नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः
भाषाविधानाध्यायः
प्राकृत-पाठ्य-लक्षण—
एवन्तु¹ संस्कृतं पाठ्यं मया प्रोक्तं समासतः² ।
प्राकृतस्य³ तु पाठ्यस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १ ॥
इस प्रकार (पूर्व अध्याय में) मैंने संक्षेप में संस्कृत-पाठ्य¹ के विषय में
बतलाया। अब मैं प्राकृत-पाठ्य का लक्षण कहता हूँ ॥ १ ॥
एतदेव विपर्यस्तं संस्कारगुणवर्जितम् ।
विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नानावस्थान्तरात्मकम् ॥ २ ॥
यही संस्कृतपाठ्य जब संस्कार के गुणों से हीन होकर परिवर्तित
१. पिछले दो अध्यायों में वाचिक अभिनय के निरूपण के प्रसंग में संस्कृत
तथा प्राकृतपाठ्य का उल्लेख किया जा चुका है। इनमें संस्कृतपाठ्य के
सन्दर्भ में विविध छन्दों का लक्षणपूर्वक निरूपण पिछले अध्याय में होने
पर भी प्राकृत पाठ्य का स्वरूप शेष ही रह जाता है। अतएव इस
अध्याय में प्राकृत-पाठ्य का स्वरूप निरूपण आवश्यक होने के कारण
इसकी पूर्व अध्याय से संगति (स्थापित होती) है। 'पाठ्य' का अर्थ
है जो विशेषतापूर्वक पढ़ा या कहा जाए या प्रयत्नपूर्वक पढ़े जाने या
कहे जाने के जो योग्य हो अथवा जो किसी विशेष रूप में या विशेष
विधि के द्वारा उच्चारित हो, क्योंकि आन्तरिक चित्तवृत्ति के अनुरूप
जब किसी वचन का उच्चारण उपयुक्तता किये हुए होता है तभी उसे
पाठ्यसंज्ञा प्राप्त होती है जिसकी आचार्य द्वारा विधिवत् शिक्षा दी जाए
और ऐसा शिक्षित होकर किया हुआ उच्चारण ही 'पाठ्य' कहलाता भी
है। आचार्य अभिनवगुप्त ने पाठ्य शब्द के यही तीन प्रकार के निर्वचन
प्रस्तुत किये हैं। (द्र० अभि० भा०—पठनाहं, पठितुं शक्यम् आचार्य-
यत्नेन वा पठनीयमिति पाठ्यम् ।)
१ पाठ्यन्तु संस्कृतं विप्राः; एतत्तु—क० ।
२. द्विजोत्तमाः—ग० । ३. प्राकृतस्यापि—क० ।