नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० नाट्यशास्त्रम्
¹नगरे वा वने वापि वर्षे वा पर्वतेऽपि वा ।
यत्र वार्ता² प्रवर्तेत³ तत्र कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥
ये परिधियां नाटक की कथावस्तु के विषयानुसार मंच पर (वहीं)
स्थापित की जायें जहाँ प्रस्तुत किये जाने वाले कथानक के नगर, वन, वर्ष
या पर्वत के दृश्य (रखे गये) हों ॥ ७ ॥
रंगमंच पर सम्बन्धित प्रदेश की सूचनाएँ—
बाह्यं⁴ वा मध्यमं वापि तथैवाभ्यन्तरं पुनः ।
दूरं वा सन्निकृष्टं वा देशन्तु⁵ परिकल्पयेत्⁶ ॥ ८ ॥
रंगमंच पर ये कक्ष्या विभाग अन्दर, बाहर, मध्य, दूर तथा समीप के
प्रदेश से (कथावस्तु के अनुसार परस्पर) सम्बद्ध रहें ॥ ८ ॥
पूर्वं प्रविष्टा ये रङ्गं ज्ञेयास्ते⁸ऽभ्यन्तरा बुधैः⁷ ।
पश्चात्प्रविष्टा विज्ञेया कक्ष्या-भागे तु बाह्यतः ॥ ९ ॥
इन कक्ष्या विभागों की रूढ़ि (प्रथा) के अनुसार जो रंगमंच पर
पहिले प्रविष्ट हो चुके हों वे अभ्यन्तर पात्र (गृह या प्रासाद आदि में स्थित)
तथा बाद में मंच पर प्रविष्ट होने वाले बाह्य पात्र कहलाते हैं ॥ ९ ॥
तेषान्तु दर्शनेच्छुर्यः⁹ प्रविशेदङ्गमण्डलम् ।
दक्षिणाभिमुखः¹⁰ सोऽथ कुर्यादात्मनिवेदनम् ॥ १० ॥
और जो पात्र इन (पूर्व प्रविष्ट) पात्रों को देखने या मिलने के लिए
मंच पर आए वह अपनी बात दाहिनी (दक्षिण दिशा की) ओर मुंह
करते हुए कहे ॥ १० ॥
रंगमंच की पूर्व-दिशा—
¹¹यतो मुखं भवेद्भाण्डद्वारं नेपथ्यकस्य¹² च ।
सा¹³ मन्तव्या तु दिक्पूर्वा नाट्ययोगेन¹⁴ नित्यशः ॥ ११ ॥
१. तथा सप्तसमुद्राश्च वर्षा वै पर्वतास्तथा—ख०, ग०।
२. वार्ताः प्रवर्त्तन्ते—क०। ३. प्रवर्तयेत्—ख०, ग०।
४. बाह्याच्च—क०। ५. देशात्तु—ग०।
६. समुपपादयेत्, समुपलक्षयेत्—क०।
७. भ्यन्तरे बुधैः, तेऽभ्यन्तरस्थिताः—क०। ८. ज्ञेयाश्च—क०।
९. दर्शनस्पर्शै—क०; दर्शनेच्छुः सन्—ख०।
१०. मुखः सो वै—क०; मुखं सोऽथ—ग०।
११. पद्यमेतत् ग-पुस्तके नास्ति। १२. नेपथ्यमेव च—क०।
१३. पूर्वादिदिक्षु विज्ञेयं प्रयोगे नाट्यसंश्रये—क०। १४. योगेषु—क०।