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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 668 में से

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पृष्ठ 289

९०१ नाट्यशास्त्रम्
चतुर्दशोऽध्याय
( कक्ष्यापरिधि तथा लोकधर्मि-निरूपणाध्याय )
ये तु पूर्वं मया प्रोक्तास्त्रयो वै नाट्यमण्डपाः ।
तेषां विभागं विज्ञाय ततः कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ १ ॥
नाट्यगृह के तीन प्रकारों को समझते हुए जिनका कि पहिले वर्णन
किया जा चुका है अतः उनके विभेदों को जानकर रंग-मंच की कक्ष्याओं का
विभाग नियत किया जाए १ ॥ १ ॥
वाद्यों की स्थापना
३ये नेपथ्यगृहद्वारे मया पूर्वं प्रकीर्तिते४।
तयोर्भाण्डस्य विन्यासो मध्ये कार्यः प्रयोक्तृभिः ॥ २ ॥
नेपथ्य गृह के जिन दो द्वारों को पहिले बतलाया जा चुका है उनके
मध्यवर्ती प्रदेश में ( बीच में ) भाण्ड वाद्य वादकों को बिठाया जाए ॥२॥
१. पूर्व अध्याय में गति के प्रचारादि में उपयोगी स्थानों का विभागपूर्वक
उल्लेख नहीं किया गया । इन स्थानों का रंगमंच पर विभाजित रूप से निर्देश
आवश्यक होने के कारण पिछले अध्याय से इस अध्याय की संगति स्थापित
होती है ।
यद्यपि उद्देशक्रम में 'कक्ष्या' का स्थान अन्तिम है तथापि बिना कक्ष्या के
अभिनयादि उपपन्न नहीं हो सकते इसलिये यहां भरतमुनि ने उसे विषयप्र-
तिपादन की आवश्यकता को दृष्टि में रखकर ही उचित स्थान दे दिया है। यहाँ
क्रम का उल्लंघन भी इसी कारण हो गया है तथा इसके यहाँ प्रतिपादन करने
का विशेष कारण यह भी है कि गन्तव्य प्रदेश का आश्रय लेने के कारण गतियों
का एवं जल, स्थल आदि अनेक सम या विषम प्रदेशों का आश्रय रखने के
कारण देशों का रंगमंच के प्रयोग स्थान पर कक्ष्या के बिना प्रदर्शन सम्भव नहीं
हो सकता था । अतएव इस कारण भी कक्ष्याओं का निरूपण अब आगे नहीं
बढ़ाया जा सकता था ।
१. अथ त्रयोदशोऽध्यायः—क०, ख० । २. कक्षां—ख० ।
३. नेपथ्यरङ्गभूमौ तु यौ विभागौ प्रकीर्तितौ—क० ।
४. प्रकीर्तिताः—क० । ५. तेषां—क० ।