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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 668 में से

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पृष्ठ 288

त्रयोदशोऽध्यायः १७७
उद्वाहित—
अंसोपरि शिरः कृत्वा कूर्परक्षोभमेव च ।
उद्वाहितन्तु विज्ञेयं लीलायां वचने प्रभोः ॥ २२६ ॥
यदि सिर को कन्धे पर या कलाई को दबाते हुए शयन किया जाए
(कूर्परक्षोभ) तो 'उद्वाहित' स्थान जानो । इसकी क्रीडा तथा (अपने)
स्वामी के साथ संभाषण (बैठने, प्रवेश) करने की दशा में योजना
की जाए ॥ २२६ ॥
नत—
ईषत्प्रसारिते जङ्घे यत्र स्रस्तौ करावुभौ ।
आलस्यश्रमखेदेषु नतं स्थानं विधीयते ॥ २२७ ॥
यदि जंघाएं थोड़ी फैली हुई हों (तथा) दोनों हाथ ढीले रखकर
सोया जाने पर 'नत' स्थान कहलाता है । इसकी योजना आलस्य, श्रम
तथा थकावट क 'दशा प्रदर्शन में की जाए ॥ २२७ ॥
गतिप्रचारस्तु मयोदितोऽयं
नोक्तश्च यः सोऽर्थवशेन साध्यः ।
अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य
वक्ष्यामि कक्ष्यान्तरसंविधानम् ॥ २२८ ॥
हे मुनियो, इस प्रकार मैंने आपको गतिप्रचार के ये स्वरूप तथा लक्षण
बतलाये । इसमें जो बातें बतलाई न जा सकी हों उन्हें आप लोक-
व्यवहार में प्रयुक्त अर्थों के आधार पर स्वयं साध लें। अब मैं रंगमंच
(पर) की (जाने वाली) कक्ष्याओं की तथा उनमें संचार करने की
विधियों को (अगले अध्याय में) कहूँगा ॥ २२८ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे गतिप्रचारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः
भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का 'गतिप्रचार' नामक त्रयोदश अध्याय सम्पूर्ण
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१. हस्तोपरि—क० । २. लीलयाविशने—क० । ३. सृष्टौ—क० ।
४. अस्मात् परं क—पुस्तके 'रङ्गे विकृष्टे' इत्यादि (ना० शा० १३।२०)
पद्यं 'वयोनुरूपः प्रथमस्तु वेषः' (१४।६८) इत्यादि पद्यञ्च समुपलभ्यते ।
५. नोक्तस्तु—क० । ६. रङ्गविधिक्रमस्य—ख०; ग० ।
७. कक्ष्यां प्रविभागयुक्ताम्—ग०, घ० ।
८. द्वादशोऽध्यायः—क, क (भ०), ख० ।
१२ ना० शा० द्वि०