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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 668 में से

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पृष्ठ 294

चतुर्दशोऽध्यायः १८३
पात्र का अपना स्वरूप प्रच्छन्न रखने की दशा में पृथ्वी पर चलना भी
बतलाया जा सकता है; क्योंकि यहां वे मनुष्य स्वरूप धारण करने के
कारण ही दिखाई देते हैं ॥ १८-२० ॥
[ भारतेष्वथ हैमे वा हरिवर्षे इलावृते ।
रम्ये किम्पुरुषे वापि कुरुषूत्तरकेषु वा ]
दिव्यानां छन्दगमनं सर्ववर्षेषु कीर्तितम् ।
भारते मानुषाणान्तु गमनं संविधीयते ॥ २१ ॥
दिव्य (तथा दिव्यादिव्य) पात्र जम्बू-द्वीप आदि सभी वर्षों में [या
भारतवर्ष, हिमाचल, हरिवर्ष, इलावर्त खण्ड, किम्पुरुष (किन्नर-देश)
प्रदेश, उत्तर कुरु आदि प्रदेशों में] अपने इच्छानुसार जा आ सकते हैं
परन्तु मानव (पात्र) केवल भारतवर्ष में ही घूमने वाले रखना
चाहिए ॥ २१ ॥
दूर देश की यात्रा में प्रस्थान—
विकृष्टं यस्तु गच्छेद्वि देशं कार्यवशान्नरः ।
अङ्कच्छेदे तमन्यस्मिन्निर्द्दिशेच्च प्रवेशके ॥ २२ ॥
यदि किसी पात्रविशेष का कार्यवश दूरदेश में प्रस्थान बतलाया
जाए तो अंक की वहीं समाप्ति करते हुए दूसरे अंक के (प्रारंभ में) प्रवेशक
के द्वारा वही बात प्रदर्शित की जाए।
एक अंक में सम्पाद्य (किये जाने वाले) कार्यों का समय निर्धारण—
अह्नः प्रमाणं गत्वा तु कार्यलाभं विनिर्दिशेत् ।
तथालाभे तु कार्येऽस्या अङ्कच्छेदो विधीयते ॥ २३ ॥
यदि किसी कार्य में (एक दिन की) घटना चल रही हो तो उसकी
दूरी को प्रदर्शित करना चाहिए परन्तु उस कार्य से (किसी) फल के पूर्ण
न होने की दशा में अंक समाप्त कर देना चाहिए ॥ २३ ॥
१. अयं श्लोकः कादि पुस्तके प्रक्षिप्तः । २. वर्षेष्वेतेषु कारयेत्—ग० ।
३. एते पञ्चश्लोकाः अत्र वर्तन्ते। परम् एषाञ्च संवादिन्यः कारिका
दशरूपकाध्याये (ना० शा० अ० २०) अभिनवगुप्तेन व्याख्याताः न चात्र ।
सम्पा० । गच्छेद्यदि विकृष्टस्तु देशकालवशान्नरः—क० ।
४. अङ्कच्छेदेन चान्यस्मिन्—क० घ०; अङ्कच्छेदं न चान्यस्मिन्—ग० ।
५. निर्दिशेत् प्रविशेशके—ग० ।
६. अङ्कप्रमाणं—क०; अध्वप्रमाणं—ग०, घ० ७. कार्यस्य—ग० ।