म दो शब्दों का समवायगत अर्थप्रद यह नित्यकर्म शब्द है।
स्नान, संध्या और पूजा आदि नित्यकर्म माने जाते हैं। इनका अनुष्ठान नियमित
होना चाहिये। अनुष्ठान का लोप अर्थात् अननुष्ठान ही नित्यकर्म लोप माना जाता
है। नित्यकर्म लोप जिस उपासक का नहीं होता है, वह अनित्यकर्मलोप उपासक
होता है। अर्थात् उपासक का यह धर्म है कि, वह नित्यकर्म अवश्य करे। नित्य-
कर्म करना चाहिये, वस्तुतः सूत्र में यही कहना चाहिये था किन्तु सूत्रकार ने
व्यतिरेक शैली का आश्रय लिया है। इससे यह सूचित होता है कि, नित्यकर्म
के त्याग से न केवल कर्म-वैगुण्य होता है, नरक की भी प्राप्ति सम्भव है।।२३।।
ननु नित्यकर्म-साधनीभूत-मपञ्चकालाभे कथं कार्यमित्याशङ्कायामाह
मपञ्चकालाभेऽपि नित्यक्रमप्रत्यवमृष्टिः ।।२४।।