नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ३२९
१उप्परहुत्तरआरो २हेट्ठाहुत्ते अ पाअए णत्थि ।
३मोत्तूण भद्रवोद्रहपद्रहदचन्दजाईसु ॥ ८ ॥
[ उपरिस्थ-रकारः अधस्थः च प्राकृते नास्ति ।
मुक्त्वा भद्रवोद्रहदचन्द्रधात्रीषु ॥ ]
प्राकृत में 'र' (रेफ या अर्द्धरकार) का ऐसा कोई प्रयोग नहीं होता जो
किसी वर्ण के ऊपर या नीचे स्थित रहता हो। परन्तु केवल यह नियम मद्र,
वोद्रह, हृद, चन्द्र और धात्री शब्द को छोड़कर समझना चाहिए ॥ ८ ॥
४खघथधभाणहआरो ५मुह-मेहकहावहू-पहूएसु ।
६कगतदयवाणं णिच्चं बीयम्मि ठिओ सरो होइ ॥ ९ ॥
[ खघथधभानां हकारः मुखमेघकथावधू प्रभूतेषु ।
कगतदयवानां नित्यं द्वितीये स्थितः स्वरो भवति ॥ ]
ख, घ, थ, ध, और भ को हकारादेश हो जाता है जैसे—मुख—मुह,
मेघ—मेह, कथा—कहा, वधू = वहु, प्रभूत = पहुअ। तथा क, ग, द,
और व—जो कि इन वर्णों के पूर्वाक्षर हैं इनके प्रतिनिधि रहते हैं सदा
द्वितीय स्वर के रूप में ॥ ९ ॥
१. उंपर अन्तरआरो, उप्पाहृत रयारो, उरउर हारो, उच्चरउरहारो०,
उघरहुत्तरसाहो, उच्चरउरआरो, डप्परहुतुरअरो, इंघर उत्तरहारो—
क०; उधरफुतरसासाहे—ख० ।
२. रेभत्तत्तो अ वाअए णंथि, हेटाहुत्तो अ पाअए णत्थि, हेठ्ठाहुत्तो
अपाणत्थि, हेणणहत्थो अ वाअए णत्थि—हेहाफुत्तप्लययायए णत्थि—
हद्धाहुस्तआ पइए णत्थि—क० ।
३. मोत्तूण भुदावो दहददहचन्द्रजाईसु, मोत्तूण भद्रवोद्रहपद्रद्रह, मोहूण
भाभ्रवोभ्रहरुभट्टगचन्द्र, मांभूषणभूभूओभूवरुभूदुहचन्द्र—(?), मोंतूण
भाद्रबोद्रवभद्रचन्द्र—मोत्तूण वंइडोद्रहपउर्जइसु—क० ।
४. खयषधभाणहयाने—ख० ।
५. मुहकहापह्मुरिच्छेसु—क० ।
६. कगतिदषाण अणिच्चलोपजमपि ओसरो होइ, कगतदयपाण णिच्चं विइअ
मिठिअ सरो होई, कगनदजवाण णिचलोपम्मि उं ओसरो होई—
कगतदजवारमणिच्चं वीयंति डिउसरो होइ—क०; कगतदजब्राण
विच्चा वोयं मिठिउ सरो होइच्छे—ख० ।