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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

१८४ नाट्यशास्त्रम्
क्षणो मुहूर्त्तो यामो वा दिवसो¹ वापि नाटके ।
एकोऽङ्के संविधातव्यो बीजै³स्यार्थवशानुगः ॥ २४ ॥
किसी नाट्यरचना में रखी जाने वाली घटनाएं बीजार्थ का अनुसरण
करते हुए क्षण, मुहूर्त, याम तथा दिन में बाँटते हुए एक अंक में रखी
जाएं ॥ २४ ॥
अङ्क⁴च्छेदे तु निर्वृत्तं मासं वा वर्षमेव वा ।
नोर्ध्वं वर्षात्⁵ प्रकर्त्तव्यं कार्यमङ्कसमाश्रयम्⁶ ॥ २५ ॥
( किसी ) अंक के समाप्त होने पर बीते हुए मास या वर्ष बतलाए जा
सकते हैं किन्तु ( एक ) अंक में होने वाले कार्य एक वर्ष से अधिक के नहीं
होने चाहिए ॥ २५ ॥
एवन्तु भारते वर्षे कक्ष्याः कार्याः प्रयोगतः⁷ ।
मानुषाणां गतिह्यै⁸षा दिव्यानान्तु निबोधत ॥ २६ ॥
इसी प्रकार रंगमंच पर कक्ष्या का विभाग प्रयोग के अनुसार, मनुष्य
पात्रों की पहुँच के अनुसार भारतवर्ष में ही प्रदर्शित करना चाहिये ।
मैं अब देव तथा गन्धर्व पात्रों के चलने तथा स्थित होने का वर्णन करता
हूँ । ( जिसे आप समझें ) ॥ २६ ॥
हिमवत्पृष्ठसंस्थे⁹ तु कैलासे पर्वतोत्तमे¹⁰ ।
यक्षाश्च गुह्यकाश्चैव धनदानुचराश्च ये ॥ २७ ॥
रक्षोभूतैः¹¹ पिशाचाश्च सर्वे हैमवताः स्मृताः ।
हेमकूटे च गन्धर्वा विज्ञेयाः¹² साप्सरोगणाः ॥ २८ ॥
सर्वे नागाश्च निषधे शेषर्वासुकितक्षकाः¹³ ।
महामेरौ¹⁴ त्रयस्त्रिंशज्ज्ञेया देवगणा¹⁵ बुधैः ॥ २९ ॥
१. मध्याह्ना दिवसोऽपि वा—क० । २. अङ्केऽङ्के—क० ।
३. त्वर्थबीजवशानुगः—क० ।
४. अङ्कच्छेदं पुनर्वृत्तं—क०; ग० । ५. वर्षात्तु—ग० ।
६. कार्य माससमाश्रयम्—ग० । ७. प्रयोक्तृभिङ—क० ।
८. गतिर्या तु—क०, घ० गतौ येषां—ग० । ९. पृष्ठपार्श्वे तु—क० ।
१०. पर्वतोत्तरे—क० । ११ रक्षःपिशाचभूताश्च—ग० ।
१२. विज्ञेयाप्सरसां गणाः—क० । १३ शेषप्रभृतयः स्मृताः—क० ।
१४. तथा मेरौ—क० । १५. देवगणास्तथा—घ० ।