नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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( २१ ) पृच्छा, ( २२ ) दृष्टान्त, ( २३ ) निर्भासन, ( २४ ) संशय,
( २५ ) आशीः, ( २६ ) प्रियोक्ति, ( २७ ) कपट, ( २८ ) क्षमा,
( २९ ) प्राप्ति, ( ३० ) पश्चात्तापः, ( ३१ ) अनुवृत्ति, ( ३२ ) उपपत्ति,
( ३३ ) युक्ति, ( ३४ ) कार्य, ( ३५ ) अनुनीति या अनुनय तथा
( ३६ ) परिदेवन ॥ १-४ ॥
विभूषण—
अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिर्यदलङ्कृतम् ।
भूषणैरिव विन्यस्तैस्तद्विभूषणमिति स्मृतम् ॥ ५ ॥
जो रचना अनेक अलङ्कार तथा गुणों से अलंकृत होने के कारण
अलंकार से सजाए गए व्यक्ति की तरह सुशोभित होने लगे तो विविध
अर्थगुण सूचक ऐसे लक्षण को 'विभूषण' समझना चाहिए ॥ ५ ॥
अक्षरसंघात—
'१यत्राल्पैरक्षरैः श्लिष्टैर्विचित्रार्थोपवर्णनम्२ ।
३तदप्यक्षरसङ्घातं विद्याल्लक्षणसंज्ञितम् ॥ ६ ॥
जहाँ थोड़े अक्षरों के प्रयोग से श्लेषगत वैशिष्ट्य के कारण विविध एवं
वैचित्र्य सम्पन्न अर्थ की अभिव्यक्ति होती हो तो उसे 'अक्षरसंघात'२ नामक
लक्षण समझना चाहिए ॥ ६ ॥
शोभा—
सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ४ह्यसिद्धोऽर्थः प्रसाध्यते ।
यत्र ५श्लक्ष्णा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिसंज्ञिता६ ॥ ७ ॥
यदि असिद्ध या अज्ञातार्थ की सिद्ध या ज्ञात रूप में उद्धृत करते हुए
श्लेष के कारण नवीन या मनोहारि स्थिति में अर्थाभिव्यक्ति होती हो ऐसे
लक्षण को 'शोभा'३ समझना चाहिए ॥ ७ ॥
१. 'विभूषण' का पर्याय अन्य पाठ में 'भूषण' दिया है ।
२. 'अक्षरसंघात' दोनों पाठों में समान प्राप्त होता है ।
३. 'शोभा' का लक्षण भी दोनों पाठों में समान है ।
१. यत्रार्थैः—क० ।
२. विचित्रैरुपवर्णितम्—क०; विचित्रमुपवर्ण्यते—ग० ।
३ तमप्यक्षर—ग० । ४. यत्रासिद्धं—क० ।
५. श्लिष्टा—क०; श्लक्ष्णविचित्रार्थाः—ख०, ग० ।
६. त्यभिधीयते—ख०; ग० ।