परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
अयं भावः—अनेकगुरूपास्तौ पूर्वगुरूक्तविरुद्धं यदि वदेत् तर्हि संशयो
भवेदेव।
एकगुरूपास्तौ न संशयो भवेत्। अत एकगुरूपास्तिः कार्येति भावः।
गुरूपास्तेः 'सम्प्रदायविश्वासाभ्याम्' इति पूर्वसूत्रेणैव प्राप्तौ पुनर्विधानम्
एकं गुरुमाश्रित्य न गुर्वन्तरमाश्रयेद् इति इतरगुर्वाश्रयनिवृत्तिफलकेयं
परिसंख्या॥२०॥
असंशय शब्द का अर्थ करते समय नञ् समास का अभाव अर्थ और
संशय इन दोनों का साथ विचार करना चाहिये। इस आधार पर कहा जा सकता
है कि, जहाँ संशय का अभाव हो, उसे असंशय कहते हैं। पूरे सूत्र का इस
सन्दर्भ में अर्थ होता है— एक गुरु की उपासना संशयरहित होनी चाहिये।
असंशय शब्द में पुंलिङ्ग प्रयोग और उपास्ति का स्त्रीलिङ्ग प्रयोग आर्ष प्रयोग
है। इस तरह असंशय शब्द उपास्ति का विशेषण सिद्ध हो जाता है।
गुरु शब्द से यहाँ दीक्षागुरु अभिप्रेत है। गुरु ज्ञान के प्रकाश से शिष्य
के जीवन को धन्य बना देता है। ऐसे गुरु की असंशय उपासना शिष्य का
परमकर्त्तव्य है। अनेक गुरु नहीं हो सकते। 'ज्ञानवान् गुरुरिष्यते' के अनुसार गुरु
ज्ञानवान् होना ही चाहिये। अनेक गुरुओं की उपासना से व्यवहार खण्डित हो
जाता है। पहले गुरु के वचन के विरुद्ध कुछ कहने पर संशय उत्पन्न होना
स्वाभाविक है। वहीं एक ज्ञानवान् गुरु के तपःपूत व्यक्तित्व और उनकी दीक्षा
के लाभ से अभिभूत शिष्य के मन में शङ्का के लिये कोई स्थान नहीं होता।
इसलिये गुरु एक ही होना चाहिये और उसी में श्रद्धा और आस्था की दृढ़ता
अपनानी चाहिये। पहले आये हुए सूत्र—'सम्प्रदायविश्वासाभ्याम्' में सम्प्रदाय
शब्द सम्यक् रूप से गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान प्रकर्ष के उत्तरदायित्व के नियमों को
व्यक्त करता है। शिष्य उन नियमों का विश्वासपूर्वक पालन करता है। गुरु की
उपासना के ये दो मूलभूत तत्त्व हैं— १. सम्प्रदाय और २. विश्वास। इस सूत्र
से भी एक गुरु की उपासना संकेतित हो रही है। फिर भी इस सूत्र द्वारा पुनः
एक गुरूपासना का विधान एक गुरु का त्याग कर गुर्वन्तर आश्रय का बलपूर्वक
निषेध करने के लिये किया गया है। गुर्वन्तरोपास्तिनिवृत्तिफलक यह सिद्धान्तनिष्ठ
विधान है। इसमें संशयवाद और तर्क के लिये कोई स्थान नहीं रह गया है॥२०॥