नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः १८५
नीले तु वैडूर्यमये सिद्धा¹ ब्रह्मर्षयस्तथा ।
दैत्यानां दानवानाञ्च श्वेतपर्वत उच्यते² ॥ ३० ॥
पितरश्चापि विज्ञेया; ³शृङ्गवन्तं समाश्रिताः ।
इत्येते पर्वतश्रेष्ठा⁴ दिव्यवासा भवन्ति⁵ हि ॥ ३१ ॥
तेषां कक्ष्याविभागश्च⁶ जम्बुद्वीपे भवेदियम् ।
जो यक्ष, गुह्यक, कुबेर के सेवक, राक्षस, भूत तथा पिशाच जैसे पात्र
हों वे हिमालय या कैलास पर्वत पर निवास रहने के कारण—सभी 'हैमवत'
कहलाते हैं। (अतएव हिमालय पर्वत पर इनका निवास, गति आदि
प्रदर्शित किया जाए)। गन्धर्व तथा अप्सराएं हैमकूट पर्वत पर रहती हैं।
शेष, वासुकी तथा तक्षक आदि सभी नाग का 'निषध' में निवास रहता
है। तैतीस (करोड़) देवताओं का समूह सुमेरु पर्वत पर तथा सिद्ध और
ब्रह्मर्षिगण वैडूर्यमणिमय नीलपर्वत पर रहते हैं। दैत्य और दानवों का
निवास श्वेत पर्वत पर तथा पितरों का आवास शृंग पर्वत पर माना जाता
है। ये ही वे श्रेष्ठ पर्वत हैं जिन पर देवता तथा यक्ष आदि दिव्यपात्रों
का आवास रहता है। अत एव (नाटक की कथावस्तु के प्रसंगानुसार
मंच पर इनसे सम्बद्ध कथा प्रदर्शित करने की स्थिति में) कक्ष्याओं का
विभाग करते समय इन पर्वतों को जम्बू द्वीप में मानते हुए रखा
जाए ॥ २७–३१)
देवगण के कार्य—
तेषां न⁷ चेष्टितं कार्यं स्वैः स्वैः कर्मपराक्रमैः ॥ ३२ ॥
परिच्छेदविशेषाँ⁸स्तु तेषां मानुषलोकवत् ।
सर्वे भावास्तु देवानां⁹ कार्या मानुषसंश्रयाः ॥ ३३ ॥
तेषां¹⁰ त्वनिमिषत्वं यत्तन्न कार्यं प्रयोक्तृभिः ।
इह भावा रसाश्चैव दृष्ट्यर्थामेव¹¹ प्रतिष्ठिताः ॥ ३४ ॥
१. सिद्धा देवर्षयस्तथा — क०; सिद्धब्रह्मर्षयस्तथा — ग० ।
२. इष्यते — क०; ग० । ३. शृङ्गवद्गिरिवासिनः — क० ।
४. पर्वताः श्रेष्ठाः — क० । ५. प्रकीर्तिताः — ग० ।
६. विभागस्तु — क० । ७. एतेषां — क०; तेषां तु — ख०; ग० ।
८. विशेषस्तु — क०; ग० । ९. दिव्यानां — ग० ।
१०. अनिमेषस्तु यस्तेषां स न कार्यः — क०; तेषामनमिषं यत्तु — ख० ।
११. दृष्टावेव — ग० ।