नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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प्रश्न—( पृथ्वी पर अनेक देश होने पर ) इन प्रवृत्तियों के चार भेद
रखना कैसे उचित होगा ? जबकि इनके प्रयोग तथा लक्षण नाट्यप्रयोग
में समान परिलक्षित होते हों ?
उत्तर—यह ठीक है कि इनके ( कुछ ) समान लक्षण दिखाई देते हैं
परन्तु मैंने मनुष्यों के देश, वेष, भाषा तथा रूढ़िगत व्यवहार विभिन्न होने
के कारण एवं विविध देशी प्रजा की रुचि के अनुसार भारती, सात्वती,
कैशिकी तथा आरभटी नामक चार वृत्तियों के आधार पर नाट्यप्रयोग के
लिए इन प्रवृत्तियों के भी चार प्रकार ( ही ) मान लिए हैं। क्योंकि विभिन्न
प्रदेश वृत्तियों के ( प्रयोग तथा ) प्रदर्शन से सम्बद्ध होते हैं। अतएव
इसी आधार पर प्रवृत्तियों के भी चार भेद उपपन्न हो गए, जिनमें समस्त
नाट्य-प्रदर्शन समाहित हो सके।
दाक्षिणात्या प्रवृत्ति—
तत्र दाक्षिणात्यास्तावद्बहुनृत्तगीतवाद्याः कैशिकीप्रायाः चतुर¹-
मधुरललिताङ्गाभिनयाश्च। तद्यथा—
(गद्य भाग)—इनमें दक्षिण प्रदेश की प्रजा अनेक नृत्त ( नृत्य ) गीत,
वाद्य से युक्त तथा कैशिकीवृत्ति सम्पन्न ललित अंगों से विविध प्रदर्शित
अभिनय देखने की रुचि रखती है। दाक्षिण्य प्रदेश ये हैं—
महेन्द्रो मलयः सह्यो मेकलः² कालमंजरैः¹।
एतेषु⁴ संश्रिता देशास्ते ज्ञेया दक्षिणापथाः ॥ ३७ ॥
महेन्द्र, मलय, सह्य, मेकल तथा काल ( पाल ) मं(पं) जर³
(कालपंजर) पर्वतों से युक्त (दक्षिण) प्रदेश 'दक्षिणापथ' कहलाता है ॥३७॥
कोसलास्तोसलाश्चैव कलिङ्गा यवनाः⁶ खसाः।
द्रमिडाँन्ध्रमहाराष्ट्रा वेण्णा वै वानवासंजाः⁹ ॥ ३८ ॥
१. कालमंजर या कालपंजर वर्तमान कालेंजर के ही नाम हैं।
१. चतुरललित—क०। २. मेखलः—क०; मेखकः—ख; ग०।
३ कालपञ्जरः—ख०; ग०। ४. एतेषु ये श्रिता देशाः स ज्ञेयो दक्षिणा-
पथः—ख०; ग०।
५. कोशलास्तोशला—क०। ६. यवनौसलाः—क०; एव मोसलाः—ख०।
७. द्रमिलाश्च—क०। ८ भिल्ला—क०।
९. वानवासिकाः—क०; वानवासिजाः—ख०; ग०।