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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 668 में से

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पृष्ठ 431

३२० नाट्यशास्त्रम्
जब किन्हीं गूढ़ अभिप्रायों को संकेतित करने वाले वाक्यों के द्वारा
अन्य व्यक्ति या स्वयं को ही पूछते हुए जब किसी तथ्य या अर्थ का कथन
किया जाए तो उसे 'पृच्छा'¹ समझना चाहिए ॥ २४ ॥
दृष्टान्त—
विद्वान्¹ पूर्वोपलब्धौ यत् समत्त्वमुपपादयेत् ।
निदर्शनकृतस्तज्ज्ञैः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥ २५ ॥
जब कोई विद्वान् व्यक्ति किसी पदार्थ की समता को अपनी पूर्व उपलब्ध
वस्तु के साथ तुलना करते हुए स्थापित करे या बतलावे तो उसे 'दृष्टान्त'²
नामक लक्षण समझना चाहिए ॥ २५ ॥
निर्भासन—
अनेकयुक्तिमद्वाक्यमनेकार्थप्रसाधकम्² ।
³अनेकवाक्यसंयुक्तं⁴ तन्निर्भासनमुच्यते ॥ २६ ॥
जो कथन अनेक युक्तियों से युक्त, अनेक वाक्यों से भरा हुआ एवं
अनेक उद्देश्य या प्रयोजन का साधक होता है तो उसे 'निर्भासन'³ समझना
चाहिए ॥ २६ ॥
संशय—
अपरिज्ञाततत्त्वार्थं यत्र वाक्यं समाप्यते ।
⁵सोऽनेकत्वाद्धिचाराणां संशयः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
जब वाक्य की समाप्ति किसी तथ्य या तात्त्विक अर्थ को जाने बिना ही
१. 'पृच्छा' का दोनों पाठों में समान रूप से सन्निवेश है ।
२. 'दृष्टान्त' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भिन्न हैं ।
३. निर्भास या निर्भासन के स्थान पर अन्य पाठ में 'माला' मिलता है ।
१. विद्वन् पूर्वो—क०; सिद्धं पूर्वोपलब्धो यः—ख०; ग० ।
२. मनेकप्रकृतिस्थितम्—क० ।
३. वचनैर्युक्तं—क० ।
४. मासनं नाम तद्भवेत् —ख०, ग० ।
५. अनेकत्वाद्धि—ख०; ग० । क ( भ० ) पुस्तके तु संशयस्य लक्षणं
भिद्यते—तद्यथा—“परप्रशंसावचनं प्रयुक्तं योऽभ्यसूयते ।
पूर्वोत्तराथैर्व्याघातः संशयः स तु कीर्तितः ॥” इति ।