सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 437

३२६ | नाट्यशास्त्रम्

स्वरूप वाला हो जाता है तो 'प्राकृतपाठ्य' कहलाता है । विभिन्न दशाओं
के कारण परिवर्तित होने वाला इसका अपना विशेष स्वरूप होता है ॥ २ ॥
प्राकृतपाठ्य के तीन प्रकार—
त्रिविधं तच्च¹ विज्ञेयं नाट्ययोगे² समासतः ।
समानशब्दं ³विभ्रष्टं देशीगतमथापि च ॥ ३ ॥
नाट्य प्रदर्शन (या रचना) में होने वाला यह प्राकृतपाठ्य तीन प्रकार
का होता है। यथा—(१) समानशब्दों या तत्सम से होने वाला
(२) विभ्रष्ट या तद्भव शब्दों से होने वाला तथा (३) देशी शब्दों से
होने वाला¹। ३ ॥
[ ⁴पाठ्यमेकन्तु विज्ञेयं संस्कृतं प्राकृतं तथा । ]
⁵कमलामलरेणुतरङ्गोलोलसलिलादिवाक्यसम्पन्नम्⁶ ।
प्राकृतबन्धेष्वेवं⁷ ⁸संस्कृतमपि⁹ योगमुपयाति ॥ ४ ॥
संस्कृत के समान प्राकृत में भी कमल, अमल, रेणु, तरंग, लोल, सलिल
आदि समान शब्दों से निर्मित वाक्यों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात्
ये समान रूप से प्रयुक्त होने से तत्सम शब्द हैं जिनका दोनों भाषाओं में
अपने वाक्यों में नियमित प्रयोग किया जाता है ॥ ४ ॥
ये वर्णाः ¹⁰संयोगस्वरवर्णान्यत्वमूनताञ्चापि¹¹ ।
¹²यान्त्यपदादौ प्रायो विभ्रष्टाँस्तान् विदुर्विप्राः ॥ ५ ॥
जो शब्द स्वर या वर्ण के परिवर्तन के कारण पदों या वाक्यों के साथ
१. समानशब्द, विभ्रष्ट तथा देशीगत को परवर्ती व्याकरण तथा नाट्य के
आचार्यों ने तत्सम, तद्भव ओर देशी शब्द से अभिहित किया ।
१. तद्धि—क० । २. नाट्ययोगं—क० ।
३. शब्दैर्बिनष्टं—क०, शब्दैर्विभ्रष्टं—ख० ।
४. इदं श्लोकार्धं ख० ग० पु० नास्ति ।
५. कमलदलरेणुकेसरतरङ्गसलिलादि—क० ।
६. लोलजालादि, लोलसलीलादि—क० । ७. ष्बेतत्—क० ।
८. संयुक्तमपि, संस्कृतमिव—क० ।
९. मिव प्रयोगमुपयाति—ग० ।
१०. संयुक्ताः—क०; ख०; संयोगात्—ग० ।
११. न्यूनतां वापि—ग० ।
१२. गच्छन्ति पदन्यस्तास्ते विभ्रष्टा इति ज्ञेयाः—ख०; ग० ।