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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 320 में से

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पृष्ठ 61

दीक्षाविधिः १९
जहाँ तक विद्या शब्दार्थ का प्रश्न है, यह अपने उपास्य इष्ट देवता के
वाचक मन्त्र के लिये ही प्रयुक्त है। इसी इष्टमन्त्र की जिसे गुरुमन्त्र भी कहते
हैं, उसकी अनुसंहति होनी चाहिये। 'अनुसंहति' शब्द अनुसन्धान अर्थ में प्रयुक्त
है। अनुसन्धान मन्त्रों में प्रतिष्ठित दिव्य रहस्यार्थों का ही किया जाता है।
अनुसंहति शब्द का एक अन्य अर्थ भी लगाया जा सकता है। वस्तुतत्व
का अनुसन्धान सदा मानसिक होता है। अतः सदा अनुसंहति शब्द मानस जप
की ओर संकेत करता हुआ प्रतीत होता है, आसन आदि नियमों से रहित जप
नहीं हो सकता, इस प्रकार की आशङ्का मानस जप में नहीं करनी चाहिये।
परमानन्दतन्त्र में स्पष्ट लिखा हुआ है कि,
“मानस जप का अनन्तगुना फल होता है। इसमें किसी प्रकार के नियम
की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह चलते-फिरते सोते-जागते, उठते-बैठते,
खाते-पीते किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। इसमें स्नान भी आवश्यक
नहीं होता। कभी अपवित्रता का अवसर भले आ जाय, उसमें भी इसे करना
चाहिये।”
इस सूत्र में प्रयुक्त सदा, विद्या और अनुसंहति शब्द अपने वैशिष्ट्य का
पूरा ख्यापन कर रहे हैं।।१७।।
षष्ठं धर्ममाह
सततं शिवतासमावेशः ।।१८।।
'सततम्' अस्याप्यर्थः पूर्वसूत्रस्थ-सदा-शब्दवत्। शिवतायाः समावेशः
आविर्भावः कर्त्तव्य इति शेषः। नित्यकर्मानुष्ठानव्यतिरिक्तकाले शिवोऽहमस्मीति
भावयेद् इति तात्पर्यम्।
वस्तुतस्तु पूर्वधर्मेण सहायं विकल्प्यते। अन्यथा उभयोर्भावनयो-
र्युगपत्सम्पादनासम्भवात्। पूजादि-व्यतिरिक्तकाले अन्यतरस्यानुष्ठानमिति भावः।
यद्वा— पूर्वधर्मो मन्दाधिकारिणः। अयं मुख्याधिकारिणः।।१८।।
पूर्वसूत्र 'सदा विद्यानुसंहतिः' में सदा शब्द जिस अर्थ को अभिव्यक्त कर
रहा है, उसी अर्थ में इस सूत्र में प्रयुक्त 'सतत' शब्द का भी व्यवहार किया
गया है। शिवतासमावेश में षष्ठी तत्पुरुष है। शिव का धर्मानुगुण्य ही शिवत्व