नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१९
जब प्रश्नपूर्वक या बिना किसी प्रश्न या पूछताछ के ही किसी बात का
निश्चय किया जाए तो उसे 'आख्यान'१ समझना चाहिए ॥ २१ ॥
याच्ञा—
आदौ १यत् क्रोधजनन मन्ते हर्षप्रवर्धनम् ।
यत्र२ प्रियं पुनर्वाक्यं सा याच्ञा परिकीर्तिता ॥ २२ ॥
जिस वचन को हितकर समझ कर आरम्भ में कहने पर क्रोध की तथा
अन्त में हर्ष की उत्पत्ति हो तथा जो प्रियजन को (उनकी ही भलाई के
लिये) कहा जाता हो तो ऐसा कथन 'याच्ञा'२ कहलाता है ॥ २२ ॥
प्रतिषेध—
कार्येषु विपरीतेषु यदि ३किञ्चित्प्रवर्तते ।
निवार्यते च कार्यज्ञैः प्रतिषेधः प्रकीर्तितः ॥ २३ ॥
यदि कोई विपरीत कार्य में प्रवृत्त हो या किसी की निषिद्ध कार्य में
प्रवृत्ति को देखकर उसे कार्यज्ञ या अनुभवी पुरुष उस कार्य से निवृत्त होने
या हटने का उपदेश देता हो तो ऐसा कथन 'प्रतिषेध'३ कहलाता है ॥२३॥
पृच्छा—
यत्राकारोद्भवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम् ।
४पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता ॥ २४ ॥
१. 'आख्यान' के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रसिद्धि' प्राप्त होता है।
२. 'याच्ञा' के स्थान पर अन्य पाठ में 'दाक्षिण्य' प्राप्त होता है। याच्ञा
का अन्य लक्षण भी प्राप्त होता है। जैसे :—
लाभोपपत्तिमाख्याय स्वयं दूतमुखेन वा ।
प्रार्थ्यते यत्र कन्या या सा याञ्चेत्यभिधीयते ॥
अर्थात् स्वयं या दूत के द्वारा लाभ की उपलब्धि या संभावना को दर्शाते हुए
जब किसी कन्या की प्रार्थना की जाए तो उसे 'याच्ञा' कहते हैं। अन्य
विद्वानों का मत है कि केवल कन्या मात्र की याचना करने से यह
याचना के एक पार्श्व की ही सूचक होगी। कुछ अन्य इसे प्रियवचन से
मेल खाने के कारण 'प्रियोक्ति' नामक लक्षण के स्थान पर मानते हैं।
३. 'प्रतिषेध' के स्थान पर अन्य पाठ में 'लेश' रखा गया है।
१. च क्रोधजं नित्यं—क० । २. यत्तु—ख० ; ग० ।
३. कश्चित्—ख० ; ग० । ४. पृच्छत्यभिनयेनार्थं—ख० ; ग० ।