नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 426, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१५
अभिमान—
धार्यमाणस्तु¹ बहुभिर्वचनैः कार्ययुक्तिभिः ।
न² यः पर्यवतिष्ठेत सोऽभिमानस्तु संज्ञितः³ ॥ ८ ॥
जब कोई पुरुष अनेक कथनों, कार्यों तथा युक्तियों के द्वारा समझाने
पर भी उसे नहीं समझ पाता या सन्तुष्ट न होता हो तो ऐसे लक्षण को
'अभिमान'¹ समझना चाहिए ॥ ८ ॥
गुणकीर्तन—
कीर्त्यमानैर्गुणैर्यत्र विविधार्थसमुद्भवैः ।
दोषा⁴ न परिकथ्यन्ते तज्ज्ञेयं गुणकीर्तनम् ॥ ९ ॥
जब एक व्यक्ति के अनेक गुणों को—विविध उद्देश्यों से उद्भूत अर्थों में
बतलाने के समय—दोषों का उद्घाटन न किया जाए तो ऐसी रचना को
'गुणकीर्तन'² समझना चाहिए ॥ ९ ॥
प्रोत्साहन—
उत्साहजननैः स्पष्टैरथैरौपम्यसंश्रयैः ।
प्रसिद्धैरुपगूढञ्च⁵ ज्ञेयं प्रोत्साहनं बुधैः ॥ १० ॥
जहाँ औपम्य का आश्रय या अन्वेषण करते हुए उत्साहवर्द्धक एवं
सुस्पष्ट अर्थ के द्वारा प्रसिद्ध व्यक्तित्व का वर्णन किया जाए तो ऐसे लक्षण को
'प्रोत्साहन'³ समझना चाहिए ॥ १० ॥
उदाहरण—
यत्रैकस्यापि⁶ शब्दस्य दर्शनात् सुबहून्यपि ।
यान्ति सिद्धिमनुक्तानि⁷ तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ११ ॥
१. 'अभिमान' के समान लक्षण होने पर अन्य पाठ में 'सारूप्य' ( इसके
स्थान पर ) प्राप्त होता है ।
२. 'गुणकीर्तन' दोनों पाठों में गृहीत है किन्तु दोनों में ( इसके ) लक्षण
भिन्न है ।
३. प्रोत्साहन के स्थान पर अन्य पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति प्राप्त
होता है ।
१. वार्यमाणस्तु—ख०; ग० । २. नार्यो यन्नानुतिष्ठन्ति—क० ।
३. भिमानः प्रकीर्तितः—क० । ४. दोषांशान् परिकल्प्यन्ते—क० ।
५. रुपगूढन्तु—क० । ६. यत्रैकस्यैव—क० ।
७. मनुक्तादि—ख०; ग० ।