नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 429, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें३१८ नाट्यशास्त्रम्
पदोच्चय—
गुणैर्बहुभिरेकार्थैः पदैर्यः सम्प्रशस्यते ।
पदोच्चयन्तु तं विद्यान्नानार्थग्रथितार्थकम्¹ ॥ १८ ॥
एक ही पदार्थ को निदर्शित करने वाले अनेक शब्द या वचनों के द्वारा
जब किसी वस्तु की प्रशंसा की जाए तो अनेक अर्थों या वचनों द्वारा
इष्ट वस्तु को स्वरूप प्रदान करने वाले ऐसे लक्षण को 'पदोच्चय' समझना
चाहिए ॥ १८ ॥
आक्रन्द—
आत्मभावमुपन्यस्य² परसादृश्ययुक्तिभिः ।
तीव्रार्थभाषणं यत् स्यादाक्रन्दः स तु कीर्तितः ॥ १९ ॥
अन्य पुरुष के सम्मुख जब सादृश्य या समानता को दर्शाने वाली युक्तियों
से अपने अभीष्ट अप्रत्यक्ष अभिप्राय को प्रमुखतः स्पष्ट कथन (के) द्वारा
स्वभावाविष्करण करते हुए रखा जाए तो वह 'आक्रन्द'² कहलाता है ॥ १९ ॥
मनोरथ—
हृदयस्थस्य भावस्य ³सुश्लिष्टार्थप्रदर्शकम् ।
⁴अन्यापदेशकथनैर्मनोरथ इति स्मृतः ॥ २० ॥
जब किसी गूढ़ मनोगत भाव को अन्य वस्तु के कथन के व्याज के द्वारा
बतलाया जाए तो ऐसी सुनियोजित वाक्यावली को 'मनोरथ'³ समझना
चाहिए ॥ २० ॥
आख्यान—
⁵पृष्टैरपृष्टैरथवा निर्णयः क्रियते तु यः ।
आख्यानमिति तज्ज्ञेयं लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ २१ ॥
१. 'पदोच्चय' का नाम तथा लक्षण दोनों पाठों में मिलता है ।
२. 'आक्रन्द' के स्थान पर अन्य पाठ में 'तुल्यतर्क' रखा गया है ।
३. 'मनोरथ' का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है ।
१. ग्रथनात्मकम्—क; मथनात्मकम्—ख०; कथनात्मकम्—ग० ।
२. भावेष्वपत्यस्य—ख०; ग० ।
३. सुस्पष्टार्थप्रदर्शकम्—ख०; ग० ।
४. कथनं—ख०; ग० ।
५. अपृष्टैरथवा पृष्टै—ख०; ग० ।