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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 668 में से

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पृष्ठ 434

सप्तदशोऽध्यायः ३२३
पश्चात्ताप—अकार्यं सहसा कृत्वाऽकृत्वा कार्यमथापि वा ।
सन्तापो मनसो यस्तु पश्चात्तापः १प्रकीर्तितः ॥ ३३ ॥
किसी अविचारित या असत् कार्य को या किसी कार्य को (पूर्ण) करने के
बाद या न करने के बाद जो मानसिक ताप होता हो तो ऐसी दशा में होने
वाले कथन को 'पश्चात्ताप'१ कहते हैं ॥ ३३ ॥
अनुवृत्ति—
प्रश्रयेणार्थसंयुक्तं यत् परस्यानुवर्तनम् ।
स्नेहाद्दाक्षिण्ययोगाद्वा सानुवृत्तिस्तु संज्ञिता ॥ ३४ ॥
जब किसी व्यक्ति के कथन का सौजन्यवश, प्रेम या पक्षपात के कारण
अनुसरण या समर्थन किया जाता है तो उसे 'अनुवृत्ति'२ कहते हैं ॥ ३४ ॥
उपपत्ति—
प्राप्तानां२ यत्र दोषाणां क्रियते शमनं पुनः ।
सा३ ज्ञेया ह्युपपत्तिस्तु लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ ३५ ॥
असत् या अवास्तविक दोषों के उपस्थित होने पर उनका उचित रूप
से जब उपपत्तिपूर्वक निराकरण किया जाता है तो ऐसा कथन 'उपपत्ति'३
कहलाता है, जिसका नाटकों में प्रयोग होता है ॥ ३५ ॥
युक्ति—साध्यते योऽर्थसम्बन्धो४ महद्भिः समवायतः ।
परस्परानुकूल्येन सा युक्तिः परिकीर्तिता ॥ ३६ ॥
जिस विचार की समानता एवं परस्पर अनुकूलता के आधार पर
उत्कृष्टता के साथ प्रतिपादन या सिद्धि की जाए तो ऐसा कथन 'युक्ति'४
कहलाता है ॥ ३६ ॥
कार्य—५यत्रापसारयन् दोषं गुणमर्थेन योजयेत् ।
६गुणाभिवादं दोषाद्वा कार्यं ७तल्लक्षणं विदुः ॥ ३७ ॥
१. 'पश्चात्ताप' के स्थान पर अन्य पाठ में 'विचार' मिलता है ।
२. 'अनुवृत्ति' के स्थान पर 'अनुनय' मिलता है ।
३. 'उपपत्ति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'उपदिष्ट' मिलता है ।
४. 'युक्ति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अभिप्राय' मिलता है ।
१. स उच्यते—क० । २. प्रोक्तानां—क० । ३. ज्ञेया सा—क० ।
४. सन्तानो—क० । ५. यत्र सङ्कीर्तयन्—क० ।
६. गुणकीर्तिते हि दोष—क०; गुणातिवादो दोषाद्वा—ख०; ग० ।
७. तदिह कीर्तितम्—ख०; तदिह संज्ञितम्—ग० ।