नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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किसी स्थान पर स्थित 'प' को 'फ' हो जाता है । जैसे—परूसं=फरूसं
तथा 'मृग' और मृत शब्द का प्राकृत में एक ही 'मओ' रूप बनता है१ ॥१५॥
१ओकारत्वं गच्छेदौकारश्चौषधादिषु नियुक्तः ।
२प्रचलाचिराचलादिषु ३भवति चकारोऽपि तु यकारः ॥१६॥
'ओषध' आदि शब्दों में स्थित 'औ'को 'ओ'कार हो जाता है । जैसे—
औषध = ओसढ़ । तथा प्रचय, अचिर और अचल शब्दों में स्थित 'च'२ को
'य' हो जाता है । यथा प्रचय = पयय, अचिर=अयिर, अचल=अयल ॥१६॥
४अपरस्परनिष्पन्ना ह्येवं प्राकृतसमाश्रया वर्णाः ।
संयुक्तानां तु पुनर्वक्ष्ये परिवृत्तिसंयोगम् ॥ १७ ॥
इस प्रकार मैंने असंयुक्त वर्णों वाले प्राकृत शब्दों के वर्ण ( परिवर्तन )
विषयक नियम बतलाए । अब मैं संयुक्त वर्णों के ( विषय में ) होने वाले
परिवर्तन, आदेश आदि नियमों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
संयुक्त-व्यञ्जन—
५श्वप्सत्सथ्याः छ इति तथा भ्यह्यध्या ६भवन्ति तु झकाराः ।
७ष्ठः ट्टः स्तः त्थः ष्मो म्ह क्ष्णो ण्हः ष्णो ण्हः क्षः खकाररूपोऽपि ॥१८॥
१ मृग तथा मृत शब्द में स्थित 'मा' में एक संघर्षीकृत या ऊष्म 'द' होगा
जो 'याश्रुति' के अनुसार प्राचीन काल में ही ध्वनिपरिवर्तन के कारण
लुप्त हो जाने से संप्रति प्रतीत नहीं होता है ।
२. यहाँ 'च' के लिए संभवतः याश्रुति को मानना उसके सहसा सुस्पष्ट लोप
को प्रकट नहीं करता प्रतीत होता है ।
१. ओकारत्वं गच्छन्ताकार—क०; ओकारत्वं गच्छत्योवार—ख०; ग० ।
२. प्रचलायिताचल—प्रचलापिताचला—क०; प्रचया चिरा—ख०; ग० ।
३. चकारवर्णोऽपि च यकारः—ख०; ग० ।
४. अपरस्वरनिष्पन्ना—ख०; ग० ।
५. झप्सश्चः छ इति तथा राज्ञै तु तकार योग उपयातः, तच्छो अच्छरपच्छ
रूपे च्सं संज्ञाह्य स च सझौ—( ? ) क०; श्चत्सप्सां च्छ इति ध्यम्हयो-
र्भवति तुज्झकारः—ख०; ग० ।
६. व्रजति वै झत्वम्—क० ।
७. ष्ठो ट्टो स्तोत्रः शेषो लक्ष्मक्ष्मो ह्वक्षणः खकाररूपोऽवि, स्तत्थोष्ट्ठः क्ष्ण
ख इति चैव स्यात्, श्चत्सथ्याः छ इत्यह्व्याम्बा भवन्ति तु झकाराः,
यूष्ट स्तः त्थः भ्याह्लः क्लाष्टा ह्लक्षः ख इति चैव स्यात् ( ? )—क०;
ष्ठः ट्ठः स्तः त्थ ष्णलक्ष्णां ह्रः क्षः खकाररूपो हि—ख०; ग० ।