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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 668 में से

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पृष्ठ 302

चतुर्दशोऽध्यायः १९१
हिमवत्संश्रिता ये तु गङ्गायाश्चोत्तरां दिशम् ।
ये² श्रिता वै जनपदास्तेषु पाञ्चालमध्यमा ॥ ४८ ॥
पांचाल, शौरसेन, काश्मीर, हस्तिनापुर, वाल्हीक, शाकल (शल्यक
या शाल्व) मद्र, उशीनर प्रदेश तथा गंगा नदी के उत्तर में या हिमाचल
पर स्थित प्रदेश हैं, ये सभी पांचालमध्यमा प्रवृत्ति को ग्रहण करते हैं ॥
पाञ्चालमध्यमायान्तु सात्वत्यारभटी स्मृताै ।
प्रयोगस्त्वल्पगीतार्थ आविद्धगतिविक्रमः ॥ ४९ ॥
इस (पांचालमध्यमा) प्रवृत्ति में सात्वती तथा आरभटी वृत्ति का
प्राधान्य रहता है। इसके व्यवहार में गीत की न्यूनता तथा असामान्य
गति और पादचालन का आधिक्य रखा जाता है ॥ ४९ ॥
प्रवृत्ति (के अवेक्षण) में दो क्रियाएं—
द्विधा क्रिया भवत्यासां रङ्गपीठपरिक्रमे ।
प्रदक्षिणप्रवेशाँ च तथा चैवाप्रदक्षिणा ॥ ५० ॥
रंगमंच पर चलने में उपयोग की जाने वाली क्रियाएं इन प्रवृत्तियों के
द्वारा दो प्रकार से प्रदर्शित की जाती हैं—एक दाहिनी ओर से तथा दूसरी
बायीं ओर से मंच पर प्रवेश करते हुए ॥ ५० ॥
आवन्ती दाक्षिणात्या च प्रदक्षिणपरिक्रमे ।
अपसव्यप्रवेशाँ तु पाञ्चाली चोढ्रमागधी ॥ ५१ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में दाहिनी ओर से रंगमंच पर
प्रवेश कर चलना होता है तथा पांचाली और औढ्रमागधी प्रवृत्ति में यह
बायीं ओर से रहता है ॥ ५१ ॥
आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां पार्श्वद्वारमथोत्तरम् ।
पाञ्चाल्यामोढ्रमागध्यां योज्यं द्वारन्तु दक्षिणम् ॥ ५२ ॥
आवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रवृत्ति में उत्तर दिशा के बाजू के द्वार से
तथा पांचाली और औढमागधी में दक्षिण प्रवृत्ति द्वार से प्रवेश करने की
योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
१. तथा प्राप्य प्रदक्षिणम्—क० । २. ये चाश्रिता—क० ।
३ श्रिता—क० । ४ प्रदेशास्तु—ख०; ग० ।
५. प्रदेशा च—ख०; ग० । ६. योज्यं द्वार—ख०; ग०, घ० ।