नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः १८१
जिस ओर भाण्ड-वाद्य तथा नेपथ्य-द्वारों का मुँह रहे उसे नाटक
प्रदर्शन के नियमानुसार पूर्व-दिशा समझी जाए ॥ ११ ॥
रंगमंच पर प्रवेश-निर्गम-विधान—
निष्क्रामेद्यै¹श्च तस्माद्वै स तेनैव तथा व्रजेत् ।
यत²स्तस्य कृतं तेन पुरुषेण निवेशनम् ॥ १२ ॥
जो व्यक्ति जिस स्थान से (जिस भवन आदि से) निष्क्रमण करे या
जो अपना कार्य पूर्ण कर चुका हो—तो वह पूर्ववत् उसी मार्ग से चला
जाए जिसका प्रवेश के समय उसने आने में उपयोग किया था ॥ १२ ॥
निष्क्रान्तोऽर्थवशाच्चा³पि प्रविशेद्यदि⁴ तद्गृहम् ।
यतः प्राप्तः⁵ स पुरुषस्तेन मार्गेण निष्क्रमेत् ॥ १३ ॥
किसी कार्यवश बाहर निकल जाने पर यदि वही पात्र पुनः वहीं (गृह
या स्थान पर) आवे तो उसी मार्ग या द्वार से प्रवेश करे जिससे वह
निकलकर (बाहर) गया था।
अर्थवार्थवशाच्चापि⁶ तेनैव सह गच्छति ।
तथैव⁷ प्रविशेद्गेहमेकाकी सहितोऽपि वा ॥ १४ ॥
तयोश्चापि⁸ प्रविशतोः कक्षामन्यां⁹ विनिर्दिशेत् ।
परिक्रमेण रङ्गस्य त्वन्या कक्ष्या विधीयते ॥ १५ ॥
या किसी कार्यवश (जिसे कहा हो) यदि वह उसी पात्र के साथ गृह
(आदि) में (पुनः) प्रवेश करे तो उस पात्र के साथ या अकेले—जैसा भी
आवश्यक हो—वह उसी तरह प्रवेश करे। इस प्रकार दोनों पात्रों के प्रवेश
के समय अन्य कक्ष्या की सूचना दी जाए। रंगमंच पर एक या अनेक बार
(जैसा भी आवश्यकतानुसार हो) परिक्रमा करने से दूसरी कक्ष्या सूचित हो
जाती है ॥ १४-१५ ॥
१. निष्क्रामेच्चापि यस्तत्र नरः कार्येण केनचित् । स निष्क्रमेत्तु तेनैव कृतं येन
निवेशनम्—ख०, ग० । २. यतस्तस्य कृते—क० ।
३. वशाद्वापि—क० । ४. न विशेद्यदि—क० ।
५. प्राप्तः सः पुरुषो येन स तेनैव पथा व्रजेत्—क० ।
६. यदप्यर्थवशाच्चैव—क० । ७. तेनैव प्रविशेद्गेह—क० ।
८. तयोश्चैव—क० । ९. काष्ठामन्यां—ख०, ग० ।