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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 668 में से

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पृष्ठ 304

चतुर्दशोऽध्यायः १९३
नाट्य रचना के दो सामान्य प्रकार—
प्रयोगो द्विविधश्चैव विज्ञेयो नाटकाश्रयः।
सुकुमारस्तथाविद्धो नाट्ययुक्तिसमाश्रयः ॥ ५७ ॥
नाट्य व्यवहार (नियम) के अनुसार नाट्य प्रयोग दो प्रकार का
सामान्य रूप में माना जाता है। ये हैं—सुकुमार तथा आविद्ध ॥ ५७ ॥
आविद्ध नाट्य-प्रयोग—
यस्त्वाविद्धाङ्गहारन्तु छेद्यभेद्याह्वोत्मकम् ।
मायेन्द्रजालबहुलं पुस्तनेपथ्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥
पुरुषैर्बहुभिर्युक्तमल्पस्त्रीकं तथैव च ।
सात्वत्यारभटीप्रायं नाट्यमाविद्धमेव तत् ॥ ५९ ॥
आविद्ध नाट्य-प्रयोग में अंगहारों के साथ छेदन, भेदन तथा युद्ध का
(युद्ध की चुनौती देने का) प्रदर्शन रहता है। इसमें माया तथा इन्द्रजाल
आदि शक्तियों का उपयोग बतलाया जाता है तथा मुख-रचना (नेपथ्य)
में पलस्तर की बहुलता होती है। इसमें पुरुष-पात्र अधिक तथा स्त्री-पात्र
कम रखे जाते हैं और इसमें सात्वती और आरभटी वृत्ति का (अधिकांश)
प्रदर्शन रहता है ॥ ५८-५९ ॥
डिमः समवकारश्च व्यायोगेहामृगौ तथा ।
एतान्याविद्धसंज्ञानि विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६० ॥
रूपकों में डिम, समवकार, व्यायोग तथा ईहामृग को नाट्यकुशल
महानुभाव आविद्ध नाट्यप्रकार मानते हैं ॥ ६० ॥
एषां प्रयोगः कर्तव्यो देवं दानवराक्षसैः ।
उद्धता ये च पुरुषाः शौर्यवीर्यबलोन्विताः ॥ ६१ ॥
आविद्ध नाट्य प्रकार का प्रयोग देव, दानव, राक्षस तथा शौर्य,
वीर्य एवं शक्ति सम्पन्न उद्धत प्रकृति के पुरुषों के द्वारा किया जाना
चाहिए ॥ ६१ ॥
१. नाटकाश्रितः—क० । २. तत्राविद्धा—सत्वाविद्धाङ्ग—क० ।
३. हवात्मकः—क० । ४. बहुलो—क० । ५. संयुतः—क० ।
६. प्रयोगः पुरुषप्रायस्तथाल्पस्त्रीक एव च—क० ।
७. भटीयुक्तो ज्ञेय आविद्धसंज्ञितः—क० ।
८. आविद्धसंज्ञा विज्ञेमाः प्रयोगस्य वशानुगाः—क० ।
९. एष—ग० । १०. दैत्य—ख; ग० । ११. उद्धताश्चैव—क० ।
१२. समन्विताः—क० ।
१३ ना० शा० द्वि०