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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 668 में से

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चतुर्दशोऽध्यायः १८९
दक्षिणस्य समुद्रस्य तथा विन्ध्यस्य चान्तरे¹।
ये देशास्तेषु² युञ्जीत दाक्षिणात्या तु³ नित्यशः ॥ ३९ ॥
( तथा ) कोसल, तोसल, कलिंग, यवन, खस और द्रमिड, आन्ध्र,¹
महाराष्ट्र, वेष्ण², वानवासिक आदि विन्ध्याचल और दक्षिण समुद्र के बीच
वाले जो प्रदेश हैं उनमें भी दाक्षिणात्या प्रवृत्ति की योजना रखी जाए
( क्योंकि ये भी उपर्युक्त रुचि ही रखते हैं ) ॥ ३८-३९ ॥
आवन्ती-प्रवृत्ति—
आवन्तिका वैदिशिकाः सौराष्ट्रा४ मालवास्तथा ।
सैन्धवास्त्वथ सौवीरा आनर्ताः सार्बुदेयकाः५ ॥ ४० ॥
दशार्णास्त्रैपुराश्चैव तथा वै मार्तिकावताः६ ।
कुर्वन्त्यावन्तिकीमेते प्रवृत्तिं नित्यमेव तु ॥ ४१ ॥
अवन्ती, विदिशा, सौराष्ट्र, मालव, सिन्धु, सौवीर, और्बुदेय³, दशार्ण,
त्रिपुर तथा मृत्तिकावत प्रदेशों में आवन्ती प्रवृत्ति ग्रहण करने की रुचि
रहती है ॥ ४०-४१ ॥
सात्वतीं कैशिकीञ्चैव वृत्तिमेषां७ समाश्रिताः ।
भवेत् प्रयोगो नान्यत्र स तु कार्यः प्रयोक्तृभिः ॥ ४२ ॥
इन प्रदेशों में सात्विकी तथा कैशिकी वृत्ति से संश्लिष्ट८ नाट्य प्रदर्शन
१. आन्ध्र और महाराष्ट्र थोड़े परिवर्तन से विद्यमान इसी नाम के वर्तमान
प्रदेश ही हैं। इस विवरण में दिये हुए भौगोलिक-अभिधान पुराणों में भी इसी
प्रकार उपलब्ध होते हैं।
२. कृष्णा तथा पिनाकिनी नदी के तीर तथा तटवर्ती प्रदेश के निवासीगण
का 'वेष्ण' नाम है।
३. अर्बुदशब्द का अर्थ है वर्तमान आबूपर्वतवाला प्रदेश। मृत्तिकावती
प्रदेश-निवासी मार्तिकावत् ।
१. चोत्तरे—क० ।
२. संश्रितास्तेषु—ग०। ३. दाक्षिणात्यास्तु—ग० ।
४. आनर्तकाः—क० । ५. सार्वदेशकाः—क० ।
६. वै मानिकावताः—क०; वैवत्तिकावताः—ख०; ग० ।
७. वृत्तिमेते समाश्रिताः—क० घ०; वृत्तिमेषा समाश्रिता—ख०, ग० ।
८. नाट्ये च—क० ।