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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 668 में से

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३१६ नाट्यशास्त्रम्
जब किसी एक शब्द के उच्चारित होते ही अनेक अकथित या
असंकेतित अर्थों की भी सूचना प्राप्त होने लगे तो उसे ‘उदाहरण’¹ समझना
चाहिए ॥ ११ ॥
निरुक्त—
निरुक्तं द्विविधं प्रोक्तं ¹तथ्यञ्चातथ्यमेव च ।
²सिद्धिपूर्वं भवेत्तथ्यमतथ्यञ्चाप्रसाधितम्³ ॥ १२ ॥
निरुक्त के दो प्रभेद हैं—( १ ) तथ्य तथा ( २ ) अतथ्य । इनमें जो
अच्छी तरह से प्रसिद्ध या ज्ञात हो उसे ‘तथ्य’ तथा जो किसी प्रकार इसके
विपरीत हो या अच्छी तरह से प्रसिद्ध न हो उसे ‘अतथ्य’ नामक निरुक्त²
समझना चाहिए ॥ १२ ॥
गुणानुवाद—
⁴गुणानुवादो हीनानामुत्तमैरुपमाकृतः ।
जब किसी हीन विषय की उत्तम विषय से तुलना की जाए तो ऐसे
कथन वाले लक्षण को ‘गुणानुवाद’³ समझना चाहिए ।
अतिशय—
⁵उत्तमार्थाद्विशिष्टो यः स चाप्यतिशयः स्मृतः ॥ १३ ॥
जब किसी उत्तम पदार्थ से तुलना करने पर भी किसी का ( उक्त अर्थ
से भी ) अधिक वैशिष्ट प्रतीत होने लगे तो ऐसे लक्षण को ‘अतिशय’⁴
समझना चाहिए ॥ १३ ॥
हेतु—
बहूनां ⁶भाषमाणानां ⁷त्वेकस्यार्थविनिर्णयम् ।
सिद्धोपमानवचनं हेतुरित्यभिसंज्ञितः ॥ १४ ॥
१. उदाहरण का नाम दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण भिन्न हैं ।
२. अन्य पाठ में निरुक्त के दो विभेदों का उल्लेख नहीं है ।
३. ‘गुणानुवाद’ का अन्य पाठ में ‘गुणातिपात’ अभिधान मिलता है ।
४. यह लक्षण पूर्व पाठ के ‘अतिशय’ के लक्षण का पूरक लक्षण होकर थोड़ी
भिन्नता रखता है । ‘अतिशय’ का दोनों पाठों में सन्निवेश मिलता है ।
१. वातथ्य—ख०; ग० । २. सिद्धि प्रसाधितं तथ्य—क० ।
३. चाप्यसाधकम्—क० । ४. गुणाभिवादो—क० ।
५. उत्तमार्थ विशिष्टो—क०; उत्तमार्थविशेषो—ख०; ग० ।
६. भाष्यमाणानां—ख०; ग० ।
७. अनेकार्थविनिश्चयः—क०; अनेकार्थविनिर्णयात्—ग० ।