सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

दीक्षाविधिः ९
भगवता श्रीकृष्णेन—'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते' (श्री.भ.
७।१४)। भगवत्प्रीतिश्च भगवदाराधनेनैव भवति। अतो भगवदाराधनं
परम्परया मोक्षसाधनम्॥६॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर के स्वरूप कथन के अनन्तर पुरुषार्थ क्या
होता है, इसका निर्देश कर रहे हैं कि,
स्वात्म का विमर्श ही पुरुषार्थ है।
अपने परशिवरूप का विमर्श अत्यन्त आवश्यक है। इसे प्रत्यभिज्ञान
कहते हैं। माया के प्रतीप आत्माभिमुख्यपूर्वक विमर्श से सोऽहम् अर्थात् मैं
परशिव हूँ, इस तरह का दृढ़ ज्ञान उत्पन्न होता है। इसे ही प्रत्यभिज्ञान कहते
हैं। विस्मृत ज्ञान का पुनः उपलब्ध करना ही पुरुषार्थ है।
जैसे गले का स्वर्णाभूषण वस्त्र से ढक जाय। उसे इधर-उधर खोजा जाने
लगे। किसी प्रबुद्ध दर्शक द्वारा निर्देश देने पर गले में है, यह ज्ञान हो जाय,
तो प्रसन्नता होती है। उसी तरह स्वात्मज्ञान उपलब्ध हो जाने पर परमपुरुषार्थ
की सिद्धि हो जाती है। ऐसा पुरुषार्थ-लाभ भगवत्कृपा के विना नहीं हो सकता।
इसी तथ्य को श्रीमद्भगवद्गीता (७।१४) द्वारा भगवान् कृष्ण कहते हैं कि, 'जो
मेरी शरण में आ जाते हैं, मेरी प्रपत्ति प्राप्त कर लेते हैं। वे ही इस दुस्तर
माया को पार कर पाते हैं।'
यह सत्य है कि, भगवत्प्रीति भगवान् की आराधना से ही होती है।
इसीलिये यह माना जाता है कि, भगवान् की आराधना परम्परा से मोक्ष-साधन
सिद्ध होती है॥६॥
वर्णात्मका नित्या शब्दाः॥७॥
वर्णात्मका वर्णसमुदायरूपाः शब्दा मन्त्रा नित्याः। मूलविद्या समसत्ताका
इत्यर्थः॥७॥
शब्द वर्णात्मक होते हैं। वर्णात्मकता का तात्पर्य वर्णसमुदायरूपात्मकता
से है। वर्णसमुदाय रूप शब्द ही मन्त्र होते हैं। ये नित्य होते हैं। मूल अविद्या
की समान-सत्ता वाले ये मन्त्र यद्यपि नित्य हैं फिर भी अज्ञान की निवृत्ति हो
जाने पर स्वात्मातिरिक्त किसी अन्य देवता के अनस्तित्व के कारण ज्ञानी के