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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 320 में से

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पृष्ठ 63

दीक्षाविधिः २१
द्वेषजनितो गुणिनि दोषारोपः। अविहितहिंसा, रागेण भक्षणार्थं पश्वादिवधः।
स्तेयं, पराननुमत्या परद्रव्यहरणम्, लोकविद्विष्टं, मातृबुद्ध्याऽपि एकान्ते
परस्त्रीसंलापादि। एतेषां वर्जनं त्यागः कर्त्तव्य इति शेषः॥१९॥
वैषयिकी इच्छा को काम कहते हैं। 'मुझे यह वस्तु मिल जाय' इस विषय
सम्बन्धी इच्छा को काम मानते हैं। क्रोध में तामसिकता का उद्रेक होता है।
यह अन्तःकरण का धर्म है। द्रव्य में अधिकारी का स्वत्व होता है। इस स्वत्व
के त्याग के साथ द्रव्य दूसरे को साधिकार देना दान है किन्तु इसका प्रतिबन्धक
आत्यन्तिक अनुराग पूर्व लिप्सा ही लोभ है। मोह में कार्य और अकार्य का
विचार नहीं होता क्योंकि इसमें चेतना अपना काम नहीं कर पाती। मद
मूर्खतापूर्ण गर्व होता है। मात्सर्य में द्वेषभाव से अच्छे पुरुष में दोष दिखायी
पड़ने लगते हैं। हिंसा दो प्रकार की होती है— १. विहित और २. अविहित।
वैदिकी हिंसा विहित मानी जाती है। मांस खाने की तामसी इच्छा से पशुवध
अविहित हिंसा मानी जाती है। स्तेय विना स्वामी की अनुमति के उसका द्रव्य-
हरण करना कहलाता है। यद्यपि ये सारी क्रियायें और आचरण लोकविरुद्ध हैं,
फिर भी कुछ ऐसे कार्य होते हैं, जो प्रत्यक्षतः लोकविद्वेष के कारण बन जाते
हैं। जैसे मातृ-भावन अपनाकर दूसरी स्त्री से एकान्त में बातें करना आदि। इन
सब का वर्जन आवश्यक है।
भगवान् परशुराम श्रीविद्या के उपासक को आदर्श चरित पुरुष के रूप में
देखना चाहते हैं। यह आशा स्वाभाविक है कि, उपासक सर्वगुणसम्पन्न हो। यह
भी सच्चाई है कि, इन दुर्गुणों का त्याग सामान्य स्तर के व्यक्ति के लिये असम्भव
है। इस सूत्र में जिस पुरुष का प्रकल्पन किया गया है, वह साधना के सोपानों
को पार कर पारमेश्वर शक्तिपात का अधिकारी हो जाता है। केवल कथन से यह
सम्भव नहीं। आयास-साध्य उपासकधर्म अपनाना आवश्यव है॥१९॥
अष्टमं धर्ममाह
एकगुरूपास्तिरसंशयः॥२०॥
न विद्यते संशयो यत्रेति विग्रहेण असंशय इत्येकगुरूपास्ति-
विशेषणम्, भिन्नलिङ्गत्वमार्षम्।