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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 320 में से

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पृष्ठ 49

दीक्षाविधिः ७
सूक्ष्माकाशरूप शब्द सत्ताइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म वायुरूप स्पर्श अट्ठाइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म तेजरूप रूप उन्तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म जलरूप रस तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म पृथ्वीरूप गन्ध इकतीसवाँ तत्त्व है।
स्थूल अवकाशात्मक आकाश बत्तीसवाँ तत्त्व है।
सदागतिशीलता-गुणशाली वायु तैंतीसवाँ तत्त्व है।
उष्णतागुणशाली तेज चौंतीसवाँ तत्त्व है।
द्रवत्वगुणशाली तत्त्व जल पैंतीसवाँ तत्त्व है।
काठिन्यगुणवती पृथ्वी अन्तिम छत्तीसवाँ तत्त्व है।
इन छत्तीस तत्त्वों का संघात ही विश्व है। व्यवहार में इसे ही जगत् कहते
हैं। शास्त्रों में इसके अनन्त प्रमाण उपलब्ध हैं।।४।।
शरीरकञ्चुकितः शिवो जीवो निष्कञ्चुकः परशिवः।।५।।
एवं षट्त्रिंशत्तत्त्वानामपि सामान्यरूपेण पुनर्द्विस्वभावत्वम्-केषुचित् केवलं
दृश्यत्वम्, केषुचित् केवलं द्रष्टृत्वम्। आद्यं जडेषु। द्वितीयं केवलमिति।
ननु जीवस्य तत्त्वान्तःपातित्वात् परशिवस्यातथात्वाद् द्वयोर्भेद
आयातः। सर्वस्वतन्त्रः परशिवः स्वस्य मायया दुर्घटया स्वनिष्ठं यदन्यानपेक्ष-
त्त्वरूपं पूर्णं स्वातन्त्र्यं तदाच्छादयति। ततस्तिरोहितं यत् स्वातन्त्र्यं परिमितं
तदाणवमलमुच्यते। आणवमलमेव अविद्येत्यप्युच्यते।
एवमाणवेन मलेन छन्नः, तदा स्वयमणुदेहपरिमितः सन् अन्यान्
देहपरिमितान् अनन्तान् जीवान् स्वभिन्नत्वेन पश्यति। तन्मायिकं मलम्। एवं
भेदप्रथारूपमायिकमलेन मलिनाः शुभाशुभकर्म अनुतिष्ठन्तस्तज्जनित-
संस्कारवन्तो भवन्ति। तदेतत् कार्मं मलम्। एतादृशत्रिविधमलं शरीर-
पदेनोच्यते। तद्रूपं यत् कञ्चुकम् आच्छादनं तेन आवृतः शिव एव जीवः।
एतादृश-कञ्चुकरहितो यः स तत्त्वातीतः परशिव इत्यर्थः।।५।।