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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 668 में से

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पृष्ठ 428

सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१७
अनेक व्यक्तियों के कथन को सुनकर किसी एक असाधारण अर्थ का
प्रमाण पुरस्सर वचन के आधार पर निश्चय करना 'हेतु' कहलाता है ॥१४॥
सारूप्य—
१अपदेशस्तु परोक्षो यस्मादुत्पद्यतेऽनुकरणेन ।
लक्षणसमानकरणात्२ सारूप्यं तत्तु विज्ञेयम्३ ॥ १५ ॥
किसी तथ्य को न जानकर यदि अनुकरण के अनुसार आधार लेकर
लक्षण की आलोचना करते हुए सप्रमाण वस्तु का स्थापन किया जाए तो
उसे 'सारूप्य'२ समझना चाहिए ॥ १५ ॥
मिथ्याध्यवसाय—
४अभूतपूर्वैर्यात्रार्थैस्तत्तुल्यार्थस्य निर्णयः ।
स मिथ्याध्यवसायस्तु प्रोच्यते काव्यलक्षणम्५ ॥ १६ ॥
जहाँ किन्हीं अतथ्यभूत या अनृत अर्थों के द्वारा उसी के समान असत्
वस्तु का वक्तृत्वपूर्ण पदावली में निर्धारण या विनिश्चय किया जाता हो तो
उसे 'मिथ्याध्यवसाय'३ नामक काव्य लक्षण समझना चाहिए ॥ १६ ॥
सिद्धि—
बहूनाञ्च प्रधानानां ६मध्ये यन्नाम कीर्त्यते ।
७एकार्थसाधनकृतं सा सिद्धिरिति कीर्तिता ॥ १७ ॥
अनेक प्रसिद्ध या प्रमुख व्यक्ति या पदार्थों के बीच यदि एक अप्रसिद्ध
नाम का अभिधान उसके असाधारणत्व के निदर्शनार्थ निविष्ट किया जाता
है तो उसे 'सिद्धि'४ समझना चाहिए ॥ १७ ॥
१. हेतु का सन्निवेश दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण दोनों भिन्न हैं ।
२. सारूप्य के स्थान पर अन्य पाठ में दिष्ट या दृष्ट को रखा गया है ।
३. मिथ्याध्यवसाय के स्थान पर अन्य पाठ में 'विपर्यय' मिलता है ।
४. सिद्धि' का लक्षण दोनों पाठों में मिलता है परन्तु लक्षणों में थोड़ा विभेद
प्राप्त होता है ।
१. अपदेशेन परोक्षो योऽर्थो ह्युत्पद्यते—क० ।
२. योगात्—क० । ३. निर्द्दिश्यम्—क० ।
४. अभूतपूर्वे यत्रार्थे तुल्यस्यार्थस्य निर्णयः—ख०; ग० ।
५. लक्षणे—ख० ।
६. नाम यत्राभिकीर्त्यते—क० ।
७. अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं—क० ।