परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० परशुरामकल्पसूत्रम्
है। उसका समावेश अर्थात् आविर्भाव। शिवत्व का अविर्भाव करना चाहिये।
नित्यकर्मों का अनुष्ठान करने के बाद यह भावन करना चाहिये कि, 'मैं स्वयं
शिव हूँ'। इस सूत्र का यही तात्पर्य है।
वास्तविकता यह है कि, शिवत्व का भावन एक वैकल्पिक कर्त्तव्य है।
पहले नित्य कर्म का विकल्प। पुनः शिवत्व भावन का विकल्प। दोनों भावों
का युगपद् सम्पादन असम्भव है। पूजादि के बाद इसका अनुष्ठान ही होना
चाहिये।
इसका एक अन्य अर्थ भी विचारणीय है। पूर्वधर्म मन्द अधिकारी का
धर्म है और यह मुख्य अधिकारी का धर्म है।
वस्तुतः मेरे विचार से इस सूत्र का ऊपर प्रतिपादित अर्थ आगमिक
परम्परा के पूर्णतः प्रतिकूल है। समावेश भावना नहीं एक दशा है। भावन में
भावना अर्थात् मानस अनुसन्धान होता है। समावेश अकिञ्चित् चिन्तन की
निर्विकल्प दशा की रूढि है। समावेश में गुरु द्वारा कृत शक्तिपातजन्य प्रतिबोध
का उल्लास करना नहीं पड़ता, वरन् वह स्वयं स्पन्दमान रहता है। इसका सतत
शब्दार्थ पूर्वसूत्रवत् नहीं है। इसके सातत्य का अर्थ उस दशा से शाश्वत अप्रच्याव
है। शिवता समावेश का षष्ठ्यर्थ सप्तम्यर्थ गर्भ है। पहले अणु था। पार्थक्य
प्रथा से प्रथित था। अब वह स्वयं शिव है। शिवत्व से शिवत्व में समाहित
है। तत्त्वेन प्रवेष्टुं प्रयत्नशील नहीं है, वरन् समा चुका है। वह शिव हो चुका
है। यह समावेश दशा है। शिवतासमावेश शाम्भव समावेश है। यह श्रीचक्र
साधक का सर्वातिशायी धर्म है। इसका मुख्याधिकारी वाला विकल्प आगमिकता
के अनुकूल है।।१८।।
सप्तममाह
काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्याविहित-हिंसा-स्तेय-
लोक-विद्विष्टवर्जनम्।।१९।।
कामो वैषयिकी इच्छा। इदं मे भूयादित्याकारिका क्रोधस्तमस उद्रेकेण
जनितोऽसौ अन्तःकरणधर्मः। लोभो द्रव्यादिनिष्ठस्वत्वत्यागप्रतिबन्ध-
कोऽत्यन्तमनुरागविशेषः। मोहः, कार्याकार्याविचारणम्। मदो गर्वः। मात्सर्यं