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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 668 में से

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पृष्ठ 442

'इतर' आदि शब्दों में स्थित 'त' को—जो कि शब्द के प्रारंभ में विद्यमान
नहीं—अस्पष्ट 'द' के रूप में उच्चारित किया जाता है तथा बडवा और
तडाग शब्द में विद्यमान 'ड' का ल हो जाता है। जैसे—बडवा = बलवा ।
तडाग = तलाग¹ ॥ १२ ॥
¹वर्द्धनगते च भावे ²धकारवर्णोऽपि ढत्वमुपयाति ।
सर्वत्र च प्रयोगे भवति ³नकारोऽपि च णत्वमुपयाति ॥१३॥
'ध' वर्ण को (जो शठ, पाठ, पीठिका आदि शब्दों में हो-) 'ढ' हो जाता
है । सभी प्रयोगों में 'न' कार के स्थान पर 'ण' कार का उच्चारण किया
है । जैसे:--आपान = आवाण ।
आपाणं आवाणं भवति पकारेण ⁴वत्वयुक्तेन ।
⁵अयथातथादिकेषु तु ⁶थकारवर्णो व्रजति धत्वम् ॥ १४ ॥
'प' कार को 'व' कार हो जाता है। जैसे आपान = आवाण ।
और यथा तथा शब्द के अतिरिक्त शब्दों में स्थित 'थ' कार को 'ध' कार
हो जाता है ।
⁷परुसं फरुसं विद्यात् पकारवर्णोऽपि ⁸फत्वमुपयाति ।
यस्तु मृतः ⁹सोऽपि मओ यश्च मृगः सोऽपि तथैव ॥१५॥
१. जो बिना किसी विभेद के 'ड' उच्चारण किया जाता है वह 'द' है, जो
लकार की छाया लिए हुए है। इसे अस्पष्ट होने से लघुप्रयत्न के द्वारा
उच्चार्य समझना चाहिए जैसे :—उदर = उलरम् । ( अभि० भारती० )
२. वर्द्धन में 'द्व' को ढ हो जाता है। यथा—वर्द्धनम् = वड्ढणम् ।
१. वधुमधुशब्दे च तथा, शठपाठपीठि आदि सु, शठपाठपीठिकादिषु—क०,
पद्ममधुशब्दे च तथा—ख० ।
२. धकार वर्णो हकारतां याति; टकारवर्णोऽपि ठत्वमुपयाति, ठकारवर्णोऽपि
ढत्व—क० ।
३. मकारोऽपि च णकारः—क०; ख० ।
४. आवाणं आधाणं भवति वकारेण च धयुक्तेन, पकारेण नत्वयुक्तेन—क० ।
५. अयथातथादिषु केषु—क० ।
६. भकार वर्णो, धकार वर्णो व्रजति पत्वम्, थकारवर्णो व्रजति हत्वम्—क० ।
७. परुसं हरुसं—क० । ८. पकारवर्णोऽपि हत्वमुपयाति—क० ।
९. सोऽपि मटो, सोऽपि मंडोडि यस्तु मृतः सोऽपि मओ—क० । यस्तु मृगः
सोऽपि मओ यस्तु मृतः सोऽपि तथैव—ख० ।