नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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जब किसी पदार्थ या व्यक्ति के गुण को दोष अथवा दोष को गुण में
परिणत करते हुए उपपादित किया जाता है तो ऐसा कथन 'कार्य'१
कहलाता है ॥ ३७ ॥
अनुनीति—
१अपूर्वक्रोधजनितमपराधं प्रमृज्य२ यत् ।
सेवार्थं मधुरं वाक्यं ३साऽनुनीतिः प्रकीर्तिता ॥ ३८ ॥
क्रोधवश किसी के एक अपराध को बिसार कर जब प्रेमवश या सेवा
भावना से प्रेरित होकर मधुर वचन का उच्चारण किया जाता है तो ऐसे
कथन को 'अनुनीति'२ कहते हैं ॥ ३८ ॥
परिदेवन—
४दोषैर्यदन्यनामोक्तैः प्रसिद्धार्थैः५ प्रयोजितम्६ ।
अन्यत्रार्थेन ७सम्बद्धं ज्ञेयं तत् परिदेवनम्८ ॥ ३९ ॥
दूसरों के नाम पर उच्चारित दोषों की प्रसिद्ध बातों द्वारा प्रयुक्त वचनों
को या गुणों का आधार लेकर जब अन्यत्र सम्बद्ध किया जाए या उसे
अन्यथा प्रतिपादित किया जाए तो मिथ्यादोष के उपपादन से पूर्ण ऐसे
कथन को 'परिदेवन'३ कहते हैं ॥ ३९ ॥
इति सप्तदशाध्यायानुबन्धः समाप्तः ।
१. 'कार्य' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अर्थापत्ति' मिलता है ।
२. 'अनुनीति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुनय' मिलता है । आचार्य
अभिनव गुप्त ने इसके स्थान पर 'प्रसिद्धि' को भी निर्देशित किया है ।
३. 'परिदेवन' के स्थान पर 'क्षोभ' को अन्य पाठ में रखा गया है
तथा 'अनुक्तिसिद्धि' को भी । भोज ने इसे परिवादन तथा सर्वेश्वर ने
परिवेदन माना है। शारदातनय ने परिवाद का संक्षिप्त लक्षण करते
हुए 'परिवादो मृषादोषः' अर्थात् मिथ्यादोष के उपपादन को 'परिवाद'
बतलाया है ।
१. अपूर्वक्षोभ—क० । २. प्रमार्जयेत्—ख०; ग० ।
३. मनुनीतिः—ख०; ग० । ४. यद्दोषैरन्य—ख०; ग० ।
५. प्रसिद्धार्थंप्रयोजनम्—क० । ६. प्रयोजयेत्—ख०; ग० ।
७. सम्बन्धो—ख०; ग० । ८. परिवादनम्—क० ।