नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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शयनावस्था में होने वाली छः स्थितियाँ हैं—(१) आकुंचित, (२)
सम, (३) प्रसारित, (४) विवर्तित, (५) उद्वाहित तथा (६) नत ॥
आकुंचित—
सर्वैराकुञ्चितैरङ्गैः शय्याविद्धे तु जानुनी।
स्थानमाकुञ्चितं नाम शीतोर्तानां¹ प्रयोजयेत् ॥ २२२ ॥
दोनों घुटनों को बिछोने में रखकर सारे शरीर को झुकाकर सिकुड़ाते
हुए सोना 'आकुंचित' दशा कहलाती है। इसकी योजना ठण्ड से
ठिठुरते पात्र में की जाती है ॥ २२२ ॥
सम—
उत्तानितमुखञ्चैव प्रत्यङ्मुक्तकरन्तथा।
समं नाम प्रसु²प्तस्य स्थानकं संविधीयते ॥ २२३ ॥
मुंह ऊपर की ओर, हाथ खाली ढीले और नीचे की ओर फैले हुए
रखकर सोने को 'सम' स्थान जानो। इसकी सोये हुए पुरुष में योजना
की जाए ॥ २२३ ॥
प्रसारित—
एकं भुजमुपाधाय सम्प्रसारित-जानुकम्।
स्थानं प्रसारितं नाम सुखं³सुप्तस्य कारयेत् ॥ २२४ ॥
एक बाँह को सिरहाना बनाकर जंघाओं को फैलाते हुए सोना
'प्रसारित' स्थान होता है। इसकी आनन्दपूर्वक या निश्चिन्तता से सोने की
अवस्था बतलाने में योजना करनी चाहिए ॥ २२४ ॥
विवर्तित—
अधोमुखस्थितश्चैव विवर्ति⁴तमिति स्मृतम्।
शस्त्रक्षतमृतोत्क्षिप्तमत्तोन्मत्तेषु कारयेत् ॥ २२५ ॥
नीचा मुंह कर सोना 'विवर्तित' कहलाता है। शस्त्रों के घाव लग जाने,
मरण, ऊपर से या ऊंचे स्थान से गिर जाने, (उत्क्षिप्त), नशे के कारण मस्त
हो जाने तथा पागल होने की दशा में इसकी योजना की जाती है ॥ २२५ ॥
१. शीतानान्तु—ख०; ग०। २. तु सुप्तस्य—ख०; ग०।
३. खलु सुप्तस्य—ख०; ग०।
४. विवर्तनम्—क०; विकर्तनम्—ख०; ग०।