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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

सप्तदशोऽध्यायः २९३
यथा—केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः१ शोभते प्रवरकाननहस्ती ।
केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः२ शोभते प्रवरकाननहस्ती ॥ ६९ ॥
इस विशाल वन-गज के दांत केतकी के पुष्पों जैसे श्वेत पीत दिखाई
दे रहे हैं। तथा हाथी-रूपी विशालवन अपने केतकी के पुष्पों के पीले नीले
रंग के दांतों से और अधिक सुन्दर दिखलाई पड़ता है ॥ ६९ ॥
विक्रान्त यमक—
एकैकं पादमुत्क्रम्य३ द्वौ पादौ सदृशौ यदा४।
विक्रान्तयमकं नाम ५विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ७० ॥
यदि एक पाद को छोड़कर दूसरा पाद समान हो (अर्थात् द्वितीय और
चतुर्थ पाद की रचना समान हो) तो उसे 'विक्रान्त यमक' जानें ॥ ७० ॥
यथा—स६ पूर्वं वारणो भूत्वा द्विशृङ्ग इव पर्वतः।
अभवद्दन्तवैकल्याद्विशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ७१ ॥
यह हाथी पहिले अपने दो अंगों (दांत, चोटी) वाले पर्वत से तुलनीय
रहता था अब इसके दोनों दांत टूट जाने से यही शृङ्गहीन पर्वत जैसा हो
रहा है ॥ ७१ ॥
चक्रवाल यमक—
पूर्वस्यान्तेन पादस्य ७परस्यादिर्यदा समः।
चक्रवच्चक्रवालं तद् विज्ञेयं नामतो यथा८ ॥ ७२ ॥
यदि पादान्त शब्द की दूसरे पाद के प्रारंभ में आवृत्ति की जाए तो उसे
'चक्रवाल यमक' कहते हैं ॥ ७२ ॥
यथा—शैलास्तथा९ शत्रुभिराहताहता
हताश्च १०भूयस्त्वनुपुङ्गगैः खगैः।
१. मुकुल—ख०; ग० । २. मुकुल—ख०; ग० ।
३. मुत्क्षिप्य—ख० । ४. यदि—ग० । ५. तद्विज्ञेयमिदं—क० ।
६. सम्पूर्णवारणो—ख०; स पूर्वं वानरो—ग० ।
७. पादस्या—क० ।
८. चक्रवालयमकस्य लक्षणान्तरं क—पुस्तके तु —
तुल्यात् पादद्वयादन्त्यादेकेनादिर्यदा समः ।
सर्वत्र चक्रवालं तद्विज्ञेयं नामतो यथा ॥ इति अधिकं प्रक्षिप्तञ्च ।
९. तलैस्तथा—क०; शैला यथा—ख० ग० ।
१०. भूयोऽप्यनु—ख०; बाणैरनुपुङ्गगै—ग० ।

२९४ नाट्यशास्त्रम्
खगैश्च सर्वैर्य्युधिसञ्चिताश्रिता-१
श्रिताधिरूढ़ा २निहतास्तलैस्तलैः ॥ ७३ ॥
जैसे ये पर्वत शत्रुओं के बाणों और उनके पीछे आने वाले शिकारी
पक्षियों से आहत होकर मर गए वैसी ही यह युद्ध भूमि भी ऐसे 'खों वाले'
पक्षियों की तरह बाणों से आच्छादित हो गई है और चिता पर रखे हुए शव
इन पक्षियों की चोंचों से और नखों से क्षतविक्षत हो गए हैं ॥ ७३ ॥
सन्दष्ट-यमक—
आदौ द्वे यत्र पादे तु भवेतामक्षरे समे ।
३सन्दष्टयमकं नाम विज्ञेयं ४नामतो यथा ॥ ७४ ॥
यदि पाद के प्रारंभ में दो समान शब्दों की आवृत्ति हो तो 'सन्दष्ट-
यमक' होता है ॥ ७४ ॥
यथा—
पश्य५ पश्य रमणस्य मे गुणान्६ येन येन वशगां करोति माम् ।
येन येन हि ममैति दर्शनं७ तेन तेन वशगां करोति माम् ॥ ७५ ॥
देखो देखो, मेरे प्रिय की विशेषताएं; जिनसे वह मुझे आकृष्ट कर रहा है,
यह जब भी मेरी दृष्टि में आता है तभी मुझे अपनी ओर झुका लेता है ॥७५॥
पादादियमक—
आदौ पादे ८तु यत्र स्यात् समावेशसमाक्षरः९ ।
पादादियमकं नाम विज्ञेयं१० नामतो यथा ॥ ७६ ॥
यदि प्रत्येक पाद के प्रारंभ में आनेवाले शब्द की आगे के सभी पादों में
आवृत्ति हो तो 'पादादियमक' होता है ॥ ७६ ॥
यथा—विष्णुः सृजति भूतानि विष्णुः संहरते प्रजाः ।
विष्णुः ११प्रसूते त्रैलोक्यं १२विष्णुर्लोकाधिदैवतम् १३ ॥७७॥
१. सञ्चिताञ्चिता—ग० ।
२. निहताः फलैः फलैः—ख; हि हता हता नराः—ग० ।
३. सन्दंशं—क० । ४. तद् बुधैः—ख०; ग० ।
५. यस्य यस्य—ग० । ६. गुणाः—क०; ग० ।
७. दिनमेति—ख०; हि समैति—ग० । ८. पादस्य—ख०; ग० ।
९. समावेशः समाक्षरः—ख०; ग० ।
१०. तद्विज्ञेयं बुधैर्यंथा—ख०; ग० । ११. विष्णुप्रसूतं—क० ।
१२. यच्च—क० । १३. लोकादिदैवतम्—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३९५
विष्णु समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं, वे ही संहार करते हैं तथा वे
ही त्रिलोकी का निर्माण भी करते हैं। ये श्री विष्णु भगवान् सभी लोकों के
स्वामी हैं ॥ ७७ ॥
आम्रेडित यमक—
पादस्यान्त्यं पदं १यत्र द्विर्द्विरेकमिहोच्यते ।
२ज्ञेयमाम्रेडितं नाम यमकं तत्तु सूरिभिः ॥ ७८ ॥
यदि पाद का अन्तिम पद दो बार आवृत्त हो तो उसे आम्रेडित यमक
जानो ॥ ७८ ॥
यथा—
विजृम्भितं निःश्वसितं मुहुर्मुहुः ३कथं विधेय स्मरणं पदे पदे ।
यथा च ते ध्यानमिदं पुनः पुनः ४ध्रुवं गता ते रजनी विना विना ॥७९॥
लम्बी उसासें लेते हुए जैसे ही तुमने उसका नाम लिया उसका मुझे
तुरन्त स्मरण हो आया और फिर निश्चल हो उसी के ध्यान में ( मेरी )
उदास होते हुए मेरी सारी रात बीत गई ॥ ७९ ॥
चतुर्व्यवसित यमक—
सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः ।
चतुर्व्यवसितं नाम तद्विज्ञेयं बुधैर्यथा ॥ ८० ॥
यदि चारों पाद समान अक्षर वाले हों तो 'चतुर्व्यवसित यमक'
होता है ॥ ८० ॥
यथा— ५वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ।
वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ॥ ८१ ॥
यह समय पुष्पों ( वारण ) ( की बहार ) का है, यही वह ऋतु है जब
हाथी ( वारण ) व्याधिरहित होता है । यह शत्रुओं के ( आक्रमण हेतु )
आने का समय और उनके प्रतीकारार्थ वीरों के युद्धभूमि में कूदने का भी
यही समय है ॥ ८१ ॥
१. यच्च—ग० ।
२. पादान्ताम्रेडितं नाम विज्ञेयं निपुणैर्यथा—ख०; ग० ।
३. यथाभिधानं—क०; ग०; कथाभिधानं—ख० ।
४. तथागता ते—ख०; ग० ।
५. सावारणानामिति सर्वत्र पाठः । ख० पुस्तके; ग० पुस्तके तु 'सावारणा-
नामसमेव' इति पाठः समुपलभ्यते ।

२९६ नाट्यशास्त्रम्
मालायमक—
नानारूपैः स्वरैर्युक्तं१ यत्रैकं व्यञ्जनं भवेत् ।
तन्मालायमकं नाम विज्ञेयं काव्यकोविदैः२ ॥ ८२ ॥
जब अनेक व्यञ्जनों से युक्त एक ही स्वर विभिन्न शब्दों में आता हो तो
उसे मालायमक कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा—हली बली हली३ माली खेली४ माली सली जली ।
५खलो बलो बलो मालो मुसली त्वभिरक्षतु६ ॥ ८३ ॥
जो वीर, मालाओं से विभूषित, हाथ में अनाज की बाली रखे हुए,
खिलाड़ी, लड़खड़ा कर चलने वाले, भावों से ओतप्रोत, शक्तिशाली, चंचल
नेत्रों वाले और हाथ में गदा धरने वाले हैं वे भगवान् बलराम तुम्हारी
रक्षा करें ॥ ८३ ॥
असौ हि रामा रतिविग्रहप्रिया७ रहः प्रगल्भा रमणं मनोगतम्८ ।
रतेन रात्रौ९ रमयेत् परेण वा न चेदुदेष्यत्यरुणः पुरो रिपुः ॥८४॥
प्रणय द्वन्द्व में रुचि लेने वाली यह सुन्दरी रमणी रात में अपने
प्रगाढ़ आलिंगन से अपने प्रियतम को बिना लज्जा किये हुए तब तक
रिझाती रहेगी जब तक उसका शत्रु सूर्य सम्मुखवर्ती पूर्व दिशा में उदय
नहीं हो जाता ॥ ८४ ॥
स पुष्कराक्षः क्षतजोक्षिताक्षः१० क्षरत्क्षतेभ्यः क्षतजं दुरीक्ष्यम्११ ।
क्षतैर्गवाक्षैरिव संवृताङ्गः१२ साक्षात् सहस्राक्ष इवावभाति ॥८५॥
यह वीर जो कमल के समान नेत्र वाला है, जिसके नेत्र क्रोध से भरे
होने से रक्त से नहाए हुए से लगते हैं, जिसके घावों से रक्त बह रहा है और
जिसके शरीर के घाव वातायन के समान मोटे और खुले हुए हैं, अतएव
यह सम्प्रति सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र जैसा लग रहा है ॥ ८५ ॥
१. यत्र—ग० । २. पाठकैर्यथा—ख०; पण्डितैर्यथा—ग० ।
३. लली—ख०; ग० । ४. शूली जाली लली जली—ख०; ग० ।
५. बलो बलोच्चलोलाक्षो—ख०; ग० ।
६. त्वाभिरक्षतु—ग० । ७. विग्रहः—ख० ।
८. मनोद्गतम्—क०; रहोगतम्—ख०; ग० ।
९. रात्रि—ख०; ग० । १०. क्षतजीक्षिताक्षः—ख०; ग० ।
११. दुरीक्ष्यः—ख० । १२. संवृताक्षः—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २१७
एभिरर्थक्रियायुक्तैः¹ काव्यं कुर्यात्तु² लक्षणैः।
अतः परं³ प्रवक्ष्यामि काव्यदोषान् गुणाँस्तथा⁴ ॥ ८६ ॥
नाटकों की रचना (उनके) विषय तथा कार्य (अवस्था) आदि का
विचार करते हुए इन अलङ्कारों की योजना काव्य में करनी चाहिए। अब मैं
काव्य रचनाओं में होने वाले दोषों को बतलाता हूँ ॥ ८६ ॥
काव्यदोष—
⁵गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम्।
न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं⁶ वै दश काव्यदोषाः ॥८७॥
काव्यगत दोष दस (प्रकार के) हैं। यथा—(१) गूढार्थ,
(२) अर्थान्तर, (३) अर्थहीन, (४) भिन्नार्थ, (५) एकार्थ,
(६) अभिप्लुतार्थ, (७) न्यायादपेत, (८) विषम, (९) विसन्धि
तथा (१०) शब्दच्युत ॥ ८७ ॥
⁷पर्यायशब्दाभिहितं गूढार्थमिति⁸ संज्ञितम्।
गूढार्थः—जहां पर्यायवाचक (अप्रसिद्ध) शब्दों द्वारा वर्ण्य या विषय
को कह दिया जाय तो उसे 'गूढार्थ' समझना चाहिए।¹
अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र⁹ तदर्थान्तरमिष्यते ॥ ८८ ॥
अर्थान्तर—जहाँ अवर्णनीय विषय का वर्णन किया जाय उसे अर्थान्तर²
दोष कहा जाता है ॥ ८८ ॥
१. 'गूढार्थ' में क्लिष्ट शब्द का प्रयोग करने से अर्थ-ज्ञान में कठिनाई आ
जाती है। जैसे—दशरथ के लिये 'एकाधिकनवविमान' पद का प्रयोग।
परवर्ति आचार्योंके 'निहतार्थत्व' दोष से इसकी तुलना की जा सकती है।
२. वर्णनीय अर्थ के साथ किसी अनभीष्ट या अवर्णनीय अर्थ की भी जब साथ-
साथ प्रतीति हो तो 'अर्थान्तर' होता है। जैसे—'चिन्तामोहमनङ्गमङ्ग
तनुते विप्रेक्षितं सुभ्रुवः' यहाँ काम का बतलाना इष्ट है पर इसी के साथ
बुद्धि में चिन्ता और मोह की भी बिना वर्णन के प्राप्ति हो जाती है।
इसे मम्मटादि सम्मत 'अमतपरार्थता' दोष मानना चाहिए।
१. क्रियापेक्षं—ख०; क्रियापेक्षैः—ग०।
२. कार्यं तु—ख०। ३. ऊर्ध्वं तु वक्ष्यामि—ग०।
४. समासतः—ख०; दोषाँस्तथाविधान्—ग०।
५. अगूढ—ग०। ६. च्युतञ्च शब्दात्—शब्दात् च्युतं—क०।
७. इतः आरभ्य सार्धश्लोकपञ्चकं केषुचिदादर्श पुस्तकेषु नास्ति।
८. मभिसंज्ञितम्—क०; ग०। ९. यत्तु—क०।

२९८ :नाट्यशास्त्रम्
अर्थहीनं त्वसम्बद्धं ¹सावशेषार्थमेव च ।
अर्थहीन—जो असम्बद्ध अर्थ हो या जो अर्थ असमाप्त ( अधूरा ) हो
तो उसे 'अर्थहीन' दोष कहा जाता है ।
भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसम्य² ग्राम्यमेव च ॥ ८९ ॥
भिन्नार्थ—असभ्य या ग्राम्य अर्थ के सूचक अर्थ को भिन्नार्थ² दोष
जानो ॥ ८९ ॥
विवक्षितोऽन्य³ एवार्थो ⁴यत्रान्यार्थेन विद्यते ।
भिन्नार्थं तदपि⁵ प्राहुः काव्यं काव्यविचक्षणाः⁶ ॥ ९० ॥
अथवा जहाँ विविक्षित अर्थ के स्थान पर अविवक्षित अर्थ का कथन
किया जाय तो उसे भी विद्वान् 'भिन्नार्थ' दोष कहते हैं ॥ ९० ॥
⁷अविशेषाभिधानं यत्तदेकार्थमिति स्मृतम् ।
१. पूर्व कथन से उत्तर कथन के विरोध होने पर अर्थ के असम्बद्ध हो जाने
से यह दोष हो जाता है । जैसे—'अद्यापि स्मरति रसालसं मनो मे
मुग्धायाः स्मरचतुराणि' इत्यादि । ( मेरा रस या आनन्द से मन्थर मन
अभी भी उस स्मरचतुरा मुग्धा ( भोली ) का स्मरण करता है ) यहाँ
मुग्धा कहकर स्मरचतुरा बतलाना पूर्वकथन से उत्तरकथन का विरोध
है । इसी प्रकार असमाप्त या अधूरे कथन के रहने पर यह उदाहरण—
'स महात्माभाग्यवशान्महापदमुपागतः ।' ( वह महामना भाग्यवश महान्
पद या महती आपत्ति को प्राप्त कर गया । ) प्रस्तुत उदाहरण में
प्रकरण के अनुसार अन्य सम्बद्ध शब्द की न्यूनता या वक्तव्य शेष होने से
'अर्थहीन' दोष हो गया है ।
२. भिन्नार्थ दोष की तीन अवस्था में उपलब्धि होगी । ( १ ) जहाँ व्यवधान
के कारण अर्थ का अन्वय करने में कठिनाई आए, ( २ ) जहाँ असभ्य
या ग्राम्य अर्थ का अभिधान हो तथा ( ३ ) विवक्षित या उद्दिष्ट अर्थ के
विपरीत कथन या उद्दिष्टार्थ का अन्यथाकरण हो ।
१. सा त्वशेषार्थमेव च—ख०; ग० ।
२. मपि—क० । ३. विवक्षितान्य—क० ।
४. यत्वन्यार्थेन भिद्यते—क०; ग० । ५. तत्तु ते—क० ।
६. काव्यविदो जनाः—क०; काव्यविचक्षणाः—ख०; ग० ।
७. एकार्थस्याभिधानं यत्—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २९९
एकार्थ—जहां अनेक शब्दों का एक ही अर्थ के लिए प्रयोग किया जाय
तो 'एकार्थ' नामक दोष होता है।
१अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं यत् पदेन समस्यते ॥ ९१ ॥
अभिप्लुतार्थ—जिसके प्रत्येक पाद में संक्षेप में वाक्यार्थ (पूर्णरूप से)
स्थापित किया जाय उसे 'अभिप्लुतार्थ'२ नामक दोष जानो ॥ ९१ ॥
न्यायादपेतं विज्ञेयं २प्रमाणपरिवर्जितम् ।
न्यायादपेत—प्रमाण रहित विषय का कथन 'न्यायादपेत'३ नामक
काव्य दोष कहलाता है।
वृत्तभेदो३ भवेद्यत्र विषमं नाम तद्भवेत् ॥ ९२ ॥
विषम—छन्दों भंग होने पर 'विषम'४ नामक काव्य-दोष हो जाता है।
४अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसन्धीति कीर्तितम् ।
१. एकार्थ दोष का उदाहरण है :—'कुन्देन्दुहारहरहाससितम्' यहाँ वर्ण्य की
शुभ्रता के लिये कुन्द, चन्द्र, पुष्पमाला, शिवजी का हास आदि अनेक
उपमाएँ दी जाने से यह कथन एक ही अर्थ की पूर्ति करता है।
२. प्रत्येक पाद में अर्थ समाप्त हो जाने के कारण एकवाक्यता न आने से
अभिप्लुतार्थ दोष हो जाता है। जैसे :—
स राजा नीतिकुशलः सरः कुमुदशोभितम् ।
सर्वाप्रिया वसन्तश्री ग्रीष्मे मालतिकागमः ॥
यहाँ प्रत्येक पाद का अर्थ दूसरे किसी पाद के विषय से सम्बद्ध नहीं है।
३. प्रमाणरहित विषय का आशय है कि देश तथा काल के या कला एवं
शास्त्रादि के विपरीत अभिधान करना न्यायादपेत दोष है।
जैसे—सुबीरेष्वस्ति नगरी मथुरा नाम विश्रुता ।
अक्षोटनारिकेलाढ्या यस्याः पर्यन्तभूमयः ॥ इति ।
४. यति भंग के या छन्द के लक्षण का व्यवस्थित अनुगमन न करने के
कारण 'विषम' नामक काव्यदोष होगा। इसे ही उत्तरवर्ती आचार्यों ने
'हतवृत्तता' दोष कहा है।
१. अविप्लुतार्थ—क० ।
२. नोपपन्नं भवेत्तु यत्—क०; प्रमाणपरिवर्तितम्—ग०।
३. वृत्तभेदे—क०; वृत्तदोषो—ख०; ग०।
४. अनुपारूढ़शब्दश्च विसन्धिः परिवर्जितः—क०; अनुप्रतिष्ठाशब्दं यत्
तद्विसन्धीति काशितम्—ख०; ग० ।

यहाँ पृष्ठ की सामग्री का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

३०० नाट्यशास्त्रम्
विसन्धि—यदि शब्दों को परस्पर सन्धि हीन दशा में रखा जाय तो
वहाँ 'विसन्धि' नामक दोष होता है।
'शब्दच्युतश्च विज्ञेयमवर्णस्वरयोजनात्' ॥ ९३ ॥
शब्दच्युत—जहां एक वर्ण या स्वर का लोप कर दिया जाय तो वहाँ
'शब्दच्युत'² दोष होता है ॥ ९३ ॥
³एते दोषा हि काव्यस्य मया सम्यक् प्रकीर्तिताः ।
गुणा विपर्ययादेषां माधुर्यौदार्यलक्षणाः ॥ ९४ ॥
काव्य के ये ही दोष हैं जो मैंने आपको बतलाए। इन्हीं दोषों का
विपरीत स्वरूप में रहना 'गुण' कहलाता है जो उनके लक्षणानुसार माधुर्य,
औदार्य आदि अर्थों को वहन करते हो ॥ ९४ ॥
काव्य-गुण—
श्लेषः प्रसादः समता समाधिः माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम् ।
अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्च ⁴काव्यस्य गुणा दशैते ॥ ९५ ॥
१. सन्धि के नियमों की उपेक्षा करने से काव्य में विसन्धि दोष हो
जाता है।
२. शब्दच्युत नामक दोष प्राकृतिक कारणों या दैनिक आदत के कारण
किन्हीं वर्ण के लोप करने या अन्यथा-करण के कारण होता है।
आचार्य अभिनवगुप्त ने इन दोषों में स्थूल दोषों को अनित्य तथा
शेष अRequest स्थूल दोषों को नित्य माना है। उनका मत है कि गूढ़ार्थ का
पताकास्थानकादि में प्रयोग करना, अनुवाद में अर्थान्तर दोष का प्रयोग
करना, हास्य में अर्थहीन दोष का प्रयोग, श्रोत्रियादि वक्ता के समक्ष
भिन्नार्थ दोष का प्रयोग, दूसरे को समझाने में एकार्थ दोष का प्रयोग,
उन्मादादि की दशा में अभिप्लुतार्थ दोष का प्रयोग तथा स्वयं के लिये
भिन्नवृत्त या विसन्धिदोष का प्रयोग-स्थल होने के कारण ग्राह्य या
प्रयोज्य हो सकता है अथवा ऐसी स्थिति में ये दोष नहीं भी माने जा
सकते हैं।
१. शब्दाच्च्युतं—क०; शब्दहीनं—ख०; ग० ।
२, मशब्दस्य च योजनात्—ख०; ग० ।
३. एते दोषास्तु विज्ञेयाः सूरिभिर्नाटकाश्रयाः ।
एत एव विपर्यस्ताः गुणाः काव्येषु कीर्तिताः ॥—ख०; ग० ।
४. काव्यार्थगुणा दशैते—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३०१
काव्य के दस गुण होते हैं। १ यथा - (१) श्लेष (२) प्रसाद
(३) समता (४) समाधि (५) माधुर्य (६) ओज (७) पद-
सौकुमार्य (सुकुमारता) (८) अर्थव्यक्ति (९) उदारता तथा
(१०) कान्ति ॥ ९५ ॥
श्लेष—
ईप्सितेनार्थजातेन १सम्बद्धानां परस्परम् ।
श्लिष्टता या पदानां २स श्लेष इत्यभिधीयते ॥ ९६ ॥
इष्ट अर्थों से परस्पर-सम्बद्ध पदों की श्लिष्टता (मसृणबन्धयोग) को
'श्लेष'-गुण कहा जाता है ॥ ९६ ॥
१. भामह तथा दण्डी ने काव्य के दस गुण माने हैं परन्तु उनके वर्णन
लक्षणादि भरतमुनि से भिन्न प्राप्त होते हैं। (द्र० भाम० काव्या० ३।१-४,
काव्यादर्श १।४१-९४) गुणों के लक्षण दो पाठों या तीन पाठों में मिलते हैं।
हेमचन्द्राचार्य आदि ने भरत के आधार पर गुणों का एक अलग ही पाठ
लिया जिसका वर्तमान नाट्यशास्त्र से भिन्न पाठ है। पर यह सभी गुणों
के लक्षणों में नहीं है। इसी कारण सभी लक्षणों को सम्मिलित करते
हुए तथा कुछ स्वोद्भावित गुणों को बढ़ाकर भोज तथा विद्यानाथ प्रभृति
ने चौबीस गुण प्रतिपादित किये हैं। कुछ आलङ्कारिक वामन एवं दण्डी
का अनुसरण करते हुए दस उनके सम्मत गुण मानते हैं। मम्मट तथा विश्वनाथ
कविराज ने तीन गुण ही काव्य के लिये स्वीकृत किये। गुणों के लक्षणानुसारी
विशद विवेचन का विकासपूर्ण क्रम हमने संक्षेप में परिशिष्ट में दे दिया है।
२. आचार्य अभिनवगुप्त के व्याख्यान के अनुसार कवि के द्वारा इष्ट अर्थों की
परस्पर सम्बद्ध पदों के द्वारा योजना करने पर जब पदों का परस्पर सन्धान इष्ट
अर्थ को उपपादित करता है तो 'श्लेष' नामक गुण समझना चाहिए। जैसे वामन
के द्वारा उदाहरण दिये गये निम्न पद्य में—
दृष्ट्वैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपैत्यादरात्
एकस्या नयने निमील्य विहितक्रीडानुबन्धच्छलः ।
ईषद्वक्रितकन्धरः सपुलकप्रेमोल्लसन्मानसा-
मन्तर्हासलसत्कपोलफलकां धूर्तोऽपरां चुम्बति ॥ (अम० श०)
(धूर्त नायक एक आसन पर बैठी हुई अपनी दोनों प्रियाओं को देखकर
आदरपूर्वक चुपचाप पीछे से आया और क्रीडा के व्याज से एक प्रिया की आँखें
१. सम्बद्धानुपस्परम्—ख०; ग० । २. हि—ख०; ग० ।

३०२ नाट्यशास्त्रम्
[ १विचारगहनं यत् स्यात् स्फुटश्चैव स्वभावतः ।
स्वतः सुप्रतिबद्धश्च श्लिष्टं तत् परिकीर्तितम्² ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जो रचना (वृत्ति) तर्क से विचार करने के उपरान्त ग्रहण
की जाय, जो स्वभाव से स्फुट तथा स्वयं एक दूसरे से अच्छी प्रकार संग्रथित
अर्थ वाली हो तो उसे भी 'श्लेष' गुण कहते हैं । ]
प्रसाद—
अप्यनुक्तो बुधैर्यत्र शब्दोऽर्थो वा प्रतीयते ।
सुखशब्दार्थसंयोगात्³ प्रसादः स तु कीर्त्यते ॥ ९७ ॥
सरल शब्दों तथा अर्थों के प्रयोग द्वारा बिना (स्पष्टता बोधक)
व्याख्यान के ही जहां अर्थावबोध सरलता से होता हो तो उसे 'प्रसाद'
गुण जानो ॥ ९७ ॥
समता—
नातिचूर्णपदैर्युक्ता न च व्यर्थाभिधायिभिः ।
⁴दुर्बोधैर्नैश्च न कृता समत्वात् समता मता ॥ ९८ ॥
अपने हाथों से बन्द कर अपनी गर्दन टेढ़ी करके प्रेम से रोमाञ्चित एवं मुस्कराने
वाली दूसरी प्रिया का चुम्बन करने लगा ।)
उक्त उदाहरण में एक साथ तथा एक ही समय दोनों नायिका के हृदय
ग्रहण करने के उद्योग को इतनी सम्बद्ध पदावली में उपपादित किया गया है कि
जिससे किसी भी नायिका की असंभावना के लिये थोड़ा भी अवकाश नहीं रहता
और नायक का कुटिलतापूर्ण आरम्भ भी हृदय में पैठकर माधुर्य की ही सृष्टि
करता है ।
१. अनुपयुक्त पदावली के अभाव के कारण बिना क्लिष्ट कल्पना के जब
अर्थ स्वयं (निर्मलता के कारण) प्रतीत होने लगे तो 'प्रसाद' गुण होता है ।
जैसे : —'सवर्णा कन्यका रूपयौवनारम्भशालिनी ।' (रूप एवं यौवन की प्राप्ति
के आरम्भ से सुशोभित यह कन्या सजातीय अथवा इष्ट है) ।
इस उदाहरण में अर्थ की निर्मलता धूल से असम्पृक्त जल सदृश अतिस्पष्ट
दिखलाई देती है तथा इस पद्य के उच्चारण मात्र से कन्या का विवाह के योग्य
होना, सुन्दरतापूर्ण होने से हृदयाकर्षक रहना तथा गृहस्थ धर्म के उपयुक्त होना
आदि अर्थ स्वतः व्यक्त हो जाने के कारण 'प्रसाद' गुण है ।
१. विचार्य ग्रहणं वृत्या—ग० । २. परिकीर्त्यते—ग० ।
३. सम्बोधात्—ग० । ४. न दुर्बोधा तैश्च कृता—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३०३
जिस रचना में असमस्त पद हों, वे व्यर्थ का अर्थ प्रकट न करते हों
तथा दुर्बोध न हों तो उसे शब्दों की समानता के कारण 'समता' नामक
गुण कहते हैं ॥ ९८ ॥
[ १अन्योन्य सदृशा यत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणाः ।
अलङ्कारा गुणाश्चैव समाः२ स्युः समता मताः ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जहां अलंकार तथा गुण समभाव से स्थित होकर एक दूसरे
के ( परस्पर ) शोभाक हों तो 'समता' नामक गुण जानो । ]
समाधि—
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्येहोपलक्ष्यते३ ।
तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्तितः४ ॥ ९९ ॥
प्रतिभाशाली व्यक्तियों के द्वारा विशेष अर्थ जिस रचना में देख लिया
जाय तो उसे 'समाधि' गुण जानों ॥ ९९ ॥
[ उपमाद्युपदिष्टानांमर्थानां५ यत्नतस्तथा ।
प्राप्तानाञ्चापि६ सङ्क्षेपात् समाधिर्निर्णयो७ यतः ॥ ]
१. आरम्भ किये हुए रचनाक्रम का परित्याग न करते हुए जब असमस्त
पदावली में रचना की जाए तो निष्प्रयोजन तथा दुर्बोध अर्थ के अभिधान न होने
से समता गुण कहलाता है। जैसे :—
'मनसि च गिरं गृह्णन्तीमे किरन्ति न कोकिलाः।'
प्रस्तुत उदाहरण में विप्रलम्भ के उद्दीपक कथन को बिना निरर्थक पदावली
का विस्तार करते हुए असमस्त रचना के द्वारा प्रस्तुत कर दिया गया है।
२. जिस काव्य रचना के अन्य अर्थ का अति प्रतिभाशाली पुरुष ही अपूर्वता
के कारण उल्लेख कर सकें उस एकतानता से उन्नेय या समाहित मन से प्रतीत
अर्थ विशेष के उल्लेख को 'समाधि' समझना चाहिए। यह अपूर्वता अयोनि
अथवा अपूर्वार्थ तथा अन्यच्छाया योनि अर्थ से आती है। इसके अतिरिक्त यहाँ
पदबन्ध में आरोह अवरोह के क्रम का निर्वाह भी अपेक्षित माना जाता है।
१. अन्योन्य सदृशं यत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणम्—ख०; ग० ।
२. समासात् समता यथा—ग० ।
३. र्थस्यैबोपलभ्यते—ख०; ग० । ४. परिकीर्त्यते—ग० ।
५. उपमित्युपदिष्टानां—उपमात्यपदिष्टानां—क० ।
६. क्वातिसंयोगात्—क०; क्वातिसंयोगः—ग० ।
७. परिकीर्त्यंते—क० ।

image again very, very carefully.
Let's trace each glyph between मन्था and वाम्भः:

  1. स् + त -> स्त
  2. ा -> mātrā
  3. A circle at mid-height: ° or ं? Wait, is it an anusvāra? No, it's a hollow circle. Wait, no, is it hollow? Look at सङ्घट्ट in the line below, look at the anusvara above स: it's a solid dot.
    The circle in line 25 is hollow: ० or °.
    Wait, what does a hollow circle mean in Sanskrit texts?
    It's often an abbreviation sign ० or indicates an omission / damaged letter in the manuscript!
    When a letter is broken/missing, editors put ° or ०!
    Wait, स्तब्ध has 2 letters (स्त and ब्ध).
    If ब्ध was omitted or illegible, they might have printed मन्थास्ता०र्णवाम्भः or मन्थास्तार्णवाम्भः!
    Wait, look at the glyph:
    Is it ा then ० then र्‍ण?
    Wait, could it be: मन्थास्तार्णवाम्भः where the ा is actually an independent stroke, and

सप्तदशोऽध्यायः ३०५
[ अवगीतोऽपि¹ हीनोऽपि स्यादादुदात्तावभासकः² ।
यत्र शब्दार्थसम्पत्या³ तदोजः परिकीर्तितम् ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जो रचना निन्दित (या हीन) होने पर भी उदात्त-अर्थ की
प्रतीति करवाने वाली हो तो शब्द और अर्थ की सम्पत्तिशालिनी ऐसी
रचना 'ओज' (गुण युक्त) कहलाती है । ]
सौकुमार्य—
⁴सुखप्रयोज्यैर्यच्छब्दैर्युक्तं सुश्लिष्टसन्धिभिः ।
सुकुमारार्थसंयुक्तं सौकुमार्यं⁵ तदुच्यते ॥ १०२ ॥
जो सुश्लिष्ट सरलता से युक्त सन्धि के कारण सरलता से व्यवहार किये
जाने वाले शब्दों तथा सुकुमार अर्थ से युक्त हो तो उसे ‘सौकुमार्य’ गुण
कहते हैं ॥ १०२ ॥
यहाँ 'र' वर्णं 'न्द' वर्णं की गुरुता की अपेक्षा से ग्रथित है । इसके अतिरिक्त
जब एक वस्तु की अनेक पदों से विस्तारपूर्वक वर्णना की जाए—जैसे
कालिदास के निम्न पद्य में—
"अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरेव द्योः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम् ।”
(रघु० २।७५)
तथा संक्षेप में अर्थभूयस्त्व को प्रकट करने पर भी 'ओज' गुण समझना
चाहिए। जैसे कुमारसंभव के निम्न पद्य में—
“ते हिमालयमामन्त्र्य पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम् ।
सिद्धञ्चास्मै निवेद्यार्थं तद्विसृष्टाः खमुद्ययुः ॥” (कु० सं० ६।९३)
आचार्य हेमचन्द्र ने भरत के 'अवगीतोऽपि' लक्षण के अनुसार ओजगुण
का स्वरूप माना है।
१. जब पदगत रूक्षता या अर्थ के परुष रहने पर भी सुकुमारतापूर्ण
बन्ध रचना ग्रथित हो तो सौकुमार्यगुण समझना चाहिए । जैसे—
एकाकी के लिये देवतासहाय जैसे पद का या मृत व्यक्ति के लिये
यशःशेष पद का प्रयोग करना सुकुमारता है ।
१. अवगीतविहीनोऽपि—क०; अवगीताविहीनोऽपि—ख० ।
२. वभावकः—ख०; ग० । ३. सम्पत्तिस्तदोजः—ख०; ग० ।
४. मुख्यप्रयो—ख० । ५. सुकुमारं—क० ।
२० ना० शा० द्वि०

३०६ नाट्यशास्त्रम्
अर्थव्यक्ति—
सुप्रसिद्धाभिधाना¹ तु लोककर्मव्यवस्थिता ।
या क्रिया क्रियते काव्ये सार्थव्यक्तिः प्रकीर्त्यते ॥ १०३ ॥
जिस रचना में लोक में अतिशय प्रसिद्ध अर्थ का सुप्रसिद्ध शब्दों द्वारा
अभिधान हो तो उसे अर्थ-व्यक्ति' नामक गुण जानो ॥ १०३ ॥
[ यस्यार्थानुप्रवेशेन मनसा² परिकल्प्यते ।
अनन्तरप्रयोगस्तु³ सार्थव्यक्तिरुदाहृता⁴ ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—शब्द प्रयोग के तत्काल पश्चात् जिसका अर्थ तुरन्त चित्त में
प्रवेश कर जाए तो उसे 'अर्थव्यक्ति' गुण जानो । ]
उदात्त ( उदारता ) ता—
दिव्यभावपरीतं यच्छृङ्गाराद्भुतयोजितम् ।
अनेकभावसंयुक्तमुदारत्वं⁵ प्रकीर्तितम् ॥ १०४ ॥
रचना में जब दिव्यपात्रों की शृङ्गार तथा अद्भुत-रस-युक्त वर्णना हो
जो अनेक भावों से पूर्ण हो तो उसे 'उदारता'² गुण जानों ॥ १०४ ॥
१. जिस काव्य क्रिया में अभिधा व्यापार को प्रसिद्ध या ज्ञात वस्तु के लिये
गृहीत किया जाए ( जैसे—'गाहन्तां महिषा निपानसलिलम्' इत्यादि )
अथवा जहाँ लोकप्रसिद्ध वस्तु का हूबहू वैसा ही सहज अभिधान हो
तो उसे भी 'अर्थव्यक्ति' गुण समझना चाहिए । जैसे—शाकुन्तल के
'ग्रीवाभङ्गाभिरामम्' ( शा० १।७ ) इत्यादि पद्य में ।
आचार्य हेमचन्द्र ने अपने लक्षण में 'यस्यार्थानुप्रवेशेन' इत्यादि भरत
कारिका के पाठ को गृहीत किया है ।
२. जहाँ मानुष भाव के योग्य होकर भी दिव्यता के साथ या करुणभाव
से युक्त होकर भी शृङ्गार के साथ विस्मयावहता को उत्पन्न करते हुए
वर्णन किया जाए तो ऐसे अग्राम्य, अप्रसिद्ध या अज्ञात वर्णन से आप्लुत
काव्यबन्ध को 'उदारता' गुण समझना चाहिए । जैसे मालती-
माधव में :—
'त्वमेवं सौन्दर्या स च रुचिरतायाः परिचितः
१. सुप्रसिद्धा धातुना तु—ख०; ग० । २. मनसः—क० ।
३. अनन्तरं प्रयोगस्य—ख० । ४. प्रकीर्तिता—क० ।
५. मुदारं तत्—क० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३०७
[ अनेकार्थविशेषैर्यत् सूक्तैः सौष्ठवसंयुतैः¹।
²उपेतमतिचित्रार्थैरुदात्तं तच्च कीर्त्यते ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—अनेक विशेष अर्थों से जो रचनागत पदावली निपुणता-
पूर्वक कहे गए सुन्दर शब्दों के कारण अनेक विचित्र अर्थों को धारण करे तो
उसे 'उदात्त' गुण जानो । ]
कान्ति—
यन्मनः³ श्रोत्रविषयमाह्लादयति⁴ हीन्दुवत् ।
⁵लीलाद्यर्थोपपन्नां वा तां कान्तिं कवयो विदुः ॥ १०५ ॥
जिस रचना में पात्र की शृङ्गारक्रीडा का किया जाने वाला वर्णन मन
और कानों को जब आह्लादित कर दे तो उसे 'कान्ति' गुण जानो ॥१०५॥
कलानां सीमानं परमिह युवामेव भजथः ।' इत्यादि ।
इसी प्रकार जब चित्रपदों के बन्ध से विकटत्व या पदों के नर्तन करने जैसी
काव्यरचना हो तो उसे भी 'उदारता' ही कहते हैं । जैसे—
'स्वचरणविनिविष्टैर्नपुरैर्नर्तकीनां झटिति रणितमासीत्तत्र चित्रं कलञ्चा' इत्यादि ।
यहाँ आचार्य हेमचन्द्र ने 'अनेकार्थविशेषैः' पाठ को गृहीत किया है ।
१. जो काव्यरचना शृङ्गार रस के विभावादि से या लीला आदि चेष्टाओं के
वर्णन से मन को आह्लादित करती हो उसे 'कान्ति' समझना चाहिए ।
इसे ही अन्य आचार्य दीप्तरसता का नाम देते हैं । जैसे—'प्रेयान्
सोऽयमपाकृतः सशपथं पादानतः कान्तया' (अ० श० ) इत्यादि । यहाँ
ईर्ष्या अनुभाव, रति भाव तथा औत्सुक्य संचारी के द्वारा शृङ्गाररस को
दीप्त किये जाने से कान्ति नामक गुण है । इसके अतिरिक्त जो वर्णगत
काव्यबन्ध से श्रोत्र को आह्लादित करे तो ऐसी काव्यरचना भी 'कान्ति'
गुणशालिनी ही होगी । जैसे—'कुरङ्गिनेत्रालीस्तवकितवनालीपरिसरः'
इत्यादि । यहाँ समासयुक्त रचना श्रोत्र को आह्लादित करते हुए
एकतानता को बनाए रखती है, अतः मधुर काव्य के कारण 'कान्ति'
गुण यहाँ भी समझना चाहिए ।
१. संज्ञितैः—क० । २. उपेतमनतिग्राह्यैरुदारं—क० ।
३. यो मनःश्रोत्रविषयः प्रसादजनको भवेत्—ग० ।
४. प्रह्लादजननं भवेत्—प्रह्लादजननं तथा—क० ।
५. शब्दबन्धोऽत्रयोगेन स कान्त इति भण्यते—शब्दबन्धात्थंयोगेन तत्कान्तिरिति
भण्यते—, शब्दतत्वार्थसंयोगे तत्कान्तिरिवित कीर्त्यते—क०; शब्दबन्धः
प्रयोगेण स कान्त इति भण्यते—ग० ।

३०८ नाट्यशास्त्रम्
रसानुसारी अलंकार तथा छन्दों का प्रयोग-विधान—
एवमेते ह्यलङ्कारा गुणा दोषाश्च कीर्तिताः ।
प्रयोगमेषाञ्च पुनर्वक्ष्यामि रससंश्रयम् ॥ १०६ ॥
काव्य-रचना में स्थित अलंकार, दोष तथा गुणों का निरूपण किया
गया । अब मैं उनका रसाश्रित प्रयोग बतलाता हूं ॥ १०६ ॥
लघ्वक्षरप्रायकृतमुपमारूपकाश्रयम् ।
काव्यं कार्यन्तु १नाट्यज्ञैर्वीररौद्राद्भुताश्रयम् ॥ १०७ ॥
वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों के वर्णन में काव्य रचना लघु अक्षरों
से युक्त हो तथा उसमें उपमा या रूपक अलंकारों का प्रयोग होना
चाहिए ॥ १०७ ॥
गुर्वक्षरप्रायकृतं बीभत्से करुणे तथा ।
कदाचिद्वीररौद्राभ्यां २यदाधर्षणजं भवेत् ॥ १०८ ॥
बीभत्स ( तथा करुण ) रस में गुरु अक्षरों वाली रचना हो और जब
रौद्र तथा वीर रसों से करुण रस का वर्णन हो तब भी यथाशक्य
( कदाचित् ) गुरु अक्षरों वाली रचना होना चाहिए ॥ १०८ ॥
३रूपदीपकसंयुक्तमार्यावृत्तसमाश्रयम् ।
शृङ्गारे तु रसे कार्यं ४मृदुवृत्तं तथैव च ॥ १०९ ॥
शृङ्गाररस में रूपक तथा दीपक अलंकारों का तथा आर्यावृत्त का तथा
( फिर ) कोमल वृत्तों का प्रयोग करना चाहिए ॥ १०९ ॥
उत्तरोत्तरसंयुक्तं वीरे पाठ्यन्तु ५ यद्भवॆत् ।
जगत्यातिजगत्या ६ तु सङ्कृत्या चैव योजयेत् ॥ ११० ॥
वीररस की रचना में संयुक्त वर्णों का उत्तरोत्तर (अधिक) प्रयोग
होना चाहिए तथा उसमें अतिजगती तथा संस्कृति जैसे वृत्तों का भी प्रयोग
होना चाहिए ॥ ११० ॥
१. शास्त्रज्ञैः—ख० ; काव्यज्ञैः—ग० ।
२. यथा—क० । ३. नार्यावृत्त—ख० ।
४. काव्यं स्यान्नाटकाश्रयम्—ख० ।
५. काव्यन्तु—ख०; ग० ।
६. जगत्यां वा सङ्कृत्यां वापि तद्भवेत्—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३०९
१युद्धसम्पेटयोस्तज्ज्ञैरुत्कृतिः सम्प्रकीर्तिता ।
करुणे शक्वरी चैव२ तथा चातिधृतिर्भवेत् ॥ १११ ॥
युद्ध तथा उपद्रवों (संकट) के वर्णन में 'उत्कृति' छन्द का तथा
करुण-रस में शक्वरी तथा अतिधृति छन्दों की योजना करना उचित
होता है ॥ १११ ॥
यद्वीरे कीर्तितं३ छन्दस्तद्रौद्रेऽपि प्रयोजयेत् ।
शेषाणामर्थयोगेन छन्दः कार्यं४ प्रयोक्तृभिः ॥ ११२ ॥
जो 'छन्द' वीररस के लिए उपयुक्त हों उन्हें रौद्ररस में भी प्रयोग हेतु
उचित समझना चाहिए। शेष रसों में उनके अर्थानुसार यथोचित छन्दों की
योजना की जाए ॥ ११२ ॥
अक्षरों की रसानुकूल योजना-विधि—
त्रिविधं ह्याक्षरं५ कार्यं कविभिर्नाटकाश्रयम् ।
ह्रस्वं६ दीर्घं प्लुतश्चैव ७रसभावविभावकम् ॥ ११३ ॥
नाटकों (काव्य) की रचना में कविजन विभिन्न रसों तथा भावों की
अभिव्यक्ति के लिए ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत अक्षरों का प्रयोग करें ॥ ११३ ॥
एकमात्रं भवेद्ध्रस्वं द्विमात्रं दीर्घमुच्यते ।
प्लुतश्चैव त्रिमात्रं स्याद् अक्षरं ८वर्णसंश्रयम् ॥ ११४ ॥
स्वरों के उच्चारणों के नियम के अनुसार एक मात्रा का अक्षर ह्रस्व, दो
मात्राओं का दीर्घ तथा तीन मात्राओं का प्लुत कहलाता है ॥ ११४ ॥
प्लुत वर्ण का प्रयोग विधान—
स्मृते ९चासूयिते चैव तथा च परिदेविते ।
पठतां ब्राह्मणानाञ्च लुतमक्षरमिष्यते ॥ ११५ ॥
किसी बात के स्मरण करने, असूया तथा रोदन क्रियाओं में तथा
ब्राह्मणों द्वारा वेद पठन करने में 'प्लुत' की योजना करनी चाहिए ॥ ११५ ॥
१. तथैव युद्धसंस्फोटावुत्कृत्यां सम्प्रकीर्तितम्—क०; तथैव युद्धसम्पेटावुत्कृत्यां
सम्प्रकीर्तितो—ख०; ग० ।
२. ज्ञेया तथैवातिधृति—ख०; ग० ।
३. कीर्त्यंते छन्दस्तद्रौद्रे सम्प्रयोजयेत्—ख० । ४. तथा रसः—ख० ।
५. काव्ये विज्ञेयं—ख०; काव्यं विज्ञेयं—ग० ।
६. प्लुतं ह्रस्वञ्च दीर्घञ्च—क० । ७. पदबन्धसमाश्रयम्—क० ।
८. स्वरयोजनात्—ग० । ९. वासूयिते—ख; चास्रयुते—ग० ।

३१० नाट्यशास्त्रम्
आकारस्तु १ स्मृते कार्यम् २ उकारश्चाभ्यसूयिते ।
परिदेविते च हाकारम् ३ ओङ्कारोऽध्ययने तथा ॥ ११६ ॥
स्मरण में 'आ' का असूया में 'ऊ' का, रोदन में 'हा' का तथा वेदों के
अध्ययन में 'ओम्' का प्रयोग होना चाहिए ॥ ११६ ॥
ह्रस्वदीर्घप्लुतानीह यथाभावं यथारसम् ।
४ काव्यबन्धेष्वशेषेषु ह्यक्षराणि प्रयोजयेत् ॥ ११७ ॥
इसके अतिरिक्त सभी प्रकार की काव्य-रचनाओं में भाव तथा रसों की
स्थिति के अनुरूप ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत अक्षरों का प्रयोग करना
चाहिए १ ॥ ११७ ॥
५ यच्छन्दः पूर्वमेवोक्तं विषमार्द्धसमे समम् ।
६ उदारमधुरैः शब्दैस्तत् ७ कार्यन्तु रसानुगम् ॥ ११८ ॥
पूर्व अध्याय में जिन सम, अर्धसम तथा विषम छन्दों को बतलाया
गया है उनका उदार तथा मधुर-शब्दावली द्वारा काव्यों में अर्थानुसारी
प्रयोग किया जाए ॥ ११८ ॥
शब्दानुदारमधुरान् प्रमदाभिधेयान् ८
९ नाट्याश्रयासु कृतिषु प्रयतेत कर्तुम् ।
तैर्भूषिता भुवि विभान्ति हि काव्यबन्धाः
पद्माकरा विकसिता इव राजहंसैः ॥ ११९ ॥
नाटककार अपनी रचना में ऐसे शब्दों का प्रयोग करे जो औदार्य गुण
१. आशय यह कि दूर से बुलाने आदि के लिये व्याकरण शास्त्र में अभिहित
प्लुत आदि नियमों का भी प्रयोग विधिवत् करना चाहिए ।
१. अकारस्तु स्मृते कार्ये—ग० ।
२. हुङ्कारं वाप्यसूयिते—ख०; उकारश्चाप्यसूचिते—ग० ।
३. हुंकार—ख० ।
४. एतानि काव्ययोगेषु त्वक्षराणि निवेशयेत् क, काव्ययोगेष्वक्षराणि यथा
शोभं निवेशयेत्—ख० । काव्ययोगेषु सर्वेषु ह्यक्षराणि तु योजयेत्—ग०; ।
५. ये बन्धाः पूर्वमुद्दिष्टा विषमार्धसमा समाः—ख० ।
६. उदारशब्दैर्मधुरैः कार्यास्तेऽर्थवशान्नुगाः—ग० ।
७. कार्यास्ते स्यु रसानुगाः—ख० । ८. प्रमदाभिनेयान्—ख०; ग० ।
९. नाट्याश्रितान्—क०; नाट्याश्रयान् नु—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३११
से पूर्ण,१ ( अर्थपूर्ण ) तथा मधुर हों, जिन्हें स्त्रियों के द्वारा उच्चारण किया
( या गाया ) जा सके। यदि इन विशेषताओं से युक्त काव्य रचना होगी तो
वह राजहंसी से युक्त कमल सरोवरों जैसी अति सुन्दर होकर सुशोभित
होगी ॥ ११९ ॥
चेक्रीडितप्रभृतिभिर्विकृतैश्च१ शब्दै-
र्युक्ता२ न भान्ति ललिता भरतप्रयोगाः ।
यज्ञक्रियेव३ ४रुरुचर्मधृतैर्घृताक्तै-
र्वैश्या द्विजैरिव कमण्डलुदण्डहस्तैः ॥ १२० ॥
‘चेक्रीडित’२ जैसे रूक्ष शब्दों ( के प्रयोगों ) से युक्त नाट्यरचना सुन्दर
नहीं लगती। जैसे कृष्णाजिन तथा रूक्ष ( मृग ) चर्म को वहन करने वाले,
यज्ञ के घृत से सने हुए कमण्डल और अक्षमाला युक्त हाथों वाले ब्रह्मचारी
गण का नर्तकी ( वेश्या ) के साथ हो जाना अनुचित होता है ॥ १२० ॥
१. यहाँ कारिका में उदार पद से शब्दगुण तथा मधुर पद से उसी के
अनुकूल माधुर्यादि गुणों का प्रयोग सूचित किया गया है। इसी प्रकार
प्रमदाभिधेय पद की अन्य व्याख्या भी है। तदनुसार प्रमद का अर्थ है
आह्लादजनक जिनका अभिधेय अर्थात् भावार्थ या हृदयगत-क्रियाविशेष
हों ऐसे समग्र अर्थगुणों से युक्त भावों वाली पदावली का नाटकीय रचना
में प्रयोग किया जाए।
२. ‘चेक्रीडित’ पद यङन्त है। यहाँ आदि शब्द से इसी प्रकार के ण्यन्त या
सन्नन्त पदों का भी प्रयोग नटों के लिये उचित नहीं होता यह संकेत
दिया है। यहाँ अन्य व्याख्यान इस प्रकार भी है कि जैसे ललित अर्थात्
सुकुमार प्रयोग कठोर या रूक्ष पदावली से युक्त नहीं रहते ठीक उसी
प्रकार जैसे वेश्याओं के साथ कमण्डलधारी ऋजुवृत्ति ब्रह्मचारी को
रखना अनुचित है या जैसे यज्ञक्रिया में ब्रह्मचारी के साथ वेश्याओं
का रखना अनुचित होता है। इस प्रकार यह दृष्टान्त साधर्म्य तथा
वैधर्म्य दोनों प्रकार से बनकर रसानुकूल एवं व्याकरण शास्त्रसम्मत
प्रसिद्ध तथा प्रचलित शब्द प्रयोगों को ही नाट्यरचना में समावेश के
उपयुक्त निदर्शित करता है।
१. प्रकृतिभि—ख०; ग० । २. मुक्ता—क० ।
३. कृष्णाजिनाक्षरुह—ग० ।
४. शरवमंधुरैः घृताक्तैः—ख०; चर्मधुरैः—ग० ।

३१२ नाट्यशास्त्रम्
मृदुललितपदार्थं¹ गूढशब्दार्थहीनं
²जनपदसुखभोग्यं ³युक्तिमन्नृत्तयोज्यम् ।
⁴बहुकृतरसमार्गं सन्धिसन्धानयुक्तं
⁵भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् ॥ १२१ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये⁶ काव्यलक्षणो
नाम सप्तदशोऽध्यायः ।
❖
जिस नाट्य-रचना में मृदु तथा ललित अर्थों वाली पदावली हो, गूढ़
शब्द तथा अर्थ न हों, प्रेक्षक सुखपूर्वक देख और समझ सकें तथा आनन्द
उपलब्ध करे, जिसमें युक्ति एवं विचारपूर्वक नृत्त की योजना की गई हो,
रस की प्रवाहमय गति हो, सन्धियों का (जिसमें) स्पष्ट स्वरूप परिलक्षित
होता हो वही नाटक संसार में प्रेक्षण योग्य हो जाता है ॥ १२१ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का वागभिनयान्तर्गत (लक्षणालंकार गुण-दोष-निरूपण तथा)
काव्यलक्षण नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
❖
१. पदाढ्यं—ख० ।
२. बुधजनसुखभोग्यं—क०; जनपदसुखबोध्यं—ख०; बुधजनसुखयोग्यं—ग० ।
३. बुद्धिमन्नृत्त—ग० ।
४. बहुरसकृतमार्गं—क०, ग० ।
५. स भवति सुकवि काव्यं नाट्यकाले मनोज्ञम्—क० ।
६. वागभिनयो नाम षोडशोऽध्यायः—क०, ख० ।