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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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त्रयोदशोऽध्यायः १७५
मुनिजन के अपने नियमानुकूल आसन रहते हैं तथा विभिन्न
मतावलम्बी संन्यासी पात्रों के उनके व्रतानुसार आसन रहते हैं ॥ २१५ ॥
वृसीमुण्डासनप्रायं वेत्रासनमथापि वा ।
होमे यज्ञक्रियायाञ्च पित्र्यर्थे च प्रयोजयेत् ॥ २१६ ॥
जब होम, यज्ञ, तथा पितृतर्पण करना हो तो उस समय वृसी,
मुण्डासन या वेत्रासन पर बैठना चाहिए ॥ २१६ ॥
आसन का सामान्य विधान—
स्थानीया ये च पुरुषाः कुलविद्यासमन्विताः ।
तेषामासनसत्कारः कर्तव्यं इह पार्थिवैः ॥ २१७ ॥
समे समासनं दद्यान्मध्यमे मध्यमासनम् ।
अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च हीने भूम्यासर्न भवेत् ॥ २१८ ॥
उपाध्यायस्य नृपतेर्गुरुणोश्चाग्रतो बुधैः ।
भूम्यासनन्तथा कार्यमथवा काष्ठासनम् ॥ २१९ ॥
नौ-नाग-रथैयानेषु भूमिकाष्ठासनेषु च ।
सहासनं न दुष्येत गुरुपाध्यायपार्थिवैः ॥ २२० ॥
जो स्थानीय पुरुष अवस्था में बड़े, कुलीन तथा विद्वान हों उनका
राजा उचित आसन देते हुए सत्कार करे ।
इनमें भी जो समान स्थिति के हों उन्हें बराबरी का, मध्यम पात्रों को
मध्यम, श्रेष्ठ जन को ( अपने ) से ऊंचा तथा हीन पात्रों का पृथ्वी पर
( नीचा ) आसन रखना चाहिए ।
बुद्धिमान पुरुष अपने उपाध्याय, राजा तथा गुरुजन के सम्मुख पृथ्वी
पर या काष्ठासन पर ही बैठे । ( परन्तु )
नौका, हाथी, रथ तथा यान में अपने गुरु, उपाध्याय तथा राजा के
साथ-साथ बैठने पर भी आसन दोष नहीं रहता ॥ २१६-२२० ॥
शयनावस्था में शरीर की स्थिति—
आकुञ्चितं समञ्चैव प्रसारितविवर्तने ।
उद्वाहितं नर्तञ्चैव शयने कर्म कीर्त्यते ॥ २२१ ॥


१. कर्तव्यो गुरुपार्थिवैः—क० ।
२. मध्ये मध्यं तथासनम्—क० । ३. गुरुणामग्रतो बुधैः—ग० ।
४. भूम्यासर्न सदा कार्यमथवा—ख० । ५ रथभूमीषु—क० ।
६. नतं षोढा शय्यास्थानानि निर्दिशेत्—क० ।