नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 439, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ नाट्यशास्त्रम्
जो 'स्वर 'ए' तथा 'ओ' के आगे आने वाले अर्थात् 'ऐ' और 'औ हो,
अनुस्वार के आगे आनेवाले अर्थात् विसर्ग हो प्राकृत भाषा में उनका कोई
प्रयोग नहीं होता। इसी प्रकार प्राकृत भाषा में पाद (अर्थात् चार) स्वरों
(ऋ, ॠ, लृ, लॄ) का तथा 'व' और 'स' के बीच रहने वाले वर्णों
(अर्थात् 'श' 'ष' 'ष') का तथा क, च और त वर्ग के अन्तिम वर्ण
(अर्थात् ङ०, ञ० और न) का भी व्यवहार नहीं होता है। अर्थात् इस
भाषा में ये बारह वर्ण शब्दों (पदों) में नहीं रहते या लुप्त हो जाते हैं ॥६॥
१वच्चन्ति कगतदयवा लोवं अत्थं च२ से वहन्ति सरा ।
३खघथधमा उण ४हत्तं उवेंति अत्थं५ अमुञ्चन्ता ॥ ७ ॥
[ प्राप्नुवन्ति कगतदयवा लोपं अर्धञ्च तेषां वहन्ति स्वराः ।
खघथधमाः पुनः हत्वमुपेयन्ति अर्थञ्चामुञ्चमानाः ॥ ]
क, ख, ग, त, द, य और व का लोप हो जाता है। (शेष स्वरों वाले
उन्हीं शब्दों से वही अर्थ प्रकट होता है। और इनका आधा भाग स्वरों
में मिल जाता है। ख, घ, भ, ध, और भ को 'ह' आदेश हो जाता है।
तथा इस परिवर्तन या आदेश के कारण अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं
होता२ ॥ ७ ॥
१. स्वर तथा असंयुक्त व्यंजन विषयक कारिकाएं नाट्यशास्त्र में प्राकृत में
तथा विश्रष्ट-पाठों में प्राप्य है। यहाँ हमने बड़ौदा संस्करण के अनुसार
संशोधन कर पाठ लिया गया है। (इन्हें कुछ विद्वान् प्रक्षिप्त भी मानते
हैं।) हमने इनकी संस्कृत-छाया को लगाकर व्याख्या की है।
२. जैसे स्पष्टतः—दूसरे शब्दों की अवस्था में कठोर ध्वनि या महाप्राणवर्ण
में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे—परिघ, अथ, वध, परिह,
अह, वह।
अल्पप्राण व्यंजन यहाँ अन्तःवर्ती अ से युक्त समझे जाना चाहिए इनमें 'अ'
केवल उच्चारणार्थ ही रखा गया है।
सारो (स्वर) से यहाँ 'अर्थ' अभीष्ट है व्यंजन-ध्वनि नहीं।
१. वच्चंति कगत्रजगदावा—वच्चति कटतदवयवाः—क० ।
२. व सिस्वहृत्ति सरा—ख० ।
३. खघधभउण—, खघघुधः उणइ—क०, खद्यधा भद्यथा उण—ख० ।
४. हत्तं उवेंति—हत्त उषति—हत्तं वेंति—क०, हतं तुवेति—ख० ।
५. अंगवअं चंता, अत्थं समुंचंता—अग्ग अमच्चता—क; अत्थं अमुंघना—ख० ।