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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

१७४ नाट्यशास्त्रम्
स्त्री पात्र के लिये आसन—
स्त्रीणाञ्चैवासनविधिं सम्प्रवक्ष्याम्यहं१पुनः ॥ २१० ॥
सिंहासनं२तु राज्ञीनां देवीनां मुण्डमासनम् ।
पुरोधोऽमात्यपत्नीनां देयं३ह्येत्रासनन्तथा ॥ २११ ॥
भोगिनीनां तथा चैव वस्त्रं चर्म कुथापि वा ।
ब्राह्मणीतापसीनाञ्च पट्टासनमथापि च ॥ २१२ ॥
वेश्या६नामपि कर्त्तव्यमासनं हि मसूरकम् ।
शेषाणां प्रमदानाञ्च भवेद् भूम्यासनं द्विजाः ॥ २१३ ॥
एवमाभ्यन्तरो ज्ञेयो बाह्यश्वासनजो विधिः ।
तथा स्वगृहवार्तासु च्छन्देनासनमिष्यते ॥ २१४ ॥
अब मैं स्त्री पात्रों के लिए दिये जाने वाले आसन नियम बतलाता
हूँ । पट्टरानी को सिंहासन, रानियों को मुण्डासन, पुरोहित और मन्त्रियों
की पत्नियों को वेत्रासन, भोगिनी ( राजा द्वारा विवाहित या रक्षित
[L15

त्रयोदशोऽध्यायः १७५
मुनिजन के अपने नियमानुकूल आसन रहते हैं तथा विभिन्न
मतावलम्बी संन्यासी पात्रों के उनके व्रतानुसार आसन रहते हैं ॥ २१५ ॥
वृसीमुण्डासनप्रायं वेत्रासनमथापि वा ।
होमे यज्ञक्रियायाञ्च पित्र्यर्थे च प्रयोजयेत् ॥ २१६ ॥
जब होम, यज्ञ, तथा पितृतर्पण करना हो तो उस समय वृसी,
मुण्डासन या वेत्रासन पर बैठना चाहिए ॥ २१६ ॥
आसन का सामान्य विधान—
स्थानीया ये च पुरुषाः कुलविद्यासमन्विताः ।
तेषामासनसत्कारः कर्तव्यं इह पार्थिवैः ॥ २१७ ॥
समे समासनं दद्यान्मध्यमे मध्यमासनम् ।
अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च हीने भूम्यासर्न भवेत् ॥ २१८ ॥
उपाध्यायस्य नृपतेर्गुरुणोश्चाग्रतो बुधैः ।
भूम्यासनन्तथा कार्यमथवा काष्ठासनम् ॥ २१९ ॥
नौ-नाग-रथैयानेषु भूमिकाष्ठासनेषु च ।
सहासनं न दुष्येत गुरुपाध्यायपार्थिवैः ॥ २२० ॥
जो स्थानीय पुरुष अवस्था में बड़े, कुलीन तथा विद्वान हों उनका
राजा उचित आसन देते हुए सत्कार करे ।
इनमें भी जो समान स्थिति के हों उन्हें बराबरी का, मध्यम पात्रों को
मध्यम, श्रेष्ठ जन को ( अपने ) से ऊंचा तथा हीन पात्रों का पृथ्वी पर
( नीचा ) आसन रखना चाहिए ।
बुद्धिमान पुरुष अपने उपाध्याय, राजा तथा गुरुजन के सम्मुख पृथ्वी
पर या काष्ठासन पर ही बैठे । ( परन्तु )
नौका, हाथी, रथ तथा यान में अपने गुरु, उपाध्याय तथा राजा के
साथ-साथ बैठने पर भी आसन दोष नहीं रहता ॥ २१६-२२० ॥
शयनावस्था में शरीर की स्थिति—
आकुञ्चितं समञ्चैव प्रसारितविवर्तने ।
उद्वाहितं नर्तञ्चैव शयने कर्म कीर्त्यते ॥ २२१ ॥


१. कर्तव्यो गुरुपार्थिवैः—क० ।
२. मध्ये मध्यं तथासनम्—क० । ३. गुरुणामग्रतो बुधैः—ग० ।
४. भूम्यासर्न सदा कार्यमथवा—ख० । ५ रथभूमीषु—क० ।
६. नतं षोढा शय्यास्थानानि निर्दिशेत्—क० ।

१७६ नाट्यशास्त्रम्
शयनावस्था में होने वाली छः स्थितियाँ हैं—(१) आकुंचित, (२)
सम, (३) प्रसारित, (४) विवर्तित, (५) उद्वाहित तथा (६) नत ॥
आकुंचित—
सर्वैराकुञ्चितैरङ्गैः शय्याविद्धे तु जानुनी।
स्थानमाकुञ्चितं नाम शीतोर्तानां¹ प्रयोजयेत् ॥ २२२ ॥
दोनों घुटनों को बिछोने में रखकर सारे शरीर को झुकाकर सिकुड़ाते
हुए सोना 'आकुंचित' दशा कहलाती है। इसकी योजना ठण्ड से
ठिठुरते पात्र में की जाती है ॥ २२२ ॥
सम—
उत्तानितमुखञ्चैव प्रत्यङ्मुक्तकरन्तथा।
समं नाम प्रसु²प्तस्य स्थानकं संविधीयते ॥ २२३ ॥
मुंह ऊपर की ओर, हाथ खाली ढीले और नीचे की ओर फैले हुए
रखकर सोने को 'सम' स्थान जानो। इसकी सोये हुए पुरुष में योजना
की जाए ॥ २२३ ॥
प्रसारित—
एकं भुजमुपाधाय सम्प्रसारित-जानुकम्।
स्थानं प्रसारितं नाम सुखं³सुप्तस्य कारयेत् ॥ २२४ ॥
एक बाँह को सिरहाना बनाकर जंघाओं को फैलाते हुए सोना
'प्रसारित' स्थान होता है। इसकी आनन्दपूर्वक या निश्चिन्तता से सोने की
अवस्था बतलाने में योजना करनी चाहिए ॥ २२४ ॥
विवर्तित—
अधोमुखस्थितश्चैव विवर्ति⁴तमिति स्मृतम्।
शस्त्रक्षतमृतोत्क्षिप्तमत्तोन्मत्तेषु कारयेत् ॥ २२५ ॥
नीचा मुंह कर सोना 'विवर्तित' कहलाता है। शस्त्रों के घाव लग जाने,
मरण, ऊपर से या ऊंचे स्थान से गिर जाने, (उत्क्षिप्त), नशे के कारण मस्त
हो जाने तथा पागल होने की दशा में इसकी योजना की जाती है ॥ २२५ ॥
१. शीतानान्तु—ख०; ग०। २. तु सुप्तस्य—ख०; ग०।
३. खलु सुप्तस्य—ख०; ग०।
४. विवर्तनम्—क०; विकर्तनम्—ख०; ग०।

त्रयोदशोऽध्यायः १७७
उद्वाहित—
अंसोपरि शिरः कृत्वा कूर्परक्षोभमेव च ।
उद्वाहितन्तु विज्ञेयं लीलायां वचने प्रभोः ॥ २२६ ॥
यदि सिर को कन्धे पर या कलाई को दबाते हुए शयन किया जाए
(कूर्परक्षोभ) तो 'उद्वाहित' स्थान जानो । इसकी क्रीडा तथा (अपने)
स्वामी के साथ संभाषण (बैठने, प्रवेश) करने की दशा में योजना
की जाए ॥ २२६ ॥
नत—
ईषत्प्रसारिते जङ्घे यत्र स्रस्तौ करावुभौ ।
आलस्यश्रमखेदेषु नतं स्थानं विधीयते ॥ २२७ ॥
यदि जंघाएं थोड़ी फैली हुई हों (तथा) दोनों हाथ ढीले रखकर
सोया जाने पर 'नत' स्थान कहलाता है । इसकी योजना आलस्य, श्रम
तथा थकावट क 'दशा प्रदर्शन में की जाए ॥ २२७ ॥
गतिप्रचारस्तु मयोदितोऽयं
नोक्तश्च यः सोऽर्थवशेन साध्यः ।
अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य
वक्ष्यामि कक्ष्यान्तरसंविधानम् ॥ २२८ ॥
हे मुनियो, इस प्रकार मैंने आपको गतिप्रचार के ये स्वरूप तथा लक्षण
बतलाये । इसमें जो बातें बतलाई न जा सकी हों उन्हें आप लोक-
व्यवहार में प्रयुक्त अर्थों के आधार पर स्वयं साध लें। अब मैं रंगमंच
(पर) की (जाने वाली) कक्ष्याओं की तथा उनमें संचार करने की
विधियों को (अगले अध्याय में) कहूँगा ॥ २२८ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे गतिप्रचारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः
भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का 'गतिप्रचार' नामक त्रयोदश अध्याय सम्पूर्ण
—-❖—-
१. हस्तोपरि—क० । २. लीलयाविशने—क० । ३. सृष्टौ—क० ।
४. अस्मात् परं क—पुस्तके 'रङ्गे विकृष्टे' इत्यादि (ना० शा० १३।२०)
पद्यं 'वयोनुरूपः प्रथमस्तु वेषः' (१४।६८) इत्यादि पद्यञ्च समुपलभ्यते ।
५. नोक्तस्तु—क० । ६. रङ्गविधिक्रमस्य—ख०; ग० ।
७. कक्ष्यां प्रविभागयुक्ताम्—ग०, घ० ।
८. द्वादशोऽध्यायः—क, क (भ०), ख० ।
१२ ना० शा० द्वि०

९०१ नाट्यशास्त्रम्
चतुर्दशोऽध्याय
( कक्ष्यापरिधि तथा लोकधर्मि-निरूपणाध्याय )
ये तु पूर्वं मया प्रोक्तास्त्रयो वै नाट्यमण्डपाः ।
तेषां विभागं विज्ञाय ततः कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ १ ॥
नाट्यगृह के तीन प्रकारों को समझते हुए जिनका कि पहिले वर्णन
किया जा चुका है अतः उनके विभेदों को जानकर रंग-मंच की कक्ष्याओं का
विभाग नियत किया जाए १ ॥ १ ॥
वाद्यों की स्थापना
३ये नेपथ्यगृहद्वारे मया पूर्वं प्रकीर्तिते४।
तयोर्भाण्डस्य विन्यासो मध्ये कार्यः प्रयोक्तृभिः ॥ २ ॥
नेपथ्य गृह के जिन दो द्वारों को पहिले बतलाया जा चुका है उनके
मध्यवर्ती प्रदेश में ( बीच में ) भाण्ड वाद्य वादकों को बिठाया जाए ॥२॥
१. पूर्व अध्याय में गति के प्रचारादि में उपयोगी स्थानों का विभागपूर्वक
उल्लेख नहीं किया गया । इन स्थानों का रंगमंच पर विभाजित रूप से निर्देश
आवश्यक होने के कारण पिछले अध्याय से इस अध्याय की संगति स्थापित
होती है ।
यद्यपि उद्देशक्रम में 'कक्ष्या' का स्थान अन्तिम है तथापि बिना कक्ष्या के
अभिनयादि उपपन्न नहीं हो सकते इसलिये यहां भरतमुनि ने उसे विषयप्र-
तिपादन की आवश्यकता को दृष्टि में रखकर ही उचित स्थान दे दिया है। यहाँ
क्रम का उल्लंघन भी इसी कारण हो गया है तथा इसके यहाँ प्रतिपादन करने
का विशेष कारण यह भी है कि गन्तव्य प्रदेश का आश्रय लेने के कारण गतियों
का एवं जल, स्थल आदि अनेक सम या विषम प्रदेशों का आश्रय रखने के
कारण देशों का रंगमंच के प्रयोग स्थान पर कक्ष्या के बिना प्रदर्शन सम्भव नहीं
हो सकता था । अतएव इस कारण भी कक्ष्याओं का निरूपण अब आगे नहीं
बढ़ाया जा सकता था ।
१. अथ त्रयोदशोऽध्यायः—क०, ख० । २. कक्षां—ख० ।
३. नेपथ्यरङ्गभूमौ तु यौ विभागौ प्रकीर्तितौ—क० ।
४. प्रकीर्तिताः—क० । ५. तेषां—क० ।

चतुर्दशोऽध्यायः १७९
कक्ष्या-गत विभाग—
कक्ष्या¹विभागो निर्देश्यो रङ्गपीठपरिक्रमात् ।
परिक्रमेणं² रङ्गस्य ह्यान्या कक्ष्या भवेदिह³ ॥ ३ ॥
रंगमंच की परिधि के भाग में चलने से उसके विभाग सूचित (या
प्रतीत ) हो जाते हैं । जब किसी पात्र को अपनी कक्ष्या परिधि परिवर्तित
करना हो वह उसे परिक्रमण-या अन्य कक्ष्या में चलने-के द्वारा प्रदर्शित
करे³ ॥ ३ ॥
कक्ष्या विभाग की उपयोगिता—
कक्ष्याविभागे ज्ञेयानि गृहाणि नगराणि च ।
उद्या⁴नारामसरितस्त्वाश्रमा अटवी तथा ॥ ४ ॥
पृथिवी⁵ सागराश्चैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
वर्षाणि⁶ सप्त द्वीपाश्च पर्वता विविधास्तथा ॥ ५ ॥
आलोकश्चैव लोकश्च रसातलमथापि च ।
दैत्या⁷नागालयाश्चैव गृहाणि भव⁸नानि च ॥ ६ ॥
इस कक्ष्या विभाग की परिधि में (जो पात्र के किसी विभाग विशेष
पर स्थित होने से जानी जाती हो तथा जिस दृश्य का निरूपण करना
इष्ट हो) गृह, नगर, उद्यान, आदि से युक्त प्रदेश, ग्राम तथा नगर, नदी,
आश्रम, वन, पृथ्वी, समुद्र, जड़, चेतन पदार्थ समन्वित त्रैलोक्य, पृथ्वी के
किसी भी वर्ष, द्वीप, विविध पर्वत, लोकालोक पर्वत, पाताल, दैत्य तथा
सर्पों के निवासस्थान, आराम गृह तथा नगर आ जाते हैं ॥ ४–६ ॥
१. इस विवरण से प्रतीत होता है कि केवल रंगमंच पर विभिन्न स्थानों के
द्वारा ही दृश्य और प्रदेश बतलाये जाते थे और दृश्य-परिवर्तन की अधिक
आवश्यकता होने पर अन्य अंक के द्वारा यह भी हो सकता था । दृश्यों के
परिवर्तनार्थ पटपरिवर्तन जैसे किसी विधान का कम ही उपयोग होता था ।
१. कक्ष्याविभागौ निर्देश्यौ रङ्गपीठपरिक्रमैः—क० ।
२. परिक्रमे च—क० । ३. विधीयते—ग०, घ० ।
४. उद्यानारामसहितो देशो ग्रामोटवीं तथा—ख०, ग० ।
५. ससागरा च पृथिवी तथा त्रैलोक्यमेव च—क० ।
६. द्वीपा सप्ताथ वर्षाणि—क० ।
७. दैत्यानामालयश्चैव—ख०, ग० । ८. च वनानि च—घ० ।

१८० नाट्यशास्त्रम्
¹नगरे वा वने वापि वर्षे वा पर्वतेऽपि वा ।
यत्र वार्ता² प्रवर्तेत³ तत्र कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥
ये परिधियां नाटक की कथावस्तु के विषयानुसार मंच पर (वहीं)
स्थापित की जायें जहाँ प्रस्तुत किये जाने वाले कथानक के नगर, वन, वर्ष
या पर्वत के दृश्य (रखे गये) हों ॥ ७ ॥
रंगमंच पर सम्बन्धित प्रदेश की सूचनाएँ—
बाह्यं⁴ वा मध्यमं वापि तथैवाभ्यन्तरं पुनः ।
दूरं वा सन्निकृष्टं वा देशन्तु⁵ परिकल्पयेत्⁶ ॥ ८ ॥
रंगमंच पर ये कक्ष्या विभाग अन्दर, बाहर, मध्य, दूर तथा समीप के
प्रदेश से (कथावस्तु के अनुसार परस्पर) सम्बद्ध रहें ॥ ८ ॥
पूर्वं प्रविष्टा ये रङ्गं ज्ञेयास्ते⁸ऽभ्यन्तरा बुधैः⁷ ।
पश्चात्प्रविष्टा विज्ञेया कक्ष्या-भागे तु बाह्यतः ॥ ९ ॥
इन कक्ष्या विभागों की रूढ़ि (प्रथा) के अनुसार जो रंगमंच पर
पहिले प्रविष्ट हो चुके हों वे अभ्यन्तर पात्र (गृह या प्रासाद आदि में स्थित)
तथा बाद में मंच पर प्रविष्ट होने वाले बाह्य पात्र कहलाते हैं ॥ ९ ॥
तेषान्तु दर्शनेच्छुर्यः⁹ प्रविशेदङ्गमण्डलम् ।
दक्षिणाभिमुखः¹⁰ सोऽथ कुर्यादात्मनिवेदनम् ॥ १० ॥
और जो पात्र इन (पूर्व प्रविष्ट) पात्रों को देखने या मिलने के लिए
मंच पर आए वह अपनी बात दाहिनी (दक्षिण दिशा की) ओर मुंह
करते हुए कहे ॥ १० ॥
रंगमंच की पूर्व-दिशा—
¹¹यतो मुखं भवेद्भाण्डद्वारं नेपथ्यकस्य¹² च ।
सा¹³ मन्तव्या तु दिक्पूर्वा नाट्ययोगेन¹⁴ नित्यशः ॥ ११ ॥
१. तथा सप्तसमुद्राश्च वर्षा वै पर्वतास्तथा—ख०, ग०।
२. वार्ताः प्रवर्त्तन्ते—क०। ३. प्रवर्तयेत्—ख०, ग०।
४. बाह्याच्च—क०। ५. देशात्तु—ग०।
६. समुपपादयेत्, समुपलक्षयेत्—क०।
७. भ्यन्तरे बुधैः, तेऽभ्यन्तरस्थिताः—क०। ८. ज्ञेयाश्च—क०।
९. दर्शनस्पर्शै—क०; दर्शनेच्छुः सन्—ख०।
१०. मुखः सो वै—क०; मुखं सोऽथ—ग०।
११. पद्यमेतत् ग-पुस्तके नास्ति। १२. नेपथ्यमेव च—क०।
१३. पूर्वादिदिक्षु विज्ञेयं प्रयोगे नाट्यसंश्रये—क०। १४. योगेषु—क०।

चतुर्दशोऽध्यायः १८१
जिस ओर भाण्ड-वाद्य तथा नेपथ्य-द्वारों का मुँह रहे उसे नाटक
प्रदर्शन के नियमानुसार पूर्व-दिशा समझी जाए ॥ ११ ॥
रंगमंच पर प्रवेश-निर्गम-विधान—
निष्क्रामेद्यै¹श्च तस्माद्वै स तेनैव तथा व्रजेत् ।
यत²स्तस्य कृतं तेन पुरुषेण निवेशनम् ॥ १२ ॥
जो व्यक्ति जिस स्थान से (जिस भवन आदि से) निष्क्रमण करे या
जो अपना कार्य पूर्ण कर चुका हो—तो वह पूर्ववत् उसी मार्ग से चला
जाए जिसका प्रवेश के समय उसने आने में उपयोग किया था ॥ १२ ॥
निष्क्रान्तोऽर्थवशाच्चा³पि प्रविशेद्यदि⁴ तद्गृहम् ।
यतः प्राप्तः⁵ स पुरुषस्तेन मार्गेण निष्क्रमेत् ॥ १३ ॥
किसी कार्यवश बाहर निकल जाने पर यदि वही पात्र पुनः वहीं (गृह
या स्थान पर) आवे तो उसी मार्ग या द्वार से प्रवेश करे जिससे वह
निकलकर (बाहर) गया था।
अर्थवार्थवशाच्चापि⁶ तेनैव सह गच्छति ।
तथैव⁷ प्रविशेद्गेहमेकाकी सहितोऽपि वा ॥ १४ ॥
तयोश्चापि⁸ प्रविशतोः कक्षामन्यां⁹ विनिर्दिशेत् ।
परिक्रमेण रङ्गस्य त्वन्या कक्ष्या विधीयते ॥ १५ ॥
या किसी कार्यवश (जिसे कहा हो) यदि वह उसी पात्र के साथ गृह
(आदि) में (पुनः) प्रवेश करे तो उस पात्र के साथ या अकेले—जैसा भी
आवश्यक हो—वह उसी तरह प्रवेश करे। इस प्रकार दोनों पात्रों के प्रवेश
के समय अन्य कक्ष्या की सूचना दी जाए। रंगमंच पर एक या अनेक बार
(जैसा भी आवश्यकतानुसार हो) परिक्रमा करने से दूसरी कक्ष्या सूचित हो
जाती है ॥ १४-१५ ॥
१. निष्क्रामेच्चापि यस्तत्र नरः कार्येण केनचित् । स निष्क्रमेत्तु तेनैव कृतं येन
निवेशनम्—ख०, ग० । २. यतस्तस्य कृते—क० ।
३. वशाद्वापि—क० । ४. न विशेद्यदि—क० ।
५. प्राप्तः सः पुरुषो येन स तेनैव पथा व्रजेत्—क० ।
६. यदप्यर्थवशाच्चैव—क० । ७. तेनैव प्रविशेद्गेह—क० ।
८. तयोश्चैव—क० । ९. काष्ठामन्यां—ख०, ग० ।

१८२ नाट्यशास्त्रम्
सामूहिक-प्रवेश में पात्रों के वर्ग तथा स्थान-नियम—
समैश्च सहितो गच्छेदन्नीचैश्च परिवारितः¹।
अथ प्रेषणिकां²श्चापि निर्देश्यो ह्यग्रतो गतौ ॥ १६ ॥
यदि समान स्थिति के पात्र हों तो वे साथ-साथ और अधम पात्रों से
युक्त होने पर उनसे घिरे हुए चले। इनमें प्रतिहारी का (सामूहिक रूप में
नृप पात्र की प्रवेश दशा में) आगे-आगे चलना बतलाया जाए ॥ १६ ॥
दूर, मध्यम और संनिकृष्ट भूमि की सूचना—
सैव भूमिस्तु बहुभिर्विकृष्टा स्यात् परिक्रमैः ।
मध्या वा सन्निकृष्टा³ वा तेषामेवं विकल्पयेत्⁴ ॥ १७ ॥
नाट्य मंच की यही भूमि यदि पात्र अधिक चले तो दूर प्रदेश को
तथा कम चलने पर मध्यम व्यवधान वाले या समीपतर प्रदेश को प्रदर्शित
करती है¹ ॥ १७ ॥
दिव्य पात्रों की प्रकट तथा प्रच्छन्न दशा में गति—
नगरे वा वने वापि पर्वते सागरेऽपि वा ।
दिव्यानां गमनं कार्यं वर्षे⁵ द्वीपेऽपि वा पुनः ॥ १८ ॥
आकाशेन विमानेन माययाप्यथवा पुनः ।
विविधाभिः क्रियाभिर्वा नानार्थाभिः प्रयोगतः⁶ ॥ १९ ॥
नाटके छन्नवेषाणां दिव्यानां भूमिसञ्चरः ।
मानुषैः कारणादेषां यदा⁷ भवति दर्शनम् ॥ २० ॥
कथावस्तु की विभिन्न अपेक्षाओं के अनुसार दिव्य पात्रों का नगर,
वन, पर्वत, सागर, वर्ष (भारतवर्ष आदि) तथा द्वीप आदि (सभी)
प्रदेशों में आकाश, वायुयान (विमान) या माया के द्वारा या किसी दूसरे
अन्य प्रकार से पहुँचना (या जाना) बतलाया जाए। परन्तु किसी दिव्य
१. समीप या दूर प्रदेश से यात्रा करने का प्रसंग उत्तररामचरित के
द्वितीयांक में देखा जा सकता है।
१. परिवाहितः—ख०; ग०। २. प्रेक्षणिकांश्चापि—ख०; ग०।
३. विज्ञेया—ख०; ग०। ४. विकल्पनात्—क०।
५. वर्षद्वीपेषु वा पुनः—क०; द्वीपे वर्षेषु वा पुनः—ग०।
६. प्रयोक्तृभिः—क०। ७. यथा—ख०; ग०।

चतुर्दशोऽध्यायः १८३
पात्र का अपना स्वरूप प्रच्छन्न रखने की दशा में पृथ्वी पर चलना भी
बतलाया जा सकता है; क्योंकि यहां वे मनुष्य स्वरूप धारण करने के
कारण ही दिखाई देते हैं ॥ १८-२० ॥
[ भारतेष्वथ हैमे वा हरिवर्षे इलावृते ।
रम्ये किम्पुरुषे वापि कुरुषूत्तरकेषु वा ]
दिव्यानां छन्दगमनं सर्ववर्षेषु कीर्तितम् ।
भारते मानुषाणान्तु गमनं संविधीयते ॥ २१ ॥
दिव्य (तथा दिव्यादिव्य) पात्र जम्बू-द्वीप आदि सभी वर्षों में [या
भारतवर्ष, हिमाचल, हरिवर्ष, इलावर्त खण्ड, किम्पुरुष (किन्नर-देश)
प्रदेश, उत्तर कुरु आदि प्रदेशों में] अपने इच्छानुसार जा आ सकते हैं
परन्तु मानव (पात्र) केवल भारतवर्ष में ही घूमने वाले रखना
चाहिए ॥ २१ ॥
दूर देश की यात्रा में प्रस्थान—
विकृष्टं यस्तु गच्छेद्वि देशं कार्यवशान्नरः ।
अङ्कच्छेदे तमन्यस्मिन्निर्द्दिशेच्च प्रवेशके ॥ २२ ॥
यदि किसी पात्रविशेष का कार्यवश दूरदेश में प्रस्थान बतलाया
जाए तो अंक की वहीं समाप्ति करते हुए दूसरे अंक के (प्रारंभ में) प्रवेशक
के द्वारा वही बात प्रदर्शित की जाए।
एक अंक में सम्पाद्य (किये जाने वाले) कार्यों का समय निर्धारण—
अह्नः प्रमाणं गत्वा तु कार्यलाभं विनिर्दिशेत् ।
तथालाभे तु कार्येऽस्या अङ्कच्छेदो विधीयते ॥ २३ ॥
यदि किसी कार्य में (एक दिन की) घटना चल रही हो तो उसकी
दूरी को प्रदर्शित करना चाहिए परन्तु उस कार्य से (किसी) फल के पूर्ण
न होने की दशा में अंक समाप्त कर देना चाहिए ॥ २३ ॥
१. अयं श्लोकः कादि पुस्तके प्रक्षिप्तः । २. वर्षेष्वेतेषु कारयेत्—ग० ।
३. एते पञ्चश्लोकाः अत्र वर्तन्ते। परम् एषाञ्च संवादिन्यः कारिका
दशरूपकाध्याये (ना० शा० अ० २०) अभिनवगुप्तेन व्याख्याताः न चात्र ।
सम्पा० । गच्छेद्यदि विकृष्टस्तु देशकालवशान्नरः—क० ।
४. अङ्कच्छेदेन चान्यस्मिन्—क० घ०; अङ्कच्छेदं न चान्यस्मिन्—ग० ।
५. निर्दिशेत् प्रविशेशके—ग० ।
६. अङ्कप्रमाणं—क०; अध्वप्रमाणं—ग०, घ० ७. कार्यस्य—ग० ।

१८४ नाट्यशास्त्रम्
क्षणो मुहूर्त्तो यामो वा दिवसो¹ वापि नाटके ।
एकोऽङ्के संविधातव्यो बीजै³स्यार्थवशानुगः ॥ २४ ॥
किसी नाट्यरचना में रखी जाने वाली घटनाएं बीजार्थ का अनुसरण
करते हुए क्षण, मुहूर्त, याम तथा दिन में बाँटते हुए एक अंक में रखी
जाएं ॥ २४ ॥
अङ्क⁴च्छेदे तु निर्वृत्तं मासं वा वर्षमेव वा ।
नोर्ध्वं वर्षात्⁵ प्रकर्त्तव्यं कार्यमङ्कसमाश्रयम्⁶ ॥ २५ ॥
( किसी ) अंक के समाप्त होने पर बीते हुए मास या वर्ष बतलाए जा
सकते हैं किन्तु ( एक ) अंक में होने वाले कार्य एक वर्ष से अधिक के नहीं
होने चाहिए ॥ २५ ॥
एवन्तु भारते वर्षे कक्ष्याः कार्याः प्रयोगतः⁷ ।
मानुषाणां गतिह्यै⁸षा दिव्यानान्तु निबोधत ॥ २६ ॥
इसी प्रकार रंगमंच पर कक्ष्या का विभाग प्रयोग के अनुसार, मनुष्य
पात्रों की पहुँच के अनुसार भारतवर्ष में ही प्रदर्शित करना चाहिये ।
मैं अब देव तथा गन्धर्व पात्रों के चलने तथा स्थित होने का वर्णन करता
हूँ । ( जिसे आप समझें ) ॥ २६ ॥
हिमवत्पृष्ठसंस्थे⁹ तु कैलासे पर्वतोत्तमे¹⁰ ।
यक्षाश्च गुह्यकाश्चैव धनदानुचराश्च ये ॥ २७ ॥
रक्षोभूतैः¹¹ पिशाचाश्च सर्वे हैमवताः स्मृताः ।
हेमकूटे च गन्धर्वा विज्ञेयाः¹² साप्सरोगणाः ॥ २८ ॥
सर्वे नागाश्च निषधे शेषर्वासुकितक्षकाः¹³ ।
महामेरौ¹⁴ त्रयस्त्रिंशज्ज्ञेया देवगणा¹⁵ बुधैः ॥ २९ ॥
१. मध्याह्ना दिवसोऽपि वा—क० । २. अङ्केऽङ्के—क० ।
३. त्वर्थबीजवशानुगः—क० ।
४. अङ्कच्छेदं पुनर्वृत्तं—क०; ग० । ५. वर्षात्तु—ग० ।
६. कार्य माससमाश्रयम्—ग० । ७. प्रयोक्तृभिङ—क० ।
८. गतिर्या तु—क०, घ० गतौ येषां—ग० । ९. पृष्ठपार्श्वे तु—क० ।
१०. पर्वतोत्तरे—क० । ११ रक्षःपिशाचभूताश्च—ग० ।
१२. विज्ञेयाप्सरसां गणाः—क० । १३ शेषप्रभृतयः स्मृताः—क० ।
१४. तथा मेरौ—क० । १५. देवगणास्तथा—घ० ।

चतुर्दशोऽध्यायः १८५
नीले तु वैडूर्यमये सिद्धा¹ ब्रह्मर्षयस्तथा ।
दैत्यानां दानवानाञ्च श्वेतपर्वत उच्यते² ॥ ३० ॥
पितरश्चापि विज्ञेया; ³शृङ्गवन्तं समाश्रिताः ।
इत्येते पर्वतश्रेष्ठा⁴ दिव्यवासा भवन्ति⁵ हि ॥ ३१ ॥
तेषां कक्ष्याविभागश्च⁶ जम्बुद्वीपे भवेदियम् ।
जो यक्ष, गुह्यक, कुबेर के सेवक, राक्षस, भूत तथा पिशाच जैसे पात्र
हों वे हिमालय या कैलास पर्वत पर निवास रहने के कारण—सभी 'हैमवत'
कहलाते हैं। (अतएव हिमालय पर्वत पर इनका निवास, गति आदि
प्रदर्शित किया जाए)। गन्धर्व तथा अप्सराएं हैमकूट पर्वत पर रहती हैं।
शेष, वासुकी तथा तक्षक आदि सभी नाग का 'निषध' में निवास रहता
है। तैतीस (करोड़) देवताओं का समूह सुमेरु पर्वत पर तथा सिद्ध और
ब्रह्मर्षिगण वैडूर्यमणिमय नीलपर्वत पर रहते हैं। दैत्य और दानवों का
निवास श्वेत पर्वत पर तथा पितरों का आवास शृंग पर्वत पर माना जाता
है। ये ही वे श्रेष्ठ पर्वत हैं जिन पर देवता तथा यक्ष आदि दिव्यपात्रों
का आवास रहता है। अत एव (नाटक की कथावस्तु के प्रसंगानुसार
मंच पर इनसे सम्बद्ध कथा प्रदर्शित करने की स्थिति में) कक्ष्याओं का
विभाग करते समय इन पर्वतों को जम्बू द्वीप में मानते हुए रखा
जाए ॥ २७–३१)
देवगण के कार्य—
तेषां न⁷ चेष्टितं कार्यं स्वैः स्वैः कर्मपराक्रमैः ॥ ३२ ॥
परिच्छेदविशेषाँ⁸स्तु तेषां मानुषलोकवत् ।
सर्वे भावास्तु देवानां⁹ कार्या मानुषसंश्रयाः ॥ ३३ ॥
तेषां¹⁰ त्वनिमिषत्वं यत्तन्न कार्यं प्रयोक्तृभिः ।
इह भावा रसाश्चैव दृष्ट्यर्थामेव¹¹ प्रतिष्ठिताः ॥ ३४ ॥
१. सिद्धा देवर्षयस्तथा — क०; सिद्धब्रह्मर्षयस्तथा — ग० ।
२. इष्यते — क०; ग० । ३. शृङ्गवद्गिरिवासिनः — क० ।
४. पर्वताः श्रेष्ठाः — क० । ५. प्रकीर्तिताः — ग० ।
६. विभागस्तु — क० । ७. एतेषां — क०; तेषां तु — ख०; ग० ।
८. विशेषस्तु — क०; ग० । ९. दिव्यानां — ग० ।
१०. अनिमेषस्तु यस्तेषां स न कार्यः — क०; तेषामनमिषं यत्तु — ख० ।
११. दृष्टावेव — ग० ।

१८६ नाट्यशास्त्रम्
दृष्ट्या हि सूचितो भावः पश्चादङ्गैर्विभाव्यते¹ ।
॥ एवं कक्ष्याविभागस्तु मया प्रोक्तो द्विजोत्तमाः ॥ ३५ ॥
पुनश्चैव प्रवक्ष्यामि प्रवृत्तीनान्तु लक्षणम् ।
इन पात्रों के कार्य तथा चेष्टाएँ अपनी शक्ति तथा प्रकृति के अनुसार
रखी जाएँ किन्तु इनके आचार एवं स्वरूप को मनुष्यों के समान ही रखा
जाए। दिव्य पात्रों की सभी चेष्टाएं और सभी भाव मानवीय होने
चाहिए। दिव्यपात्रों की दृष्टि अनिमेष (पलक न मिलने वाली) नहीं
रहनी चाहिए (चाहे वह इन पात्रों की प्रकृति ही क्यों न हो) क्योंकि इस
नाट्य-प्रदर्शन में सभी भाव दृष्टि पर आधृत होते हैं। तथा भाव सर्वप्रथम
दृष्टि द्वारा अभिव्यक्त होकर पुनः अंगावयवों द्वारा अभिनीत किया जाता
है। हे मुनियों, इस प्रकार मंच पर होने वाला कक्ष्या विभाग का मैंने
निरूपण किया। अब मैं प्रवृत्तियों का स्वरूप बतलाता हूँ ॥ ३२-३५ ॥
प्रवृत्तियां और उनकी चार विधाएं—
चतुर्विधा प्रवृत्तिश्च प्रोक्ता नाट्यप्रयोक्तृभिः ।
आवन्ती दाक्षिणात्या च पाञ्चाली चोढ्रमागधी ॥ ३६ ॥
नाट्य प्रयोक्ता जन की मान्यता के अनुसार प्रवृत्तियों² के चार प्रकार
१. कक्ष्या विभाग के निरूपण के उपरान्त यद्यपि धर्मी (नाट्य या लोक-
धर्मी) का वर्णन क्रम प्राप्त था किन्तु 'यत्र वार्ता प्रवर्तेत' (ना० शा० १४।७)
के अनुसार कक्ष्याविभाग से जब देशभेद अभिहित किया जाता हो तो इसी से
देश के विभाग द्वारा प्रवृत्तियों का भी आक्षेप द्वारा अवबोध हो जाएगा; क्योंकि
कक्ष्याविभाग के नियमानुसार जब किसी पात्र का उत्तर-द्वार से प्रवेश हो
तो निश्चित ही ऐसा पात्र आवन्त्य या दाक्षिणात्य होगा। अतएव ऐसे कार्यों
का बिना प्रवृत्तियों के ज्ञान के सम्पादन नहीं किया जा सकता है। इसी
उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए भरत मुनि ने कक्ष्याविभाग के तुरन्त बाद
सर्वप्रथम प्रवृत्तियों का ही औचित्य मानकर विवरण देना आरम्भ किया।
१. पुनरङ्गै—ग० ।
२. अतः परं धर्मीलक्षणं कासुचित् मातृकासु लभ्यते तच्च परस्तादेव वर्तते
इति नात्रोट्टङ्कितम् ।
३. विज्ञेया नाट्यकोविदैः, प्रयोज्या नाट्ययोक्तृभिः—क; प्रोक्ता नाट्य-
प्रयोगतः—ग० । ४. चैव मागधी; चान्ध्रमागधी; सोढ्रमागधी—क० ।

चतुर्दशोऽध्यायः १८७
हैं—( १ ) आवन्ती, ( २ ) दाक्षिणात्या, ( ३ ) पांचाली तथा ( ४ )
मागधी ॥ ३६ ॥
अत्राह—प्रवृत्तिरिति कस्मात् ? उच्यते¹—पृथिव्यां नानादेश-
वेषभाषाचारा³ वार्ताः ख्यापयतीति प्रवृत्तिः। प्रवृत्तिश्च निवेदने⁴।⁵ अत्राह—
यथा पृथिव्यां नाना⁶देशाः सन्ति । कथं⁷मासां चतुर्विधत्वमुपपन्नं
समानलक्षणाश्चासां प्रयोगः ? उच्यते—तत्तु⁸ सत्यम्, आसां समान-
लक्षणप्रयोगः, किन्तु नानादेशवेषभाषाचारो लोक इति कृत्वा
लोकानुमतेन वृत्तिसंश्रितस्य⁹ नाट्यस्य मया चतुर्विधत्वमभिहितम्—
भारती¹⁰, आरभटी, सात्वती कैशिकी चेति ।
वृत्तिसंश्रितैश्च प्रयोगैरभिहिता¹¹ देशाः, यतः¹² प्रवृत्तिचतुष्टय-
मभिनिर्वृत्तं¹³ प्रयोगश्चोत्पादितः¹⁴ ।
( गद्य भाग )—प्रश्न—इसे प्रवृत्ति क्यों कहा गया ? उत्तर—विश्व के
विभिन्न प्रदेशों के स्थानीय वेश, आचार, भाषा तथा कार्य व्यवहार को
सूचित करने के कारण ये 'प्रवृत्ति' कहलाती हैं। 'वृत्ति' या 'प्रवृत्ति' का
अर्थ है प्रदर्शित, सूचित या अवगत करवाना । इस विश्व में अनेक देश
( तथा प्रदेश ) हैं।
१. अत्रोच्यते—क० । २. यथा पृथिव्यां—क० ।
३. भाषाचारवार्ताः—ख; ग० । ४. प्रवृत्तिः वृत्तिश्च निवेदने—ग० ।
५. निवेदनं—क; निवेदनैः—ख० । ६. बहवो देशाः—ग० ।
७. तदा कथ—क० । ८. एवमेतत्—क; सत्यमेतत्—ग० ।
९. लोकानुमतेऽनुवृत्तिसंश्रितस्य—ख; ग० ।
१०. भारती सात्वती कैशिक्यारभटी—क० ।
११. प्रयोगोचिता—क०; प्रयोगेष्वभिरता—ख०; ग० ।
१२. यतो वृत्ति—क० । १३. अभिनिवृत्तं—ख; ग० ।
१४. अस्मादनन्तरं—
आ नर्मदाया आसिन्धोरापूर्वावर्तिनस्तथा ।
आपश्चिमात् समुद्राच्च तथा सौवीरराष्ट्रतः ॥
आहिमाद्रेस्तथा देशा विदेशैश्चान्तरेण ये ।
सात्वती कैशिकीयुक्ता तेषामावन्तकी स्मृता ॥
इत्यधिकं—क० पुस्तकपादटिप्पण्याम् ।

१८८ नाट्यशास्त्रम्
प्रश्न—( पृथ्वी पर अनेक देश होने पर ) इन प्रवृत्तियों के चार भेद
रखना कैसे उचित होगा ? जबकि इनके प्रयोग तथा लक्षण नाट्यप्रयोग
में समान परिलक्षित होते हों ?
उत्तर—यह ठीक है कि इनके ( कुछ ) समान लक्षण दिखाई देते हैं
परन्तु मैंने मनुष्यों के देश, वेष, भाषा तथा रूढ़िगत व्यवहार विभिन्न होने
के कारण एवं विविध देशी प्रजा की रुचि के अनुसार भारती, सात्वती,
कैशिकी तथा आरभटी नामक चार वृत्तियों के आधार पर नाट्यप्रयोग के
लिए इन प्रवृत्तियों के भी चार प्रकार ( ही ) मान लिए हैं। क्योंकि विभिन्न
प्रदेश वृत्तियों के ( प्रयोग तथा ) प्रदर्शन से सम्बद्ध होते हैं। अतएव
इसी आधार पर प्रवृत्तियों के भी चार भेद उपपन्न हो गए, जिनमें समस्त
नाट्य-प्रदर्शन समाहित हो सके।
दाक्षिणात्या प्रवृत्ति—
तत्र दाक्षिणात्यास्तावद्बहुनृत्तगीतवाद्याः कैशिकीप्रायाः चतुर¹-
मधुरललिताङ्गाभिनयाश्च। तद्यथा—
(गद्य भाग)—इनमें दक्षिण प्रदेश की प्रजा अनेक नृत्त ( नृत्य ) गीत,
वाद्य से युक्त तथा कैशिकीवृत्ति सम्पन्न ललित अंगों से विविध प्रदर्शित
अभिनय देखने की रुचि रखती है। दाक्षिण्य प्रदेश ये हैं—
महेन्द्रो मलयः सह्यो मेकलः² कालमंजरैः¹।
एतेषु⁴ संश्रिता देशास्ते ज्ञेया दक्षिणापथाः ॥ ३७ ॥
महेन्द्र, मलय, सह्य, मेकल तथा काल ( पाल ) मं(पं) जर³
(कालपंजर) पर्वतों से युक्त (दक्षिण) प्रदेश 'दक्षिणापथ' कहलाता है ॥३७॥
कोसलास्तोसलाश्चैव कलिङ्गा यवनाः⁶ खसाः।
द्रमिडाँन्ध्रमहाराष्ट्रा वेण्णा वै वानवासंजाः⁹ ॥ ३८ ॥
१. कालमंजर या कालपंजर वर्तमान कालेंजर के ही नाम हैं।
१. चतुरललित—क०। २. मेखलः—क०; मेखकः—ख; ग०।
३ कालपञ्जरः—ख०; ग०। ४. एतेषु ये श्रिता देशाः स ज्ञेयो दक्षिणा-
पथः—ख०; ग०।
५. कोशलास्तोशला—क०। ६. यवनौसलाः—क०; एव मोसलाः—ख०।
७. द्रमिलाश्च—क०। ८ भिल्ला—क०।
९. वानवासिकाः—क०; वानवासिजाः—ख०; ग०।

चतुर्दशोऽध्यायः १८९
दक्षिणस्य समुद्रस्य तथा विन्ध्यस्य चान्तरे¹।
ये देशास्तेषु² युञ्जीत दाक्षिणात्या तु³ नित्यशः ॥ ३९ ॥
( तथा ) कोसल, तोसल, कलिंग, यवन, खस और द्रमिड, आन्ध्र,¹
महाराष्ट्र, वेष्ण², वानवासिक आदि विन्ध्याचल और दक्षिण समुद्र के बीच
वाले जो प्रदेश हैं उनमें भी दाक्षिणात्या प्रवृत्ति की योजना रखी जाए
( क्योंकि ये भी उपर्युक्त रुचि ही रखते हैं ) ॥ ३८-३९ ॥
आवन्ती-प्रवृत्ति—
आवन्तिका वैदिशिकाः सौराष्ट्रा४ मालवास्तथा ।
सैन्धवास्त्वथ सौवीरा आनर्ताः सार्बुदेयकाः५ ॥ ४० ॥
दशार्णास्त्रैपुराश्चैव तथा वै मार्तिकावताः६ ।
कुर्वन्त्यावन्तिकीमेते प्रवृत्तिं नित्यमेव तु ॥ ४१ ॥
अवन्ती, विदिशा, सौराष्ट्र, मालव, सिन्धु, सौवीर, और्बुदेय³, दशार्ण,
त्रिपुर तथा मृत्तिकावत प्रदेशों में आवन्ती प्रवृत्ति ग्रहण करने की रुचि
रहती है ॥ ४०-४१ ॥
सात्वतीं कैशिकीञ्चैव वृत्तिमेषां७ समाश्रिताः ।
भवेत् प्रयोगो नान्यत्र स तु कार्यः प्रयोक्तृभिः ॥ ४२ ॥
इन प्रदेशों में सात्विकी तथा कैशिकी वृत्ति से संश्लिष्ट८ नाट्य प्रदर्शन
१. आन्ध्र और महाराष्ट्र थोड़े परिवर्तन से विद्यमान इसी नाम के वर्तमान
प्रदेश ही हैं। इस विवरण में दिये हुए भौगोलिक-अभिधान पुराणों में भी इसी
प्रकार उपलब्ध होते हैं।
२. कृष्णा तथा पिनाकिनी नदी के तीर तथा तटवर्ती प्रदेश के निवासीगण
का 'वेष्ण' नाम है।
३. अर्बुदशब्द का अर्थ है वर्तमान आबूपर्वतवाला प्रदेश। मृत्तिकावती
प्रदेश-निवासी मार्तिकावत् ।
१. चोत्तरे—क० ।
२. संश्रितास्तेषु—ग०। ३. दाक्षिणात्यास्तु—ग० ।
४. आनर्तकाः—क० । ५. सार्वदेशकाः—क० ।
६. वै मानिकावताः—क०; वैवत्तिकावताः—ख०; ग० ।
७. वृत्तिमेते समाश्रिताः—क० घ०; वृत्तिमेषा समाश्रिता—ख०, ग० ।
८. नाट्ये च—क० ।

३९० : नाट्यशास्त्रम्
करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं देशों की प्रजा पर इस प्रवृत्ति का नाट्यप्रयोग
निर्भर करता है ॥ ४२ ॥
अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च वत्साश्चैवोढ्रमागधाः ।
पौण्ड्रनेपालकाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिराः ॥ ४३ ॥
तथा प्लवङ्गमा³ ज्ञेया मलदा मल्लवर्तकाः ।
ब्रह्मोत्तरप्रभृतयो भार्गवा मार्गवास्तथा ॥ ४४ ॥
प्राग्ज्योतिषाः पुलिन्दाश्च वैदेहास्ताम्रलिप्तकाः ।
प्रांक्प्रभृतयश्चैव⁵ युञ्जन्त्यौढ्रमागधीम्⁶ ॥ ४५ ॥
पूर्वीय प्रदेशों में (जो) अंग, वंग, कलिंग, वत्स, उढ़ (औढ़)
मगध, पुण्ड्र, नेपाल, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, प्लवंगम, मलदा, मल्लवर्तक,
ब्रह्मोत्तर, भार्गव, मार्गव, प्राग्ज्योतिष, पुलिन्द (न्ध), विदेह तथा
ताम्रलिप्त (आदि) प्रदेश हैं वे औढ्रमागधी प्रवृत्ति के प्रयोग को पसन्द
करते हैं ॥ ४३-४५ ॥
अन्येऽपि देशाः प्राच्यां⁷ ये पुराणे सम्प्रकीर्तिताः ।
तेषु प्रयुज्यते ह्येषा⁸ प्रवृत्तिश्चौढ्रमागधी⁹ ॥ ४६ ॥
इसी प्रकार पुराण आदि में जो पूर्वीय प्रदेश कहे गए हैं उनमें भी
इसी औढ्रमागधी प्रवृत्ति का व्यवहार होता है [और इस प्रवृत्ति में
भारती तथा कैशिकी वृत्ति प्रधान रहती है।] ॥ ४६ ॥
पांचालमध्यमा प्रवृत्ति—
पाञ्चालाः शौरसेनाश्च काश्मीरा हास्तिनापुराः ।
वाह्लीकाः शाकलाश्चैव¹⁰ मद्रकौशीनरास्तथा ॥ ४७ ॥
१. कलिंग = वर्तमान उड़ीसा के आसपास का प्रदेश । मलदा = वर्तमान
मालदह जिला जो बंगाल में है। मल्लवर्तक = वर्तमान मल्लभूम प्रवेश (बंगाल
में बांकुरा) । भार्गव और मार्गव शब्द अस्पष्ट हैं और सम्प्रति इस नाम के कोई
प्रदेश प्राप्त नहीं होते ।
१. पौण्ड्रा नैपालिकाश्चैव—ख०; ग० । २. बहिर्दुराः—ख०; ग० ।
३. प्लवङ्गमाहेन्द्र मलदामलवर्तकाः—ख; ग० । ४. ताम्रलिप्तकाः—ख०; ग० ।
५. प्रांशुप्रवृत्तयः क०; प्राङ्गाप्रावृत्तयः—ख०; ग० ।
६. युज्यन्ति चौढ़मागधी—ख०; ग० । ७. प्राच्यां—ख०; ग० ।
८. त्वेषा—ख०; ग० । ९. चान्ध्रमागधी—क० ।
१०. शाल्यका—क० शाल्वका—घ० ।

चतुर्दशोऽध्यायः १९१
हिमवत्संश्रिता ये तु गङ्गायाश्चोत्तरां दिशम् ।
ये² श्रिता वै जनपदास्तेषु पाञ्चालमध्यमा ॥ ४८ ॥
पांचाल, शौरसेन, काश्मीर, हस्तिनापुर, वाल्हीक, शाकल (शल्यक
या शाल्व) मद्र, उशीनर प्रदेश तथा गंगा नदी के उत्तर में या हिमाचल
पर स्थित प्रदेश हैं, ये सभी पांचालमध्यमा प्रवृत्ति को ग्रहण करते हैं ॥
पाञ्चालमध्यमायान्तु सात्वत्यारभटी स्मृताै ।
प्रयोगस्त्वल्पगीतार्थ आविद्धगतिविक्रमः ॥ ४९ ॥
इस (पांचालमध्यमा) प्रवृत्ति में सात्वती तथा आरभटी वृत्ति का
प्राधान्य रहता है। इसके व्यवहार में गीत की न्यूनता तथा असामान्य
गति और पादचालन का आधिक्य रखा जाता है ॥ ४९ ॥
प्रवृत्ति (के अवेक्षण) में दो क्रियाएं—
द्विधा क्रिया भवत्यासां रङ्गपीठपरिक्रमे ।
प्रदक्षिणप्रवेशाँ च तथा चैवाप्रदक्षिणा ॥ ५० ॥
रंगमंच पर चलने में उपयोग की जाने वाली क्रियाएं इन प्रवृत्तियों के
द्वारा दो प्रकार से प्रदर्शित की जाती हैं—एक दाहिनी ओर से तथा दूसरी
बायीं ओर से मंच पर प्रवेश करते हुए ॥ ५० ॥
आवन्ती दाक्षिणात्या च प्रदक्षिणपरिक्रमे ।
अपसव्यप्रवेशाँ तु पाञ्चाली चोढ्रमागधी ॥ ५१ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में दाहिनी ओर से रंगमंच पर
प्रवेश कर चलना होता है तथा पांचाली और औढ्रमागधी प्रवृत्ति में यह
बायीं ओर से रहता है ॥ ५१ ॥
आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां पार्श्वद्वारमथोत्तरम् ।
पाञ्चाल्यामोढ्रमागध्यां योज्यं द्वारन्तु दक्षिणम् ॥ ५२ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में उत्तर दिशा के बाजू के द्वार से
तथा पांचाली और औढमागधी में दक्षिण प्रवृत्ति द्वार से प्रवेश करने की
योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
१. तथा प्राप्य प्रदक्षिणम्—क० । २. ये चाश्रिता—क० ।
३ श्रिता—क० । ४ प्रदेशास्तु—ख०; ग० ।
५. प्रदेशा च—ख०; ग० । ६. योज्यं द्वार—ख०; ग०, घ० ।

१९२ नाट्यशास्त्रम्
एकीभूताः पुनश्चैताः प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ।
पर्षदं देशकालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च ॥ ५३ ॥
परन्तु किसी विशेष सभा, स्थान, कार्य तथा प्रयोजन ( अर्थ ) या
अर्थ विशेष की अभिव्यक्ति को देखते हुए इन नियमों को सम्मिलित
( एकत्रित या समान ) भी कर सकते हैं ॥ ५३ ॥
येषु देशेषु या कार्या प्रवृत्तिः परिकीर्तिता ।
तद्वृत्तिकानि रूपाणि तेषु तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
चतुर नाट्य प्रयोक्ता इन प्रवृत्तियों में से जिन देशों में जो व्यवहार
होते हों वहां नाट्य प्रदर्शन करते समय वैसी ही प्रवृत्तियां बतलाएं ॥५४॥
एकीभूताः पुनस्त्वेताः नाटकादौ भवन्ति हि ।
अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं तत्तत् कर्म समाचरेत् ॥ ५५ ॥
ये नियम ( नाटिकादि ) नाट्य¹ रचना में सम्मिलित रूप में
रखने पर संक्षिप्त किये जाएं तथा प्रवृत्तियों की अधिकता को देखते हुए
प्रयोक्ताजन इनके आवश्यक या महत्वपूर्ण कुछेक कार्यों का प्रयोग या
प्रदर्शन करें ।
सार्थे बाहुल्यमेकस्य शेषाणामथ बुद्धिमान् ।
येषामन्यस्य बाहुल्यं प्रवृत्तिं पूरयेत्तथा ॥ ५६ ॥
जिसमें सभी का सामूहिक (सार्थ) या मिश्र रूप हो वहां किसी एक का
तथा जहां वैसा न हो वहां शेष का, इसी प्रकार जहां दूसरे की अधिकता
न हो वहां प्रवृत्तियों की बीच में अधिकता से पूर्ति करनी चाहिए ॥ ५६ ॥
१. आशय यह हे कि जिन प्रदेशों या देशों में जिस वृत्ति का उपयोग होता
हो या जिन वृत्तियों में जनसमुदाय रुचि लेता हो वहाँ प्रस्तुत किये जाने वाले
नाटकादि में उसी देश के नायक, या अन्य प्रवृत्तियों को प्रधानता देते हुए नाट्य-
प्रयोग प्रस्तुत करना चाहिए । यह कार्य कविगण अपनी रचना में तथा प्रयोक्ता-
गण अपने प्रयोग के प्रस्तुतीकरण में बिना किसी अपवाद के अवश्य रखें ।
१. वर्षञ्च देशं कालञ्च—क०; देशं कालमवस्थाञ्च काव्ययुक्तिमवेक्ष्य च—
क०; वर्षञ्च देशं कालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च—ख० ।
२. पूर्वं—क०; ख; ग० । ३. यदा त्वेताः—क० ।
४. गानकादौ—ख०; ग० । ५. कर्माचरेत् सदा—ख० ग० ।
६. पद्यमिदं ख—पुस्तके नास्ति । ७. यस्यान्यस्येऽस्य—क० ।

चतुर्दशोऽध्यायः १९३
नाट्य रचना के दो सामान्य प्रकार—
प्रयोगो द्विविधश्चैव विज्ञेयो नाटकाश्रयः।
सुकुमारस्तथाविद्धो नाट्ययुक्तिसमाश्रयः ॥ ५७ ॥
नाट्य व्यवहार (नियम) के अनुसार नाट्य प्रयोग दो प्रकार का
सामान्य रूप में माना जाता है। ये हैं—सुकुमार तथा आविद्ध ॥ ५७ ॥
आविद्ध नाट्य-प्रयोग—
यस्त्वाविद्धाङ्गहारन्तु छेद्यभेद्याह्वोत्मकम् ।
मायेन्द्रजालबहुलं पुस्तनेपथ्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥
पुरुषैर्बहुभिर्युक्तमल्पस्त्रीकं तथैव च ।
सात्वत्यारभटीप्रायं नाट्यमाविद्धमेव तत् ॥ ५९ ॥
आविद्ध नाट्य-प्रयोग में अंगहारों के साथ छेदन, भेदन तथा युद्ध का
(युद्ध की चुनौती देने का) प्रदर्शन रहता है। इसमें माया तथा इन्द्रजाल
आदि शक्तियों का उपयोग बतलाया जाता है तथा मुख-रचना (नेपथ्य)
में पलस्तर की बहुलता होती है। इसमें पुरुष-पात्र अधिक तथा स्त्री-पात्र
कम रखे जाते हैं और इसमें सात्वती और आरभटी वृत्ति का (अधिकांश)
प्रदर्शन रहता है ॥ ५८-५९ ॥
डिमः समवकारश्च व्यायोगेहामृगौ तथा ।
एतान्याविद्धसंज्ञानि विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६० ॥
रूपकों में डिम, समवकार, व्यायोग तथा ईहामृग को नाट्यकुशल
महानुभाव आविद्ध नाट्यप्रकार मानते हैं ॥ ६० ॥
एषां प्रयोगः कर्तव्यो देवं दानवराक्षसैः ।
उद्धता ये च पुरुषाः शौर्यवीर्यबलोन्विताः ॥ ६१ ॥
आविद्ध नाट्य प्रकार का प्रयोग देव, दानव, राक्षस तथा शौर्य,
वीर्य एवं शक्ति सम्पन्न उद्धत प्रकृति के पुरुषों के द्वारा किया जाना
चाहिए ॥ ६१ ॥
१. नाटकाश्रितः—क० । २. तत्राविद्धा—सत्वाविद्धाङ्ग—क० ।
३. हवात्मकः—क० । ४. बहुलो—क० । ५. संयुतः—क० ।
६. प्रयोगः पुरुषप्रायस्तथाल्पस्त्रीक एव च—क० ।
७. भटीयुक्तो ज्ञेय आविद्धसंज्ञितः—क० ।
८. आविद्धसंज्ञा विज्ञेमाः प्रयोगस्य वशानुगाः—क० ।
९. एष—ग० । १०. दैत्य—ख; ग० । ११. उद्धताश्चैव—क० ।
१२. समन्विताः—क० ।
१३ ना० शा० द्वि०