नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः ३२१
हो जाए तो अनेक विचारों के द्वारा प्रयुक्त ऐसे कथन को 'संशय' समझना
चाहिए ॥ २७ ॥
आशीः—
यथा¹ शास्त्रार्थसम्पन्नां² मनोरथसमुद्भवम्³ ।
अप्रार्थनीयामन्यां⁴ वा विदुस्तामाशिषं बुधाः ॥ २८ ॥
जब किसी नीति या शास्त्र के अनुसार मनोऽनुकूल भावना से उद्भूत
बिना किसी प्रार्थना के करने पर जो आशीर्वाद दिया जाता हो तो उसे
विद्वज्जन 'आशीः'² नामक लक्षण कहते हैं ॥ २८ ॥
प्रियवचन—
आदौ यत् क्रोधजनन मन्ते हर्षप्रवर्धनम् ।
तत् प्रियं वचनं ज्ञेयमाशीर्वादसमन्वितम् ॥ २९ ॥
जो आरम्भ में क्रोध को और अन्त में हर्ष को उत्पन्न करते हुए किसी
आशीर्वाद की सूचना देता हो तो ऐसा कथन 'प्रियवचन'³ (या प्रियोक्ति)
कहलाता है ॥ २९ ॥
कपटसंघात—
⁵छलयुक्त्या त्वन्येषामभिसन्धानाभिभावकं कपटम् ।
द्वित्रिप्रयोगयुक्तौ विज्ञेयः कपटसङ्घातः ॥ ३० ॥
१. 'संशय' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भी समान है । इसके
अतिरिक्त 'भ' पाठ के अनुसार—
परप्रशंसावचनं प्रयुक्तं योऽभ्यसूयते ।
पूर्वोत्तराभ्याघातः संशयः स तु कीर्तितः ॥
(अन्य पुरुष की प्रशंसा में कहे गये कथन को सुनकर जिसके मन में असूया
उत्पन्न हो तथा पूर्व कथन से उत्तर कथन का इसी कारण जब विरोध होने लगे
तो इसे 'संशय' समझना चाहिए ।)
२. 'आशीः' के स्थान पर अन्य पाठ में 'निदर्शन' मिलता है ।
३. प्रियवचन या प्रियोक्ति के स्थान पर अन्य पाठ में 'अंश' प्राप्त
होता है ।
१. यदा—क०; यत्र—ग० । २. सम्पन्नं—क० ।
३. समुद्भवम्—क० । ४. नीयमन्यं वा—क० ।
५. छलयुक्त्या यदान्येषां मत्वा नायकभावनम् ।
द्वित्रिप्रयोगयुक्तेन ज्ञेयं कपटसंज्ञितम् ॥—क० ।
२१ ना० शा० द्वि०