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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 668 में से

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पृष्ठ 303

१९२ नाट्यशास्त्रम्
एकीभूताः पुनश्चैताः प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः ।
पर्षदं देशकालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च ॥ ५३ ॥
परन्तु किसी विशेष सभा, स्थान, कार्य तथा प्रयोजन ( अर्थ ) या
अर्थ विशेष की अभिव्यक्ति को देखते हुए इन नियमों को सम्मिलित
( एकत्रित या समान ) भी कर सकते हैं ॥ ५३ ॥
येषु देशेषु या कार्या प्रवृत्तिः परिकीर्तिता ।
तद्वृत्तिकानि रूपाणि तेषु तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
चतुर नाट्य प्रयोक्ता इन प्रवृत्तियों में से जिन देशों में जो व्यवहार
होते हों वहां नाट्य प्रदर्शन करते समय वैसी ही प्रवृत्तियां बतलाएं ॥५४॥
एकीभूताः पुनस्त्वेताः नाटकादौ भवन्ति हि ।
अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं तत्तत् कर्म समाचरेत् ॥ ५५ ॥
ये नियम ( नाटिकादि ) नाट्य¹ रचना में सम्मिलित रूप में
रखने पर संक्षिप्त किये जाएं तथा प्रवृत्तियों की अधिकता को देखते हुए
प्रयोक्ताजन इनके आवश्यक या महत्वपूर्ण कुछेक कार्यों का प्रयोग या
प्रदर्शन करें ।
सार्थे बाहुल्यमेकस्य शेषाणामथ बुद्धिमान् ।
येषामन्यस्य बाहुल्यं प्रवृत्तिं पूरयेत्तथा ॥ ५६ ॥
जिसमें सभी का सामूहिक (सार्थ) या मिश्र रूप हो वहां किसी एक का
तथा जहां वैसा न हो वहां शेष का, इसी प्रकार जहां दूसरे की अधिकता
न हो वहां प्रवृत्तियों की बीच में अधिकता से पूर्ति करनी चाहिए ॥ ५६ ॥
१. आशय यह हे कि जिन प्रदेशों या देशों में जिस वृत्ति का उपयोग होता
हो या जिन वृत्तियों में जनसमुदाय रुचि लेता हो वहाँ प्रस्तुत किये जाने वाले
नाटकादि में उसी देश के नायक, या अन्य प्रवृत्तियों को प्रधानता देते हुए नाट्य-
प्रयोग प्रस्तुत करना चाहिए । यह कार्य कविगण अपनी रचना में तथा प्रयोक्ता-
गण अपने प्रयोग के प्रस्तुतीकरण में बिना किसी अपवाद के अवश्य रखें ।
१. वर्षञ्च देशं कालञ्च—क०; देशं कालमवस्थाञ्च काव्ययुक्तिमवेक्ष्य च—
क०; वर्षञ्च देशं कालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च—ख० ।
२. पूर्वं—क०; ख; ग० । ३. यदा त्वेताः—क० ।
४. गानकादौ—ख०; ग० । ५. कर्माचरेत् सदा—ख० ग० ।
६. पद्यमिदं ख—पुस्तके नास्ति । ७. यस्यान्यस्येऽस्य—क० ।