सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 290

चतुर्दशोऽध्यायः १७९
कक्ष्या-गत विभाग—
कक्ष्या¹विभागो निर्देश्यो रङ्गपीठपरिक्रमात् ।
परिक्रमेणं² रङ्गस्य ह्यान्या कक्ष्या भवेदिह³ ॥ ३ ॥
रंगमंच की परिधि के भाग में चलने से उसके विभाग सूचित (या
प्रतीत ) हो जाते हैं । जब किसी पात्र को अपनी कक्ष्या परिधि परिवर्तित
करना हो वह उसे परिक्रमण-या अन्य कक्ष्या में चलने-के द्वारा प्रदर्शित
करे³ ॥ ३ ॥
कक्ष्या विभाग की उपयोगिता—
कक्ष्याविभागे ज्ञेयानि गृहाणि नगराणि च ।
उद्या⁴नारामसरितस्त्वाश्रमा अटवी तथा ॥ ४ ॥
पृथिवी⁵ सागराश्चैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
वर्षाणि⁶ सप्त द्वीपाश्च पर्वता विविधास्तथा ॥ ५ ॥
आलोकश्चैव लोकश्च रसातलमथापि च ।
दैत्या⁷नागालयाश्चैव गृहाणि भव⁸नानि च ॥ ६ ॥
इस कक्ष्या विभाग की परिधि में (जो पात्र के किसी विभाग विशेष
पर स्थित होने से जानी जाती हो तथा जिस दृश्य का निरूपण करना
इष्ट हो) गृह, नगर, उद्यान, आदि से युक्त प्रदेश, ग्राम तथा नगर, नदी,
आश्रम, वन, पृथ्वी, समुद्र, जड़, चेतन पदार्थ समन्वित त्रैलोक्य, पृथ्वी के
किसी भी वर्ष, द्वीप, विविध पर्वत, लोकालोक पर्वत, पाताल, दैत्य तथा
सर्पों के निवासस्थान, आराम गृह तथा नगर आ जाते हैं ॥ ४–६ ॥
१. इस विवरण से प्रतीत होता है कि केवल रंगमंच पर विभिन्न स्थानों के
द्वारा ही दृश्य और प्रदेश बतलाये जाते थे और दृश्य-परिवर्तन की अधिक
आवश्यकता होने पर अन्य अंक के द्वारा यह भी हो सकता था । दृश्यों के
परिवर्तनार्थ पटपरिवर्तन जैसे किसी विधान का कम ही उपयोग होता था ।
१. कक्ष्याविभागौ निर्देश्यौ रङ्गपीठपरिक्रमैः—क० ।
२. परिक्रमे च—क० । ३. विधीयते—ग०, घ० ।
४. उद्यानारामसहितो देशो ग्रामोटवीं तथा—ख०, ग० ।
५. ससागरा च पृथिवी तथा त्रैलोक्यमेव च—क० ।
६. द्वीपा सप्ताथ वर्षाणि—क० ।
७. दैत्यानामालयश्चैव—ख०, ग० । ८. च वनानि च—घ० ।