नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ नाट्यशास्त्रम्
जब एक साथ किसी को छलने या भ्रम उत्पन्न करने के लिये दो या
तीन बार कपट प्रयोग का सहारा लेते हुए कथन किया जाए तो ऐसी उक्ति
को 'कपटसंघात'१ समझना चाहिए ॥ ३० ॥
क्षमा—
दुर्जनोदाहृतै रूक्षैः सतां१ मध्येऽभिताडितः२ ।
अक्रोधः क्रोधजननैर्वाक्यैर्यैः सा क्षमा भवेत् ॥ ३१ ॥
जब किन्हीं दुष्ट पुरुषों के द्वारा सज्जनों के समक्ष सभा में अभिहित
उत्तेजक एवं क्रोध के उत्पन्न करने वाले वचनों से अभिभूत होने पर भी जो
व्यक्ति शान्त एवं क्रोधहीन दशा में स्थित हो तो ऐसे गुण को 'क्षमा'२
समझना चाहिए ॥ ३१ ॥
प्राप्ति—
दृष्ट्वावयवं३ किञ्चिद्भावो४ यत्रानुमीयते ।
प्राप्तिं५ तामभिजानीयाल्लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ ३२ ॥
जब (किन्ही) चेष्टाओं को देखकर ही किसी के मनोगत भाव को जान
लिया जाए उसे उत्तम नाटकों में स्थित 'प्राप्ति'३ नामक लक्षण समझना
चाहिए ॥ ३२ ॥
१. 'कपट' या 'कपटसंघात' के स्थान पर अन्य पाठ में 'गर्हण' मिलता है ।
भोज ने कपट का लक्षण इस प्रकार दिया है—
अदिव्यं दिव्यमपि वा कृत्वा रूपविपर्ययम् ।
अविद्वान् वञ्च्यते येन कपटं तदुदाहृतम् ॥
अर्थात् जब किसी दिव्य या अदिव्य वेश को धारण कर अपने रूप में
परिवर्तन के द्वारा किसी साधारण मनुष्य (अविद्वान्) को धोखा दिया जाता हो
तो यह कार्य 'कपट' कहलाता है ।
२. क्षमा के स्थान पर अन्य पाठ में 'विशेषण' मिलता है ।
३. 'प्राप्ति' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भी समान हैं ।
१. सतां मध्ये—क० । २. तिताडितः—ख०; ग० ।
३. दृष्ट्वावयवं—ख०; दृष्टैर्वावयवैः—ग० ।
४. यत्रोपनीयते—क०; यत्रोपमीयते—ख०; ग० ।
५. तामपि—ग० ।