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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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१८६ नाट्यशास्त्रम्
दृष्ट्या हि सूचितो भावः पश्चादङ्गैर्विभाव्यते¹ ।
॥ एवं कक्ष्याविभागस्तु मया प्रोक्तो द्विजोत्तमाः ॥ ३५ ॥
पुनश्चैव प्रवक्ष्यामि प्रवृत्तीनान्तु लक्षणम् ।
इन पात्रों के कार्य तथा चेष्टाएँ अपनी शक्ति तथा प्रकृति के अनुसार
रखी जाएँ किन्तु इनके आचार एवं स्वरूप को मनुष्यों के समान ही रखा
जाए। दिव्य पात्रों की सभी चेष्टाएं और सभी भाव मानवीय होने
चाहिए। दिव्यपात्रों की दृष्टि अनिमेष (पलक न मिलने वाली) नहीं
रहनी चाहिए (चाहे वह इन पात्रों की प्रकृति ही क्यों न हो) क्योंकि इस
नाट्य-प्रदर्शन में सभी भाव दृष्टि पर आधृत होते हैं। तथा भाव सर्वप्रथम
दृष्टि द्वारा अभिव्यक्त होकर पुनः अंगावयवों द्वारा अभिनीत किया जाता
है। हे मुनियों, इस प्रकार मंच पर होने वाला कक्ष्या विभाग का मैंने
निरूपण किया। अब मैं प्रवृत्तियों का स्वरूप बतलाता हूँ ॥ ३२-३५ ॥
प्रवृत्तियां और उनकी चार विधाएं—
चतुर्विधा प्रवृत्तिश्च प्रोक्ता नाट्यप्रयोक्तृभिः ।
आवन्ती दाक्षिणात्या च पाञ्चाली चोढ्रमागधी ॥ ३६ ॥
नाट्य प्रयोक्ता जन की मान्यता के अनुसार प्रवृत्तियों² के चार प्रकार
१. कक्ष्या विभाग के निरूपण के उपरान्त यद्यपि धर्मी (नाट्य या लोक-
धर्मी) का वर्णन क्रम प्राप्त था किन्तु 'यत्र वार्ता प्रवर्तेत' (ना० शा० १४।७)
के अनुसार कक्ष्याविभाग से जब देशभेद अभिहित किया जाता हो तो इसी से
देश के विभाग द्वारा प्रवृत्तियों का भी आक्षेप द्वारा अवबोध हो जाएगा; क्योंकि
कक्ष्याविभाग के नियमानुसार जब किसी पात्र का उत्तर-द्वार से प्रवेश हो
तो निश्चित ही ऐसा पात्र आवन्त्य या दाक्षिणात्य होगा। अतएव ऐसे कार्यों
का बिना प्रवृत्तियों के ज्ञान के सम्पादन नहीं किया जा सकता है। इसी
उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए भरत मुनि ने कक्ष्याविभाग के तुरन्त बाद
सर्वप्रथम प्रवृत्तियों का ही औचित्य मानकर विवरण देना आरम्भ किया।
१. पुनरङ्गै—ग० ।
२. अतः परं धर्मीलक्षणं कासुचित् मातृकासु लभ्यते तच्च परस्तादेव वर्तते
इति नात्रोट्टङ्कितम् ।
३. विज्ञेया नाट्यकोविदैः, प्रयोज्या नाट्ययोक्तृभिः—क; प्रोक्ता नाट्य-
प्रयोगतः—ग० । ४. चैव मागधी; चान्ध्रमागधी; सोढ्रमागधी—क० ।