नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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सामूहिक-प्रवेश में पात्रों के वर्ग तथा स्थान-नियम—
समैश्च सहितो गच्छेदन्नीचैश्च परिवारितः¹।
अथ प्रेषणिकां²श्चापि निर्देश्यो ह्यग्रतो गतौ ॥ १६ ॥
यदि समान स्थिति के पात्र हों तो वे साथ-साथ और अधम पात्रों से
युक्त होने पर उनसे घिरे हुए चले। इनमें प्रतिहारी का (सामूहिक रूप में
नृप पात्र की प्रवेश दशा में) आगे-आगे चलना बतलाया जाए ॥ १६ ॥
दूर, मध्यम और संनिकृष्ट भूमि की सूचना—
सैव भूमिस्तु बहुभिर्विकृष्टा स्यात् परिक्रमैः ।
मध्या वा सन्निकृष्टा³ वा तेषामेवं विकल्पयेत्⁴ ॥ १७ ॥
नाट्य मंच की यही भूमि यदि पात्र अधिक चले तो दूर प्रदेश को
तथा कम चलने पर मध्यम व्यवधान वाले या समीपतर प्रदेश को प्रदर्शित
करती है¹ ॥ १७ ॥
दिव्य पात्रों की प्रकट तथा प्रच्छन्न दशा में गति—
नगरे वा वने वापि पर्वते सागरेऽपि वा ।
दिव्यानां गमनं कार्यं वर्षे⁵ द्वीपेऽपि वा पुनः ॥ १८ ॥
आकाशेन विमानेन माययाप्यथवा पुनः ।
विविधाभिः क्रियाभिर्वा नानार्थाभिः प्रयोगतः⁶ ॥ १९ ॥
नाटके छन्नवेषाणां दिव्यानां भूमिसञ्चरः ।
मानुषैः कारणादेषां यदा⁷ भवति दर्शनम् ॥ २० ॥
कथावस्तु की विभिन्न अपेक्षाओं के अनुसार दिव्य पात्रों का नगर,
वन, पर्वत, सागर, वर्ष (भारतवर्ष आदि) तथा द्वीप आदि (सभी)
प्रदेशों में आकाश, वायुयान (विमान) या माया के द्वारा या किसी दूसरे
अन्य प्रकार से पहुँचना (या जाना) बतलाया जाए। परन्तु किसी दिव्य
१. समीप या दूर प्रदेश से यात्रा करने का प्रसंग उत्तररामचरित के
द्वितीयांक में देखा जा सकता है।
१. परिवाहितः—ख०; ग०। २. प्रेक्षणिकांश्चापि—ख०; ग०।
३. विज्ञेया—ख०; ग०। ४. विकल्पनात्—क०।
५. वर्षद्वीपेषु वा पुनः—क०; द्वीपे वर्षेषु वा पुनः—ग०।
६. प्रयोक्तृभिः—क०। ७. यथा—ख०; ग०।