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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 668 में से

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पृष्ठ 424

सप्तदशाध्यायानुबन्धः
विभूषणञ्चाक्षरसंहतिश्च¹ शोभाभिमानौ गुणकीर्तनञ्च ।
प्रोत्साहनाेदाइरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशयः सहेतुः ॥ १ ॥
सारूप्य-मिथ्याध्यवसायसिद्धि-पदोच्चयाक्रन्दमनोरथाश्च ।
²आख्यानयाश्चाप्रतिषेधपृच्छादृष्टान्तनिर्भासनसंशयाश्च³ ॥ २ ॥
आशीः प्रियोक्तिः⁴ कपटः क्षमा च प्राप्तिश्च पश्चात्तपनं तथैव ।
अथानुवृत्तिर्ह्युपपत्तियुक्ती ⁵कार्योऽनुनीतिः परिदेवनञ्च ॥ ३ ॥
षट्त्रिंशदेतानि तु⁶ लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसम्मितानि ।
काव्येषु ⁷भावार्थगतानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि यथारसं⁸ तु ॥ ४ ॥
दृश्य काव्य के अङ्गभूत छत्तीस लक्षण¹ होते हैं। जिनके नाम इस
प्रकार हैं—( १ ) विभूषण, ( २ ) अक्षरसंघात, ( ३ ) शोभा, ( ४ ) अभि-
मान, ( ५ ) गुणकीर्तन, ( ६ ) प्रोत्साहना, ( ७ ) उदाहरण, ( ८ ) निरुक्त,
( ९ ) गुणानुवाद, ( १० ) अतिशय, ( ११ ) हेतु, ( १२ ) सारूप्य,
( १३ ) मिथ्याध्यवसाय, ( १४ ) सिद्धि, ( १५ ) पदोच्चय, ( १६ ) आक्रन्द,
( १७ ) मनोरथ, ( १८ ) आख्यान, ( १९ ) याञ्चा, ( २० ) प्रतिषेध,
१. दो भिन्न पाठों में पठित लक्षणों के क्रम में यहाँ अनुबन्धरूप में प्रदत्त
इस पाठ को आचार्य अभिनव गुप्त ने अपनी परम्परा में समागत पाठ
स्वीकृत करते हुए मुख्य माना है । आचार्य पाद ने ही दूसरे पाठ की
भी व्याख्या की तथा इस पाठ की भी व्याख्या की तथा इस पाठ को भी
उद्देश कथन के रूप में भरतमुनि सम्बद्ध भी बतलाया । इस प्रकार दो
पाठों में विभक्त लक्षणों के स्वरूप को लेकर भोज आदि ने चौसठ काव्य
लक्षण निरूपित किये । इन सभी लक्षणों का सोदाहरण विवेचन
'परिशिष्ट' में ही उचित मानकर यहाँ केवल अर्थमात्र ही देकर हम
सन्तोष कर रहे हैं । ( सम्पा० व्याख्या० )
१. चाक्षरसङ्गतिश्च—ख०; चाक्षरसंहितञ्च—ग० ।
२. आख्यानवादाः—ख० । ३. दृष्टाङ्ग—ख० ।
४. प्रियं वै कपटं क्षमा च—ग० । ५. कार्यानुनीती—ग० ।
६. मया समासात्—क० । ७. सोदाहरणेषु—क० ।
८. यथारसानि—क० ।