परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाविधिः १७
श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं— “कर्म में आसक्त अज्ञ पुरुषों में बुद्धि-
भेद नहीं उत्पन्न करना चाहिये।”
भगवती श्रुति भी यही निर्देश देती है कि, लोक अर्थात् लोगों या लोक-
प्रचलित मान्यताओं की निन्दा नहीं करनी चाहिये।।१४।।
तृतीयं धर्ममाह
अगणनं कस्यापि ।।१५।।
स्वशास्त्रविरुद्धं यदि गीर्वाणगुरुर्वदेत्तर्हि स गुरुरिति गणनं न कर्तव्यम्।
अत एव श्रुतिरपि—“न गणयेत् कमपि” इति।।१५।।
स्वात्म स्वीकृत दर्शन, उपासना अथ च शास्त्र के प्रति आस्था की दृढता
को यह सूत्र कट्टरता तक ले जाने का आदेश दे रहा है। यह कहता है कि,
हमारे दर्शन, हमारी उपासना पद्धति, हमारे सम्प्रदाय और शास्त्र के सामने सारी
मान्यतायें नगण्य हैं। हमारे शास्त्र के विरुद्ध यदि देवगुरु बृहस्पति भी कुछ
कहते हैं, तो हम उसे मानने के लिये तैयार नहीं। स्वात्मोपासना पद्धति के
विरुद्ध प्रतिवाद करने वाला कथमपि गुरु नहीं कहा जा सकता। यह हमारा दृढ
सिद्धान्त है।।१५।।
चतुर्थमाह
सच्छिष्ये रहस्यकथनम् ।।१६।।
कर्तव्यमिति शेषः। परिसंख्याविधिरियम्। ‘आत्मरहस्यं न वदेत्’ इति
निषेधस्यापवादोऽयम्। न तु गुप्त्याऽर्चनं इत्यस्यापवादः। तथा सति
शिष्यातिरिक्तेषु (सामयिकेषु) (पूजाप्राकट्यानापत्तेः। अतः इदम्)।
आत्मरहस्यं स्वसिद्धान्तरूपं सामयिकेषु शिष्यभिन्नेषु न कथयेत्। सच्छिष्ये
कथयेदित्यर्थः ।।१६।।
योग्य शिष्य यदि सम्प्रदाय निकष पर खरा उतर रहा हो, तो उसे
सम्प्रदाय-सिद्ध रहस्य का बोध कराने के उद्देश्य से गोपनीय बातों का भी उसको
बताना आवश्यक माना जाता है। सूत्र का यह विधान परिसंख्या विधि के
अनुसार किया गया है। परिसंख्या विधि मीमांसा दर्शन स्वीकृत विधि है। जब