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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

सप्तदशाध्यायानुबन्धः
विभूषणञ्चाक्षरसंहतिश्च¹ शोभाभिमानौ गुणकीर्तनञ्च ।
प्रोत्साहनाेदाइरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशयः सहेतुः ॥ १ ॥
सारूप्य-मिथ्याध्यवसायसिद्धि-पदोच्चयाक्रन्दमनोरथाश्च ।
²आख्यानयाश्चाप्रतिषेधपृच्छादृष्टान्तनिर्भासनसंशयाश्च³ ॥ २ ॥
आशीः प्रियोक्तिः⁴ कपटः क्षमा च प्राप्तिश्च पश्चात्तपनं तथैव ।
अथानुवृत्तिर्ह्युपपत्तियुक्ती ⁵कार्योऽनुनीतिः परिदेवनञ्च ॥ ३ ॥
षट्त्रिंशदेतानि तु⁶ लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसम्मितानि ।
काव्येषु ⁷भावार्थगतानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि यथारसं⁸ तु ॥ ४ ॥
दृश्य काव्य के अङ्गभूत छत्तीस लक्षण¹ होते हैं। जिनके नाम इस
प्रकार हैं—( १ ) विभूषण, ( २ ) अक्षरसंघात, ( ३ ) शोभा, ( ४ ) अभि-
मान, ( ५ ) गुणकीर्तन, ( ६ ) प्रोत्साहना, ( ७ ) उदाहरण, ( ८ ) निरुक्त,
( ९ ) गुणानुवाद, ( १० ) अतिशय, ( ११ ) हेतु, ( १२ ) सारूप्य,
( १३ ) मिथ्याध्यवसाय, ( १४ ) सिद्धि, ( १५ ) पदोच्चय, ( १६ ) आक्रन्द,
( १७ ) मनोरथ, ( १८ ) आख्यान, ( १९ ) याञ्चा, ( २० ) प्रतिषेध,
१. दो भिन्न पाठों में पठित लक्षणों के क्रम में यहाँ अनुबन्धरूप में प्रदत्त
इस पाठ को आचार्य अभिनव गुप्त ने अपनी परम्परा में समागत पाठ
स्वीकृत करते हुए मुख्य माना है । आचार्य पाद ने ही दूसरे पाठ की
भी व्याख्या की तथा इस पाठ की भी व्याख्या की तथा इस पाठ को भी
उद्देश कथन के रूप में भरतमुनि सम्बद्ध भी बतलाया । इस प्रकार दो
पाठों में विभक्त लक्षणों के स्वरूप को लेकर भोज आदि ने चौसठ काव्य
लक्षण निरूपित किये । इन सभी लक्षणों का सोदाहरण विवेचन
'परिशिष्ट' में ही उचित मानकर यहाँ केवल अर्थमात्र ही देकर हम
सन्तोष कर रहे हैं । ( सम्पा० व्याख्या० )
१. चाक्षरसङ्गतिश्च—ख०; चाक्षरसंहितञ्च—ग० ।
२. आख्यानवादाः—ख० । ३. दृष्टाङ्ग—ख० ।
४. प्रियं वै कपटं क्षमा च—ग० । ५. कार्यानुनीती—ग० ।
६. मया समासात्—क० । ७. सोदाहरणेषु—क० ।
८. यथारसानि—क० ।

३१४ नाट्यशास्त्रम्
( २१ ) पृच्छा, ( २२ ) दृष्टान्त, ( २३ ) निर्भासन, ( २४ ) संशय,
( २५ ) आशीः, ( २६ ) प्रियोक्ति, ( २७ ) कपट, ( २८ ) क्षमा,
( २९ ) प्राप्ति, ( ३० ) पश्चात्तापः, ( ३१ ) अनुवृत्ति, ( ३२ ) उपपत्ति,
( ३३ ) युक्ति, ( ३४ ) कार्य, ( ३५ ) अनुनीति या अनुनय तथा
( ३६ ) परिदेवन ॥ १-४ ॥
विभूषण—
अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिर्यदलङ्कृतम् ।
भूषणैरिव विन्यस्तैस्तद्विभूषणमिति स्मृतम् ॥ ५ ॥
जो रचना अनेक अलङ्कार तथा गुणों से अलंकृत होने के कारण
अलंकार से सजाए गए व्यक्ति की तरह सुशोभित होने लगे तो विविध
अर्थगुण सूचक ऐसे लक्षण को 'विभूषण' समझना चाहिए ॥ ५ ॥
अक्षरसंघात—
'१यत्राल्पैरक्षरैः श्लिष्टैर्विचित्रार्थोपवर्णनम्२ ।
३तदप्यक्षरसङ्घातं विद्याल्लक्षणसंज्ञितम् ॥ ६ ॥
जहाँ थोड़े अक्षरों के प्रयोग से श्लेषगत वैशिष्ट्य के कारण विविध एवं
वैचित्र्य सम्पन्न अर्थ की अभिव्यक्ति होती हो तो उसे 'अक्षरसंघात'२ नामक
लक्षण समझना चाहिए ॥ ६ ॥
शोभा—
सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ४ह्यसिद्धोऽर्थः प्रसाध्यते ।
यत्र ५श्लक्ष्णा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिसंज्ञिता६ ॥ ७ ॥
यदि असिद्ध या अज्ञातार्थ की सिद्ध या ज्ञात रूप में उद्धृत करते हुए
श्लेष के कारण नवीन या मनोहारि स्थिति में अर्थाभिव्यक्ति होती हो ऐसे
लक्षण को 'शोभा'३ समझना चाहिए ॥ ७ ॥
१. 'विभूषण' का पर्याय अन्य पाठ में 'भूषण' दिया है ।
२. 'अक्षरसंघात' दोनों पाठों में समान प्राप्त होता है ।
३. 'शोभा' का लक्षण भी दोनों पाठों में समान है ।
१. यत्रार्थैः—क० ।
२. विचित्रैरुपवर्णितम्—क०; विचित्रमुपवर्ण्यते—ग० ।
३ तमप्यक्षर—ग० । ४. यत्रासिद्धं—क० ।
५. श्लिष्टा—क०; श्लक्ष्णविचित्रार्थाः—ख०, ग० ।
६. त्यभिधीयते—ख०; ग० ।

सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१५
अभिमान—
धार्यमाणस्तु¹ बहुभिर्वचनैः कार्ययुक्तिभिः ।
न² यः पर्यवतिष्ठेत सोऽभिमानस्तु संज्ञितः³ ॥ ८ ॥
जब कोई पुरुष अनेक कथनों, कार्यों तथा युक्तियों के द्वारा समझाने
पर भी उसे नहीं समझ पाता या सन्तुष्ट न होता हो तो ऐसे लक्षण को
'अभिमान'¹ समझना चाहिए ॥ ८ ॥
गुणकीर्तन—
कीर्त्यमानैर्गुणैर्यत्र विविधार्थसमुद्भवैः ।
दोषा⁴ न परिकथ्यन्ते तज्ज्ञेयं गुणकीर्तनम् ॥ ९ ॥
जब एक व्यक्ति के अनेक गुणों को—विविध उद्देश्यों से उद्भूत अर्थों में
बतलाने के समय—दोषों का उद्घाटन न किया जाए तो ऐसी रचना को
'गुणकीर्तन'² समझना चाहिए ॥ ९ ॥
प्रोत्साहन—
उत्साहजननैः स्पष्टैरथैरौपम्यसंश्रयैः ।
प्रसिद्धैरुपगूढञ्च⁵ ज्ञेयं प्रोत्साहनं बुधैः ॥ १० ॥
जहाँ औपम्य का आश्रय या अन्वेषण करते हुए उत्साहवर्द्धक एवं
सुस्पष्ट अर्थ के द्वारा प्रसिद्ध व्यक्तित्व का वर्णन किया जाए तो ऐसे लक्षण को
'प्रोत्साहन'³ समझना चाहिए ॥ १० ॥
उदाहरण—
यत्रैकस्यापि⁶ शब्दस्य दर्शनात् सुबहून्यपि ।
यान्ति सिद्धिमनुक्तानि⁷ तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ११ ॥
१. 'अभिमान' के समान लक्षण होने पर अन्य पाठ में 'सारूप्य' ( इसके
स्थान पर ) प्राप्त होता है ।
२. 'गुणकीर्तन' दोनों पाठों में गृहीत है किन्तु दोनों में ( इसके ) लक्षण
भिन्न है ।
३. प्रोत्साहन के स्थान पर अन्य पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति प्राप्त
होता है ।
१. वार्यमाणस्तु—ख०; ग० । २. नार्यो यन्नानुतिष्ठन्ति—क० ।
३. भिमानः प्रकीर्तितः—क० । ४. दोषांशान् परिकल्प्यन्ते—क० ।
५. रुपगूढन्तु—क० । ६. यत्रैकस्यैव—क० ।
७. मनुक्तादि—ख०; ग० ।

३१६ नाट्यशास्त्रम्
जब किसी एक शब्द के उच्चारित होते ही अनेक अकथित या
असंकेतित अर्थों की भी सूचना प्राप्त होने लगे तो उसे ‘उदाहरण’¹ समझना
चाहिए ॥ ११ ॥
निरुक्त—
निरुक्तं द्विविधं प्रोक्तं ¹तथ्यञ्चातथ्यमेव च ।
²सिद्धिपूर्वं भवेत्तथ्यमतथ्यञ्चाप्रसाधितम्³ ॥ १२ ॥
निरुक्त के दो प्रभेद हैं—( १ ) तथ्य तथा ( २ ) अतथ्य । इनमें जो
अच्छी तरह से प्रसिद्ध या ज्ञात हो उसे ‘तथ्य’ तथा जो किसी प्रकार इसके
विपरीत हो या अच्छी तरह से प्रसिद्ध न हो उसे ‘अतथ्य’ नामक निरुक्त²
समझना चाहिए ॥ १२ ॥
गुणानुवाद—
⁴गुणानुवादो हीनानामुत्तमैरुपमाकृतः ।
जब किसी हीन विषय की उत्तम विषय से तुलना की जाए तो ऐसे
कथन वाले लक्षण को ‘गुणानुवाद’³ समझना चाहिए ।
अतिशय—
⁵उत्तमार्थाद्विशिष्टो यः स चाप्यतिशयः स्मृतः ॥ १३ ॥
जब किसी उत्तम पदार्थ से तुलना करने पर भी किसी का ( उक्त अर्थ
से भी ) अधिक वैशिष्ट प्रतीत होने लगे तो ऐसे लक्षण को ‘अतिशय’⁴
समझना चाहिए ॥ १३ ॥
हेतु—
बहूनां ⁶भाषमाणानां ⁷त्वेकस्यार्थविनिर्णयम् ।
सिद्धोपमानवचनं हेतुरित्यभिसंज्ञितः ॥ १४ ॥
१. उदाहरण का नाम दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण भिन्न हैं ।
२. अन्य पाठ में निरुक्त के दो विभेदों का उल्लेख नहीं है ।
३. ‘गुणानुवाद’ का अन्य पाठ में ‘गुणातिपात’ अभिधान मिलता है ।
४. यह लक्षण पूर्व पाठ के ‘अतिशय’ के लक्षण का पूरक लक्षण होकर थोड़ी
भिन्नता रखता है । ‘अतिशय’ का दोनों पाठों में सन्निवेश मिलता है ।
१. वातथ्य—ख०; ग० । २. सिद्धि प्रसाधितं तथ्य—क० ।
३. चाप्यसाधकम्—क० । ४. गुणाभिवादो—क० ।
५. उत्तमार्थ विशिष्टो—क०; उत्तमार्थविशेषो—ख०; ग० ।
६. भाष्यमाणानां—ख०; ग० ।
७. अनेकार्थविनिश्चयः—क०; अनेकार्थविनिर्णयात्—ग० ।

सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१७
अनेक व्यक्तियों के कथन को सुनकर किसी एक असाधारण अर्थ का
प्रमाण पुरस्सर वचन के आधार पर निश्चय करना 'हेतु' कहलाता है ॥१४॥
सारूप्य—
१अपदेशस्तु परोक्षो यस्मादुत्पद्यतेऽनुकरणेन ।
लक्षणसमानकरणात्२ सारूप्यं तत्तु विज्ञेयम्३ ॥ १५ ॥
किसी तथ्य को न जानकर यदि अनुकरण के अनुसार आधार लेकर
लक्षण की आलोचना करते हुए सप्रमाण वस्तु का स्थापन किया जाए तो
उसे 'सारूप्य'२ समझना चाहिए ॥ १५ ॥
मिथ्याध्यवसाय—
४अभूतपूर्वैर्यात्रार्थैस्तत्तुल्यार्थस्य निर्णयः ।
स मिथ्याध्यवसायस्तु प्रोच्यते काव्यलक्षणम्५ ॥ १६ ॥
जहाँ किन्हीं अतथ्यभूत या अनृत अर्थों के द्वारा उसी के समान असत्
वस्तु का वक्तृत्वपूर्ण पदावली में निर्धारण या विनिश्चय किया जाता हो तो
उसे 'मिथ्याध्यवसाय'३ नामक काव्य लक्षण समझना चाहिए ॥ १६ ॥
सिद्धि—
बहूनाञ्च प्रधानानां ६मध्ये यन्नाम कीर्त्यते ।
७एकार्थसाधनकृतं सा सिद्धिरिति कीर्तिता ॥ १७ ॥
अनेक प्रसिद्ध या प्रमुख व्यक्ति या पदार्थों के बीच यदि एक अप्रसिद्ध
नाम का अभिधान उसके असाधारणत्व के निदर्शनार्थ निविष्ट किया जाता
है तो उसे 'सिद्धि'४ समझना चाहिए ॥ १७ ॥
१. हेतु का सन्निवेश दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण दोनों भिन्न हैं ।
२. सारूप्य के स्थान पर अन्य पाठ में दिष्ट या दृष्ट को रखा गया है ।
३. मिथ्याध्यवसाय के स्थान पर अन्य पाठ में 'विपर्यय' मिलता है ।
४. सिद्धि' का लक्षण दोनों पाठों में मिलता है परन्तु लक्षणों में थोड़ा विभेद
प्राप्त होता है ।
१. अपदेशेन परोक्षो योऽर्थो ह्युत्पद्यते—क० ।
२. योगात्—क० । ३. निर्द्दिश्यम्—क० ।
४. अभूतपूर्वे यत्रार्थे तुल्यस्यार्थस्य निर्णयः—ख०; ग० ।
५. लक्षणे—ख० ।
६. नाम यत्राभिकीर्त्यते—क० ।
७. अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं—क० ।

३१८ नाट्यशास्त्रम्
पदोच्चय—
गुणैर्बहुभिरेकार्थैः पदैर्यः सम्प्रशस्यते ।
पदोच्चयन्तु तं विद्यान्नानार्थग्रथितार्थकम्¹ ॥ १८ ॥
एक ही पदार्थ को निदर्शित करने वाले अनेक शब्द या वचनों के द्वारा
जब किसी वस्तु की प्रशंसा की जाए तो अनेक अर्थों या वचनों द्वारा
इष्ट वस्तु को स्वरूप प्रदान करने वाले ऐसे लक्षण को 'पदोच्चय' समझना
चाहिए ॥ १८ ॥
आक्रन्द—
आत्मभावमुपन्यस्य² परसादृश्ययुक्तिभिः ।
तीव्रार्थभाषणं यत् स्यादाक्रन्दः स तु कीर्तितः ॥ १९ ॥
अन्य पुरुष के सम्मुख जब सादृश्य या समानता को दर्शाने वाली युक्तियों
से अपने अभीष्ट अप्रत्यक्ष अभिप्राय को प्रमुखतः स्पष्ट कथन (के) द्वारा
स्वभावाविष्करण करते हुए रखा जाए तो वह 'आक्रन्द'² कहलाता है ॥ १९ ॥
मनोरथ—
हृदयस्थस्य भावस्य ³सुश्लिष्टार्थप्रदर्शकम् ।
⁴अन्यापदेशकथनैर्मनोरथ इति स्मृतः ॥ २० ॥
जब किसी गूढ़ मनोगत भाव को अन्य वस्तु के कथन के व्याज के द्वारा
बतलाया जाए तो ऐसी सुनियोजित वाक्यावली को 'मनोरथ'³ समझना
चाहिए ॥ २० ॥
आख्यान—
⁵पृष्टैरपृष्टैरथवा निर्णयः क्रियते तु यः ।
आख्यानमिति तज्ज्ञेयं लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ २१ ॥
१. 'पदोच्चय' का नाम तथा लक्षण दोनों पाठों में मिलता है ।
२. 'आक्रन्द' के स्थान पर अन्य पाठ में 'तुल्यतर्क' रखा गया है ।
३. 'मनोरथ' का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है ।
१. ग्रथनात्मकम्—क; मथनात्मकम्—ख०; कथनात्मकम्—ग० ।
२. भावेष्वपत्यस्य—ख०; ग० ।
३. सुस्पष्टार्थप्रदर्शकम्—ख०; ग० ।
४. कथनं—ख०; ग० ।
५. अपृष्टैरथवा पृष्टै—ख०; ग० ।

सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१९
जब प्रश्नपूर्वक या बिना किसी प्रश्न या पूछताछ के ही किसी बात का
निश्चय किया जाए तो उसे 'आख्यान'१ समझना चाहिए ॥ २१ ॥
याच्ञा—
आदौ १यत् क्रोधजनन मन्ते हर्षप्रवर्धनम् ।
यत्र२ प्रियं पुनर्वाक्यं सा याच्ञा परिकीर्तिता ॥ २२ ॥
जिस वचन को हितकर समझ कर आरम्भ में कहने पर क्रोध की तथा
अन्त में हर्ष की उत्पत्ति हो तथा जो प्रियजन को (उनकी ही भलाई के
लिये) कहा जाता हो तो ऐसा कथन 'याच्ञा'२ कहलाता है ॥ २२ ॥
प्रतिषेध—
कार्येषु विपरीतेषु यदि ३किञ्चित्प्रवर्तते ।
निवार्यते च कार्यज्ञैः प्रतिषेधः प्रकीर्तितः ॥ २३ ॥
यदि कोई विपरीत कार्य में प्रवृत्त हो या किसी की निषिद्ध कार्य में
प्रवृत्ति को देखकर उसे कार्यज्ञ या अनुभवी पुरुष उस कार्य से निवृत्त होने
या हटने का उपदेश देता हो तो ऐसा कथन 'प्रतिषेध'३ कहलाता है ॥२३॥
पृच्छा—
यत्राकारोद्भवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम् ।
४पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता ॥ २४ ॥
१. 'आख्यान' के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रसिद्धि' प्राप्त होता है।
२. 'याच्ञा' के स्थान पर अन्य पाठ में 'दाक्षिण्य' प्राप्त होता है। याच्ञा
का अन्य लक्षण भी प्राप्त होता है। जैसे :—
लाभोपपत्तिमाख्याय स्वयं दूतमुखेन वा ।
प्रार्थ्यते यत्र कन्या या सा याञ्चेत्यभिधीयते ॥
अर्थात् स्वयं या दूत के द्वारा लाभ की उपलब्धि या संभावना को दर्शाते हुए
जब किसी कन्या की प्रार्थना की जाए तो उसे 'याच्ञा' कहते हैं। अन्य
विद्वानों का मत है कि केवल कन्या मात्र की याचना करने से यह
याचना के एक पार्श्व की ही सूचक होगी। कुछ अन्य इसे प्रियवचन से
मेल खाने के कारण 'प्रियोक्ति' नामक लक्षण के स्थान पर मानते हैं।
३. 'प्रतिषेध' के स्थान पर अन्य पाठ में 'लेश' रखा गया है।
१. च क्रोधजं नित्यं—क० । २. यत्तु—ख० ; ग० ।
३. कश्चित्—ख० ; ग० । ४. पृच्छत्यभिनयेनार्थं—ख० ; ग० ।

३२० नाट्यशास्त्रम्
जब किन्हीं गूढ़ अभिप्रायों को संकेतित करने वाले वाक्यों के द्वारा
अन्य व्यक्ति या स्वयं को ही पूछते हुए जब किसी तथ्य या अर्थ का कथन
किया जाए तो उसे 'पृच्छा'¹ समझना चाहिए ॥ २४ ॥
दृष्टान्त—
विद्वान्¹ पूर्वोपलब्धौ यत् समत्त्वमुपपादयेत् ।
निदर्शनकृतस्तज्ज्ञैः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥ २५ ॥
जब कोई विद्वान् व्यक्ति किसी पदार्थ की समता को अपनी पूर्व उपलब्ध
वस्तु के साथ तुलना करते हुए स्थापित करे या बतलावे तो उसे 'दृष्टान्त'²
नामक लक्षण समझना चाहिए ॥ २५ ॥
निर्भासन—
अनेकयुक्तिमद्वाक्यमनेकार्थप्रसाधकम्² ।
³अनेकवाक्यसंयुक्तं⁴ तन्निर्भासनमुच्यते ॥ २६ ॥
जो कथन अनेक युक्तियों से युक्त, अनेक वाक्यों से भरा हुआ एवं
अनेक उद्देश्य या प्रयोजन का साधक होता है तो उसे 'निर्भासन'³ समझना
चाहिए ॥ २६ ॥
संशय—
अपरिज्ञाततत्त्वार्थं यत्र वाक्यं समाप्यते ।
⁵सोऽनेकत्वाद्धिचाराणां संशयः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
जब वाक्य की समाप्ति किसी तथ्य या तात्त्विक अर्थ को जाने बिना ही
१. 'पृच्छा' का दोनों पाठों में समान रूप से सन्निवेश है ।
२. 'दृष्टान्त' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भिन्न हैं ।
३. निर्भास या निर्भासन के स्थान पर अन्य पाठ में 'माला' मिलता है ।
१. विद्वन् पूर्वो—क०; सिद्धं पूर्वोपलब्धो यः—ख०; ग० ।
२. मनेकप्रकृतिस्थितम्—क० ।
३. वचनैर्युक्तं—क० ।
४. मासनं नाम तद्भवेत् —ख०, ग० ।
५. अनेकत्वाद्धि—ख०; ग० । क ( भ० ) पुस्तके तु संशयस्य लक्षणं
भिद्यते—तद्यथा—“परप्रशंसावचनं प्रयुक्तं योऽभ्यसूयते ।
पूर्वोत्तराथैर्व्याघातः संशयः स तु कीर्तितः ॥” इति ।

सप्तदशोऽध्यायः ३२१
हो जाए तो अनेक विचारों के द्वारा प्रयुक्त ऐसे कथन को 'संशय' समझना
चाहिए ॥ २७ ॥
आशीः—
यथा¹ शास्त्रार्थसम्पन्नां² मनोरथसमुद्भवम्³ ।
अप्रार्थनीयामन्यां⁴ वा विदुस्तामाशिषं बुधाः ॥ २८ ॥
जब किसी नीति या शास्त्र के अनुसार मनोऽनुकूल भावना से उद्भूत
बिना किसी प्रार्थना के करने पर जो आशीर्वाद दिया जाता हो तो उसे
विद्वज्जन 'आशीः'² नामक लक्षण कहते हैं ॥ २८ ॥
प्रियवचन—
आदौ यत् क्रोधजनन मन्ते हर्षप्रवर्धनम् ।
तत् प्रियं वचनं ज्ञेयमाशीर्वादसमन्वितम् ॥ २९ ॥
जो आरम्भ में क्रोध को और अन्त में हर्ष को उत्पन्न करते हुए किसी
आशीर्वाद की सूचना देता हो तो ऐसा कथन 'प्रियवचन'³ (या प्रियोक्ति)
कहलाता है ॥ २९ ॥
कपटसंघात—
⁵छलयुक्त्या त्वन्येषामभिसन्धानाभिभावकं कपटम् ।
द्वित्रिप्रयोगयुक्तौ विज्ञेयः कपटसङ्घातः ॥ ३० ॥
१. 'संशय' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भी समान है । इसके
अतिरिक्त 'भ' पाठ के अनुसार—
परप्रशंसावचनं प्रयुक्तं योऽभ्यसूयते ।
पूर्वोत्तराभ्याघातः संशयः स तु कीर्तितः ॥
(अन्य पुरुष की प्रशंसा में कहे गये कथन को सुनकर जिसके मन में असूया
उत्पन्न हो तथा पूर्व कथन से उत्तर कथन का इसी कारण जब विरोध होने लगे
तो इसे 'संशय' समझना चाहिए ।)
२. 'आशीः' के स्थान पर अन्य पाठ में 'निदर्शन' मिलता है ।
३. प्रियवचन या प्रियोक्ति के स्थान पर अन्य पाठ में 'अंश' प्राप्त
होता है ।
१. यदा—क०; यत्र—ग० । २. सम्पन्नं—क० ।
३. समुद्भवम्—क० । ४. नीयमन्यं वा—क० ।
५. छलयुक्त्या यदान्येषां मत्वा नायकभावनम् ।
द्वित्रिप्रयोगयुक्तेन ज्ञेयं कपटसंज्ञितम् ॥—क० ।
२१ ना० शा० द्वि०

३२२ नाट्यशास्त्रम्
जब एक साथ किसी को छलने या भ्रम उत्पन्न करने के लिये दो या
तीन बार कपट प्रयोग का सहारा लेते हुए कथन किया जाए तो ऐसी उक्ति
को 'कपटसंघात'१ समझना चाहिए ॥ ३० ॥
क्षमा—
दुर्जनोदाहृतै रूक्षैः सतां१ मध्येऽभिताडितः२ ।
अक्रोधः क्रोधजननैर्वाक्यैर्यैः सा क्षमा भवेत् ॥ ३१ ॥
जब किन्हीं दुष्ट पुरुषों के द्वारा सज्जनों के समक्ष सभा में अभिहित
उत्तेजक एवं क्रोध के उत्पन्न करने वाले वचनों से अभिभूत होने पर भी जो
व्यक्ति शान्त एवं क्रोधहीन दशा में स्थित हो तो ऐसे गुण को 'क्षमा'२
समझना चाहिए ॥ ३१ ॥
प्राप्ति—
दृष्ट्वावयवं३ किञ्चिद्भावो४ यत्रानुमीयते ।
प्राप्तिं५ तामभिजानीयाल्लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ ३२ ॥
जब (किन्ही) चेष्टाओं को देखकर ही किसी के मनोगत भाव को जान
लिया जाए उसे उत्तम नाटकों में स्थित 'प्राप्ति'३ नामक लक्षण समझना
चाहिए ॥ ३२ ॥
१. 'कपट' या 'कपटसंघात' के स्थान पर अन्य पाठ में 'गर्हण' मिलता है ।
भोज ने कपट का लक्षण इस प्रकार दिया है—
अदिव्यं दिव्यमपि वा कृत्वा रूपविपर्ययम् ।
अविद्वान् वञ्च्यते येन कपटं तदुदाहृतम् ॥
अर्थात् जब किसी दिव्य या अदिव्य वेश को धारण कर अपने रूप में
परिवर्तन के द्वारा किसी साधारण मनुष्य (अविद्वान्) को धोखा दिया जाता हो
तो यह कार्य 'कपट' कहलाता है ।
२. क्षमा के स्थान पर अन्य पाठ में 'विशेषण' मिलता है ।
३. 'प्राप्ति' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भी समान हैं ।
१. सतां मध्ये—क० । २. तिताडितः—ख०; ग० ।
३. दृष्ट्वावयवं—ख०; दृष्टैर्वावयवैः—ग० ।
४. यत्रोपनीयते—क०; यत्रोपमीयते—ख०; ग० ।
५. तामपि—ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३२३
पश्चात्ताप—अकार्यं सहसा कृत्वाऽकृत्वा कार्यमथापि वा ।
सन्तापो मनसो यस्तु पश्चात्तापः १प्रकीर्तितः ॥ ३३ ॥
किसी अविचारित या असत् कार्य को या किसी कार्य को (पूर्ण) करने के
बाद या न करने के बाद जो मानसिक ताप होता हो तो ऐसी दशा में होने
वाले कथन को 'पश्चात्ताप'१ कहते हैं ॥ ३३ ॥
अनुवृत्ति—
प्रश्रयेणार्थसंयुक्तं यत् परस्यानुवर्तनम् ।
स्नेहाद्दाक्षिण्ययोगाद्वा सानुवृत्तिस्तु संज्ञिता ॥ ३४ ॥
जब किसी व्यक्ति के कथन का सौजन्यवश, प्रेम या पक्षपात के कारण
अनुसरण या समर्थन किया जाता है तो उसे 'अनुवृत्ति'२ कहते हैं ॥ ३४ ॥
उपपत्ति—
प्राप्तानां२ यत्र दोषाणां क्रियते शमनं पुनः ।
सा३ ज्ञेया ह्युपपत्तिस्तु लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ ३५ ॥
असत् या अवास्तविक दोषों के उपस्थित होने पर उनका उचित रूप
से जब उपपत्तिपूर्वक निराकरण किया जाता है तो ऐसा कथन 'उपपत्ति'३
कहलाता है, जिसका नाटकों में प्रयोग होता है ॥ ३५ ॥
युक्ति—साध्यते योऽर्थसम्बन्धो४ महद्भिः समवायतः ।
परस्परानुकूल्येन सा युक्तिः परिकीर्तिता ॥ ३६ ॥
जिस विचार की समानता एवं परस्पर अनुकूलता के आधार पर
उत्कृष्टता के साथ प्रतिपादन या सिद्धि की जाए तो ऐसा कथन 'युक्ति'४
कहलाता है ॥ ३६ ॥
कार्य—५यत्रापसारयन् दोषं गुणमर्थेन योजयेत् ।
६गुणाभिवादं दोषाद्वा कार्यं ७तल्लक्षणं विदुः ॥ ३७ ॥
१. 'पश्चात्ताप' के स्थान पर अन्य पाठ में 'विचार' मिलता है ।
२. 'अनुवृत्ति' के स्थान पर 'अनुनय' मिलता है ।
३. 'उपपत्ति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'उपदिष्ट' मिलता है ।
४. 'युक्ति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अभिप्राय' मिलता है ।
१. स उच्यते—क० । २. प्रोक्तानां—क० । ३. ज्ञेया सा—क० ।
४. सन्तानो—क० । ५. यत्र सङ्कीर्तयन्—क० ।
६. गुणकीर्तिते हि दोष—क०; गुणातिवादो दोषाद्वा—ख०; ग० ।
७. तदिह कीर्तितम्—ख०; तदिह संज्ञितम्—ग० ।

३२४ नाट्यशास्त्रम्
जब किसी पदार्थ या व्यक्ति के गुण को दोष अथवा दोष को गुण में
परिणत करते हुए उपपादित किया जाता है तो ऐसा कथन 'कार्य'१
कहलाता है ॥ ३७ ॥
अनुनीति—
१अपूर्वक्रोधजनितमपराधं प्रमृज्य२ यत् ।
सेवार्थं मधुरं वाक्यं ३साऽनुनीतिः प्रकीर्तिता ॥ ३८ ॥
क्रोधवश किसी के एक अपराध को बिसार कर जब प्रेमवश या सेवा
भावना से प्रेरित होकर मधुर वचन का उच्चारण किया जाता है तो ऐसे
कथन को 'अनुनीति'२ कहते हैं ॥ ३८ ॥
परिदेवन—
४दोषैर्यदन्यनामोक्तैः प्रसिद्धार्थैः५ प्रयोजितम्६ ।
अन्यत्रार्थेन ७सम्बद्धं ज्ञेयं तत् परिदेवनम्८ ॥ ३९ ॥
दूसरों के नाम पर उच्चारित दोषों की प्रसिद्ध बातों द्वारा प्रयुक्त वचनों
को या गुणों का आधार लेकर जब अन्यत्र सम्बद्ध किया जाए या उसे
अन्यथा प्रतिपादित किया जाए तो मिथ्यादोष के उपपादन से पूर्ण ऐसे
कथन को 'परिदेवन'३ कहते हैं ॥ ३९ ॥
इति सप्तदशाध्यायानुबन्धः समाप्तः ।
१. 'कार्य' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अर्थापत्ति' मिलता है ।
२. 'अनुनीति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुनय' मिलता है । आचार्य
अभिनव गुप्त ने इसके स्थान पर 'प्रसिद्धि' को भी निर्देशित किया है ।
३. 'परिदेवन' के स्थान पर 'क्षोभ' को अन्य पाठ में रखा गया है
तथा 'अनुक्तिसिद्धि' को भी । भोज ने इसे परिवादन तथा सर्वेश्वर ने
परिवेदन माना है। शारदातनय ने परिवाद का संक्षिप्त लक्षण करते
हुए 'परिवादो मृषादोषः' अर्थात् मिथ्यादोष के उपपादन को 'परिवाद'
बतलाया है ।
१. अपूर्वक्षोभ—क० । २. प्रमार्जयेत्—ख०; ग० ।
३. मनुनीतिः—ख०; ग० । ४. यद्दोषैरन्य—ख०; ग० ।
५. प्रसिद्धार्थंप्रयोजनम्—क० । ६. प्रयोजयेत्—ख०; ग० ।
७. सम्बन्धो—ख०; ग० । ८. परिवादनम्—क० ।

अष्टादशोऽध्यायः
भाषाविधानाध्यायः
प्राकृत-पाठ्य-लक्षण—
एवन्तु¹ संस्कृतं पाठ्यं मया प्रोक्तं समासतः² ।
प्राकृतस्य³ तु पाठ्यस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १ ॥
इस प्रकार (पूर्व अध्याय में) मैंने संक्षेप में संस्कृत-पाठ्य¹ के विषय में
बतलाया। अब मैं प्राकृत-पाठ्य का लक्षण कहता हूँ ॥ १ ॥
एतदेव विपर्यस्तं संस्कारगुणवर्जितम् ।
विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नानावस्थान्तरात्मकम् ॥ २ ॥
यही संस्कृतपाठ्य जब संस्कार के गुणों से हीन होकर परिवर्तित
१. पिछले दो अध्यायों में वाचिक अभिनय के निरूपण के प्रसंग में संस्कृत
तथा प्राकृतपाठ्य का उल्लेख किया जा चुका है। इनमें संस्कृतपाठ्य के
सन्दर्भ में विविध छन्दों का लक्षणपूर्वक निरूपण पिछले अध्याय में होने
पर भी प्राकृत पाठ्य का स्वरूप शेष ही रह जाता है। अतएव इस
अध्याय में प्राकृत-पाठ्य का स्वरूप निरूपण आवश्यक होने के कारण
इसकी पूर्व अध्याय से संगति (स्थापित होती) है। 'पाठ्य' का अर्थ
है जो विशेषतापूर्वक पढ़ा या कहा जाए या प्रयत्नपूर्वक पढ़े जाने या
कहे जाने के जो योग्य हो अथवा जो किसी विशेष रूप में या विशेष
विधि के द्वारा उच्चारित हो, क्योंकि आन्तरिक चित्तवृत्ति के अनुरूप
जब किसी वचन का उच्चारण उपयुक्तता किये हुए होता है तभी उसे
पाठ्यसंज्ञा प्राप्त होती है जिसकी आचार्य द्वारा विधिवत् शिक्षा दी जाए
और ऐसा शिक्षित होकर किया हुआ उच्चारण ही 'पाठ्य' कहलाता भी
है। आचार्य अभिनवगुप्त ने पाठ्य शब्द के यही तीन प्रकार के निर्वचन
प्रस्तुत किये हैं। (द्र० अभि० भा०—पठनाहं, पठितुं शक्यम् आचार्य-
यत्नेन वा पठनीयमिति पाठ्यम् ।)
१ पाठ्यन्तु संस्कृतं विप्राः; एतत्तु—क० ।
२. द्विजोत्तमाः—ग० । ३. प्राकृतस्यापि—क० ।

३२६ | नाट्यशास्त्रम्

स्वरूप वाला हो जाता है तो 'प्राकृतपाठ्य' कहलाता है । विभिन्न दशाओं
के कारण परिवर्तित होने वाला इसका अपना विशेष स्वरूप होता है ॥ २ ॥
प्राकृतपाठ्य के तीन प्रकार—
त्रिविधं तच्च¹ विज्ञेयं नाट्ययोगे² समासतः ।
समानशब्दं ³विभ्रष्टं देशीगतमथापि च ॥ ३ ॥
नाट्य प्रदर्शन (या रचना) में होने वाला यह प्राकृतपाठ्य तीन प्रकार
का होता है। यथा—(१) समानशब्दों या तत्सम से होने वाला
(२) विभ्रष्ट या तद्भव शब्दों से होने वाला तथा (३) देशी शब्दों से
होने वाला¹। ३ ॥
[ ⁴पाठ्यमेकन्तु विज्ञेयं संस्कृतं प्राकृतं तथा । ]
⁵कमलामलरेणुतरङ्गोलोलसलिलादिवाक्यसम्पन्नम्⁶ ।
प्राकृतबन्धेष्वेवं⁷ ⁸संस्कृतमपि⁹ योगमुपयाति ॥ ४ ॥
संस्कृत के समान प्राकृत में भी कमल, अमल, रेणु, तरंग, लोल, सलिल
आदि समान शब्दों से निर्मित वाक्यों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात्
ये समान रूप से प्रयुक्त होने से तत्सम शब्द हैं जिनका दोनों भाषाओं में
अपने वाक्यों में नियमित प्रयोग किया जाता है ॥ ४ ॥
ये वर्णाः ¹⁰संयोगस्वरवर्णान्यत्वमूनताञ्चापि¹¹ ।
¹²यान्त्यपदादौ प्रायो विभ्रष्टाँस्तान् विदुर्विप्राः ॥ ५ ॥
जो शब्द स्वर या वर्ण के परिवर्तन के कारण पदों या वाक्यों के साथ
१. समानशब्द, विभ्रष्ट तथा देशीगत को परवर्ती व्याकरण तथा नाट्य के
आचार्यों ने तत्सम, तद्भव ओर देशी शब्द से अभिहित किया ।
१. तद्धि—क० । २. नाट्ययोगं—क० ।
३. शब्दैर्बिनष्टं—क०, शब्दैर्विभ्रष्टं—ख० ।
४. इदं श्लोकार्धं ख० ग० पु० नास्ति ।
५. कमलदलरेणुकेसरतरङ्गसलिलादि—क० ।
६. लोलजालादि, लोलसलीलादि—क० । ७. ष्बेतत्—क० ।
८. संयुक्तमपि, संस्कृतमिव—क० ।
९. मिव प्रयोगमुपयाति—ग० ।
१०. संयुक्ताः—क०; ख०; संयोगात्—ग० ।
११. न्यूनतां वापि—ग० ।
१२. गच्छन्ति पदन्यस्तास्ते विभ्रष्टा इति ज्ञेयाः—ख०; ग० ।

प्रयोगार्थ सम्बद्ध किये जाने पर अपने समवेत स्वरूप को परिवर्तित कर
लेते हों तो उन्हें विभ्रष्ट या अपभ्रष्ट शब्द समझना चाहिए ॥ ५ ॥
[ ये¹ वर्णा वर्णगता व्यञ्जनयुक्ताश्च ये स्वराः नियताः ।
तानपरस्परवृत्ते प्राकृतयुक्त्या प्रवक्ष्यामि ॥ ]
(तथा वर्ण हों अथवा वर्णों में आने वाले व्यञ्जन से युक्त जो नियत
स्वर हों उनमें परस्पर होने वाली या विद्यमान रहने वाली स्वर या व्यंजन
की स्थिति को भी मैं प्राकृत भाषा के नियमों के अनुरूप निरूपण करता हूँ ।
स्वर तथा असंयुक्त व्यञ्जन—
यथा—²एओआरपराणिअ अंआरपरं³ ⁴अ पाउए णत्थि ।
वसआरमज्झिमाई⁵ ⁶अ कचचवग्गतवग्गणिहणाइँ ॥ ६ ॥
[ एओकारपराणि च अङ्कारपरञ्च प्राकृते नास्ति ।
वसकारमध्ये च कचवर्गंतवर्गनिधनानि ॥ ]


१. पद्यमेतत्—ख०, ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
२. 'एओआर' इत्यादिलक्षणश्लोकाः अतीवास्फुटा ख० ग० पुस्तकयोः ।
क० पुस्तकटिप्पण्यां लक्षणश्लोकानां स्थाने गद्यतामापन्नः पाठभेदोऽपि ।
स च यथा—क ख घ त थ ध भ सा हत्वं यान्ति । यथा—फलिह,
मुह, मेह, वसहि, रह, दहि, सोह। दिअहेसु । शषौ सकारौ भवतः ।
यथा—ससंकं विसमेसु । टतदा डत्वं यान्ति । यथा—विड पडि
अदंडासु । ट ठ ड द य राः लत्वं यान्ति । यथा—विअ लालिअ तुल
पवितुला विहलयदीसु । थकारो ढत्वं प्राप्नोति । यथा—वुड्ढो । नकारो
भवति णकारः । यथा—णयणं । पकारो फत्वं याति बत्वञ्च । यथा—
फरुसं कवदं च । धकारः ठत्वं याति । यथा—वठि । लकारो रत्वं याति ।
यथा—किर । टठौ डत्वं प्राप्नुतः । यथा—सढः फढमं फलिअं । तजौ
यत्वं प्राप्नुतः । यथा—कयं धयं । श च ज तदपयवाः स्वरशेषा भवन्ति ।
यथा—विउण, पउप, राइ, बई, णई, कइ, दइआ जयेसु । योगं याति
यथा—अच्छरियं उच्छाहो अच्छरसा पच्छं । तुज्झं सञ्झं विज्झो ।
श्लक्षणं—सल्हं । ग्रीष्मो—गिम्हो । दृष्टो—दिट्ठो । हस्तो—हत्थो ।
यक्षो—जक्खो । ब्रह्मा—बम्हा । बृहस्पतिः—बुहप्पइ । यज्ञो—जञ्ञोत्ति ।
३. अआर —क० । ४. पाइए—क० ।
५. गज्झिआइ—क० । ६. कचचवग्ग —क० ।

३२८ नाट्यशास्त्रम्
जो 'स्वर 'ए' तथा 'ओ' के आगे आने वाले अर्थात् 'ऐ' और 'औ हो,
अनुस्वार के आगे आनेवाले अर्थात् विसर्ग हो प्राकृत भाषा में उनका कोई
प्रयोग नहीं होता। इसी प्रकार प्राकृत भाषा में पाद (अर्थात् चार) स्वरों
(ऋ, ॠ, लृ, लॄ) का तथा 'व' और 'स' के बीच रहने वाले वर्णों
(अर्थात् 'श' 'ष' 'ष') का तथा क, च और त वर्ग के अन्तिम वर्ण
(अर्थात् ङ०, ञ० और न) का भी व्यवहार नहीं होता है। अर्थात् इस
भाषा में ये बारह वर्ण शब्दों (पदों) में नहीं रहते या लुप्त हो जाते हैं ॥६॥
१वच्चन्ति कगतदयवा लोवं अत्थं च२ से वहन्ति सरा ।
३खघथधमा उण ४हत्तं उवेंति अत्थं५ अमुञ्चन्ता ॥ ७ ॥
[ प्राप्नुवन्ति कगतदयवा लोपं अर्धञ्च तेषां वहन्ति स्वराः ।
खघथधमाः पुनः हत्वमुपेयन्ति अर्थञ्चामुञ्चमानाः ॥ ]
क, ख, ग, त, द, य और व का लोप हो जाता है। (शेष स्वरों वाले
उन्हीं शब्दों से वही अर्थ प्रकट होता है। और इनका आधा भाग स्वरों
में मिल जाता है। ख, घ, भ, ध, और भ को 'ह' आदेश हो जाता है।
तथा इस परिवर्तन या आदेश के कारण अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं
होता२ ॥ ७ ॥
१. स्वर तथा असंयुक्त व्यंजन विषयक कारिकाएं नाट्यशास्त्र में प्राकृत में
तथा विश्रष्ट-पाठों में प्राप्य है। यहाँ हमने बड़ौदा संस्करण के अनुसार
संशोधन कर पाठ लिया गया है। (इन्हें कुछ विद्वान् प्रक्षिप्त भी मानते
हैं।) हमने इनकी संस्कृत-छाया को लगाकर व्याख्या की है।
२. जैसे स्पष्टतः—दूसरे शब्दों की अवस्था में कठोर ध्वनि या महाप्राणवर्ण
में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे—परिघ, अथ, वध, परिह,
अह, वह।
अल्पप्राण व्यंजन यहाँ अन्तःवर्ती अ से युक्त समझे जाना चाहिए इनमें 'अ'
केवल उच्चारणार्थ ही रखा गया है।
सारो (स्वर) से यहाँ 'अर्थ' अभीष्ट है व्यंजन-ध्वनि नहीं।
१. वच्चंति कगत्रजगदावा—वच्चति कटतदवयवाः—क० ।
२. व सिस्वहृत्ति सरा—ख० ।
३. खघधभउण—, खघघुधः उणइ—क०, खद्यधा भद्यथा उण—ख० ।
४. हत्तं उवेंति—हत्त उषति—हत्तं वेंति—क०, हतं तुवेति—ख० ।
५. अंगवअं चंता, अत्थं समुंचंता—अग्ग अमच्चता—क; अत्थं अमुंघना—ख० ।

अष्टादशोऽध्यायः ३२९
१उप्परहुत्तरआरो २हेट्ठाहुत्ते अ पाअए णत्थि ।
३मोत्तूण भद्रवोद्रहपद्रहदचन्दजाईसु ॥ ८ ॥
[ उपरिस्थ-रकारः अधस्थः च प्राकृते नास्ति ।
मुक्त्वा भद्रवोद्रहदचन्द्रधात्रीषु ॥ ]
प्राकृत में 'र' (रेफ या अर्द्धरकार) का ऐसा कोई प्रयोग नहीं होता जो
किसी वर्ण के ऊपर या नीचे स्थित रहता हो। परन्तु केवल यह नियम मद्र,
वोद्रह, हृद, चन्द्र और धात्री शब्द को छोड़कर समझना चाहिए ॥ ८ ॥
४खघथधभाणहआरो ५मुह-मेहकहावहू-पहूएसु ।
६कगतदयवाणं णिच्चं बीयम्मि ठिओ सरो होइ ॥ ९ ॥
[ खघथधभानां हकारः मुखमेघकथावधू प्रभूतेषु ।
कगतदयवानां नित्यं द्वितीये स्थितः स्वरो भवति ॥ ]
ख, घ, थ, ध, और भ को हकारादेश हो जाता है जैसे—मुख—मुह,
मेघ—मेह, कथा—कहा, वधू = वहु, प्रभूत = पहुअ। तथा क, ग, द,
और व—जो कि इन वर्णों के पूर्वाक्षर हैं इनके प्रतिनिधि रहते हैं सदा
द्वितीय स्वर के रूप में ॥ ९ ॥
१. उंपर अन्तरआरो, उप्पाहृत रयारो, उरउर हारो, उच्चरउरहारो०,
उघरहुत्तरसाहो, उच्चरउरआरो, डप्परहुतुरअरो, इंघर उत्तरहारो—
क०; उधरफुतरसासाहे—ख० ।
२. रेभत्तत्तो अ वाअए णंथि, हेटाहुत्तो अ पाअए णत्थि, हेठ्ठाहुत्तो
अपाणत्थि, हेणणहत्थो अ वाअए णत्थि—हेहाफुत्तप्लययायए णत्थि—
हद्धाहुस्तआ पइए णत्थि—क० ।
३. मोत्तूण भुदावो दहददहचन्द्रजाईसु, मोत्तूण भद्रवोद्रहपद्रद्रह, मोहूण
भाभ्रवोभ्रहरुभट्टगचन्द्र, मांभूषणभूभूओभूवरुभूदुहचन्द्र—(?), मोंतूण
भाद्रबोद्रवभद्रचन्द्र—मोत्तूण वंइडोद्रहपउर्जइसु—क० ।
४. खयषधभाणहयाने—ख० ।
५. मुहकहापह्मुरिच्छेसु—क० ।
६. कगतिदषाण अणिच्चलोपजमपि ओसरो होइ, कगतदयपाण णिच्चं विइअ
मिठिअ सरो होई, कगनदजवाण णिचलोपम्मि उं ओसरो होई—
कगतदजवारमणिच्चं वीयंति डिउसरो होइ—क०; कगतदजब्राण
विच्चा वोयं मिठिउ सरो होइच्छे—ख० ।

३३० नाट्यशास्त्रम्
'छ इति षकारो नित्यं बोद्धव्यः २षट्पदादियोगेषु ।
३किलशब्दान्त्यो रेफो भवति तथा ४खुत्ति खलु शब्दः ॥१०॥
१'षट्पद' आदि ( शब्द या गण ? ) में रहने वाले 'ष' को प्राकृत भाषा
में नित्य 'छ' हो जाता है । जैसे—छतपद । किल शब्द का अन्तिम 'ल' का
'र' हो जाता है और 'कु' शब्द को 'खु' ख ( आदेश ) हो जाता है ॥१०॥
'ड इति च भवति टकारो ६भटकटककुटीतटाद्येषु ।
सत्वं च भवति शषयोः ७सर्वत्र यथा विसं सङ्का ॥ ११ ॥
'ट' का 'ड' हो जाता है भट, कुटी, तट इत्यादि शब्दों में
( जैसे—भट = भड, कुटी = कुडी, तट = तड ) । तथा सर्वत्र 'श' ष के
स्थान पर 'स' कार आदेश हो जाता है । जैसे विष = विस, शंका = संका
इत्यादि ॥ ११ ॥
अस्पष्टश्च दकारो भवत्यनादौ तकार ८इतराद्यः ।
'बडवातडागतुल्यो ९भवति डकारोऽपि च लकारः ॥ १२ ॥
१. षट्पदादिगण के विषय में आचार्य अभिनवगुप्त कुछ भी संकेत नहीं
करते । न ही अन्यत्र इस गम का विवरण या संकेत प्राप्त है ।
१. छे इति षकारो, च इति चकारो, इत्ति यकारो; छ इति षआरो—हृषि
उषिति षकारो—क० ।
२. षट्पादे तु, अपदादियोगे तु, षट्पदानि योग्ये तु—क० ।
३. कृति शब्दो रेफान्तेन भवन्ति तथा पुत्रि खलुशब्दः; किलं शब्दो कोरे
भवति तदा खुत्ति खलु शब्दः; खिल शब्दाद्यो रेफो—क०; किल शब्दो
रेफान्तो—ख० ।
४. खुत्ति खिलशब्दः, भवति तथा त्ति खलु शब्दः, तथा खुनिखलशब्दः-क० ।
५. त इति च भवति टकाते, ड इति च टकारो—क० ।
६. भटकटककुटीकुटावटाद्येषु, भटकटकुटीकुटावडाद्येषु, कटकटक......,
नडकडुकुटी तडाष्वेषु, नटकटुटीतटाद्येषु-क०, भटकुटकुटितटाद्येषु—ख० ।
७. विससंका, यथा हि विससंका, तथापि ससकादेशः, तथापि ससकादेः
सा—क०; सर्वत्र तथाहि विससंका—ख० ।
८. इतराद्याः—क०; इतराद्ये—ख० ।
९. बडवाडडाग, वडवडवा—क० ।
१०. भवन्ति डकारोऽपि लकारं—क० ।

'इतर' आदि शब्दों में स्थित 'त' को—जो कि शब्द के प्रारंभ में विद्यमान
नहीं—अस्पष्ट 'द' के रूप में उच्चारित किया जाता है तथा बडवा और
तडाग शब्द में विद्यमान 'ड' का ल हो जाता है। जैसे—बडवा = बलवा ।
तडाग = तलाग¹ ॥ १२ ॥
¹वर्द्धनगते च भावे ²धकारवर्णोऽपि ढत्वमुपयाति ।
सर्वत्र च प्रयोगे भवति ³नकारोऽपि च णत्वमुपयाति ॥१३॥
'ध' वर्ण को (जो शठ, पाठ, पीठिका आदि शब्दों में हो-) 'ढ' हो जाता
है । सभी प्रयोगों में 'न' कार के स्थान पर 'ण' कार का उच्चारण किया
है । जैसे:--आपान = आवाण ।
आपाणं आवाणं भवति पकारेण ⁴वत्वयुक्तेन ।
⁵अयथातथादिकेषु तु ⁶थकारवर्णो व्रजति धत्वम् ॥ १४ ॥
'प' कार को 'व' कार हो जाता है। जैसे आपान = आवाण ।
और यथा तथा शब्द के अतिरिक्त शब्दों में स्थित 'थ' कार को 'ध' कार
हो जाता है ।
⁷परुसं फरुसं विद्यात् पकारवर्णोऽपि ⁸फत्वमुपयाति ।
यस्तु मृतः ⁹सोऽपि मओ यश्च मृगः सोऽपि तथैव ॥१५॥
१. जो बिना किसी विभेद के 'ड' उच्चारण किया जाता है वह 'द' है, जो
लकार की छाया लिए हुए है। इसे अस्पष्ट होने से लघुप्रयत्न के द्वारा
उच्चार्य समझना चाहिए जैसे :—उदर = उलरम् । ( अभि० भारती० )
२. वर्द्धन में 'द्व' को ढ हो जाता है। यथा—वर्द्धनम् = वड्ढणम् ।
१. वधुमधुशब्दे च तथा, शठपाठपीठि आदि सु, शठपाठपीठिकादिषु—क०,
पद्ममधुशब्दे च तथा—ख० ।
२. धकार वर्णो हकारतां याति; टकारवर्णोऽपि ठत्वमुपयाति, ठकारवर्णोऽपि
ढत्व—क० ।
३. मकारोऽपि च णकारः—क०; ख० ।
४. आवाणं आधाणं भवति वकारेण च धयुक्तेन, पकारेण नत्वयुक्तेन—क० ।
५. अयथातथादिषु केषु—क० ।
६. भकार वर्णो, धकार वर्णो व्रजति पत्वम्, थकारवर्णो व्रजति हत्वम्—क० ।
७. परुसं हरुसं—क० । ८. पकारवर्णोऽपि हत्वमुपयाति—क० ।
९. सोऽपि मटो, सोऽपि मंडोडि यस्तु मृतः सोऽपि मओ—क० । यस्तु मृगः
सोऽपि मओ यस्तु मृतः सोऽपि तथैव—ख० ।

३३२ नाट्यशास्त्रम्
किसी स्थान पर स्थित 'प' को 'फ' हो जाता है । जैसे—परूसं=फरूसं
तथा 'मृग' और मृत शब्द का प्राकृत में एक ही 'मओ' रूप बनता है१ ॥१५॥
१ओकारत्वं गच्छेदौकारश्चौषधादिषु नियुक्तः ।
२प्रचलाचिराचलादिषु ३भवति चकारोऽपि तु यकारः ॥१६॥
'ओषध' आदि शब्दों में स्थित 'औ'को 'ओ'कार हो जाता है । जैसे—
औषध = ओसढ़ । तथा प्रचय, अचिर और अचल शब्दों में स्थित 'च'२ को
'य' हो जाता है । यथा प्रचय = पयय, अचिर=अयिर, अचल=अयल ॥१६॥
४अपरस्परनिष्पन्ना ह्येवं प्राकृतसमाश्रया वर्णाः ।
संयुक्तानां तु पुनर्वक्ष्ये परिवृत्तिसंयोगम् ॥ १७ ॥
इस प्रकार मैंने असंयुक्त वर्णों वाले प्राकृत शब्दों के वर्ण ( परिवर्तन )
विषयक नियम बतलाए । अब मैं संयुक्त वर्णों के ( विषय में ) होने वाले
परिवर्तन, आदेश आदि नियमों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
संयुक्त-व्यञ्जन—
५श्वप्सत्सथ्याः छ इति तथा भ्यह्यध्या ६भवन्ति तु झकाराः ।
७ष्ठः ट्टः स्तः त्थः ष्मो म्ह क्ष्णो ण्हः ष्णो ण्हः क्षः खकाररूपोऽपि ॥१८॥
१ मृग तथा मृत शब्द में स्थित 'मा' में एक संघर्षीकृत या ऊष्म 'द' होगा
जो 'याश्रुति' के अनुसार प्राचीन काल में ही ध्वनिपरिवर्तन के कारण
लुप्त हो जाने से संप्रति प्रतीत नहीं होता है ।
२. यहाँ 'च' के लिए संभवतः याश्रुति को मानना उसके सहसा सुस्पष्ट लोप
को प्रकट नहीं करता प्रतीत होता है ।
१. ओकारत्वं गच्छन्ताकार—क०; ओकारत्वं गच्छत्योवार—ख०; ग० ।
२. प्रचलायिताचल—प्रचलापिताचला—क०; प्रचया चिरा—ख०; ग० ।
३. चकारवर्णोऽपि च यकारः—ख०; ग० ।
४. अपरस्वरनिष्पन्ना—ख०; ग० ।
५. झप्सश्चः छ इति तथा राज्ञै तु तकार योग उपयातः, तच्छो अच्छरपच्छ
रूपे च्सं संज्ञाह्य स च सझौ—( ? ) क०; श्चत्सप्सां च्छ इति ध्यम्हयो-
र्भवति तुज्झकारः—ख०; ग० ।
६. व्रजति वै झत्वम्—क० ।
७. ष्ठो ट्टो स्तोत्रः शेषो लक्ष्मक्ष्मो ह्वक्षणः खकाररूपोऽवि, स्तत्थोष्ट्ठः क्ष्ण
ख इति चैव स्यात्, श्चत्सथ्याः छ इत्यह्व्याम्बा भवन्ति तु झकाराः,
यूष्ट स्तः त्थः भ्याह्लः क्लाष्टा ह्लक्षः ख इति चैव स्यात् ( ? )—क०;
ष्ठः ट्ठः स्तः त्थ ष्णलक्ष्णां ह्रः क्षः खकाररूपो हि—ख०; ग० ।