नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
१६२ नाट्यशास्त्रम्
गति के समय स्त्रियों की शारीरिक स्थिति—
स्त्रीणां स्थानानि कार्याणि गतिष्वाभाषणेषु च ।
आयतञ्चावहित्यञ्च अश्वक्रान्तमथापि च ॥ १६० ॥
स्त्रियों के भाषण तथा गति के समय होने वाले तीन स्थान होते
हैं—(१) आयत, (२) अवहित्थ तथा (३) अश्वक्रान्त ॥ १६० ॥
दक्षिणस्तु समः पादस्त्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ।
वामः³ समुन्नतकटिश्चायते स्थानके भवेत्⁴ ॥ १६१ ॥
आयत—दाहिना पैर ‘सम’, बायाँ पैर तिरछा होकर एक ताल के
अन्तर से एक बाजू उठा हुआ तथा बायीं ओर कमर उठी हुई होने पर
‘आयत’ स्थान होता है ॥ १६१ ॥
आवाहने विसर्गे च तथा निर्वर्णनेषु⁵ च ।
चिन्तायाञ्चावहित्थे च स्थानमेतत्प्रयोजयेत् ॥ १६२ ॥
रङ्गावतरणारम्भः⁶ पुष्पाञ्जलिविसर्जनम् ।
मन्मथेष्योर्द्धवं⁷ कोपं तर्जन्यङ्गुलिमोटनम् ॥ १६३ ॥
निषेधगर्वगाम्भीर्यमौनं⁹ मानावलम्बनम् ।
स्थानेऽस्मिन् संविधातव्यं¹⁰ दिगन्तरनिरूपणम् ॥ १६४ ॥
इस स्थान की योजना निमन्त्रण देने, पुकारने, आवाहन, विदाई या
त्याग (विसर्ग) करने, ध्यानपूर्वक देखने (निर्वर्णने), चिन्ता करने तथा
२. ष्वाभरणेषु च—ग० ।
१. तथाश्वक्रान्तमेव च—क०; अश्वक्रान्तमथापि वा—ग० ।
३. वामो नतः कटीपार्श्वमायते स्थानके भवेत्—क० ।
४. अतः परं क० पुस्तके आयतस्थान लक्षणं मित्थं दृश्यते—
वामः स्वभावतो यत्र पादो विरचितः समः ।
तालमात्रान्तरे न्यस्तस्त्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ॥
प्रसन्नमाननमुरः समं यत्र समुन्नतम् ।
लतानितम्बगौ हस्तौ स्थानं ज्ञेयं तदायतम् ॥
५. निर्वहणेषु च—क० । ६. वतरगारम्भं—क० ।
७. र्ष्याद्भवः कोपः—क० । ८. तर्जनाङ्गुलि—ख० ।
९. मौनमायावलम्ब—क०; मौनमानाव—ख ।
१०. सन्निधानीयं—क० ।
त्रयोदशोऽध्यायः १६३
छल-कपट करने ( अवहित्य ) में की जाए । इसी प्रकार रंगमंच पर
सर्वप्रथम प्रवेश करने, रंगमंच पर पुष्पाञ्जलि बिखेरने, ईर्ष्यायुक्त प्रणय
(दर्शाने) में क्रोध करने तथा तर्जनी के ऐंठने (या मुड़ाव करने) (मोटनम्);
निषेध, गर्व, गम्भीरता, मौन तथा मान ( प्रणय कोप ) धारण करने तथा
क्षितिज ( दिगन्तर ) के अवलोकन में भी इसी स्थान की योजना
की जाए ॥ १६२-१६५ ॥
संमो१ यत्र स्थितो वामस्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ।
संमुन्नतकटिर्वामस्तव्वहित्थन्तु तद्भवेत् ॥ १६५ ॥
अवहित्थ ( स्थान ) - बांयाँ पैर 'सम', दाहिना पैर तिरछा होकर
एक बाजू में रखा हुआ तथा कमर बायीं ओर उठी हुई रखने पर 'अवहित्थ'
स्थान होता है ॥ १६५ ॥
स्त्रीणां३मेतत्स्मृतं स्थानं संल्लापे तु स्वभावजे ।
निश्चये परितोषे च वितर्के लज्जिते तथा ॥ १६६ ॥
विलास४ लीलाबिव्वोक शृङ्गारात्मै५निरूपणे ।
स्थानमेतत्प्रयोक्तव्यं भर्तृ६मार्गावलोकने ॥ १६७ ॥
इस स्थान की योजना स्त्रियों के स्वाभाविक संताप ( पारस्परिक
संभाषण ), निश्चय, अतिहर्ष, वितर्क (या संयोग), लज्जायुक्त होने, विलास,
लीला, बिब्बोक, शृङ्गार तथा इसी सदृश अन्य रसों के प्रदर्शित करने तथा
प्रियतम की बाट जोहने में की जानी चाहिए ॥ १६६-१६७ ॥
पाँदः समुत्थितश्चैक एकश्चाग्रतलाञ्चितः ।
१. समस्थितो वामपादस्त्र्यश्रतान्तरतोऽपरः—क० ।
२. वामोन्नतं त्रिकं यस्मिन्नवहित्थं तु—क० । क० ग०—पुस्तकयोरवहित्थ-
स्थानस्यापरं लक्षणमपि दृश्यते—
पुरो विचलितस्त्र्यश्रस्तदन्योऽपसृतः समः ।
पादस्तालान्तरन्यस्तस्त्रिकमीषत्समुन्नतम् ॥
पाणिर्लताख्यो यत्रैकस्तदन्यस्तु नितम्बगः ।
अवहित्थं समाख्यातं स्थानमागमभूषणैः ॥
३. स्थानमेतत्त नारीणां—क० ।
४. विवाहलीलालावण्ये—ग० विलासलीलालावण्ये--घ० ।
५. शृङ्गारादिनिरूपणे—ग० । ६. तथा मार्गाव—ग० घ० ।
७. एकः समस्थितः पाद एकस्त्वत्र तलाञ्चितः—क० ।
१६४ नाट्यशास्त्रम्
सूचीविद्धमविद्धं वा तदश्वक्रान्तमुच्यते¹ ॥ १६८ ॥
अश्वक्रान्तस्थान—यदि एक पैर उठा हुआ, दूसरा पैर 'अग्रतल' संचर
(दूसरा पैर उसके पंजे पर रखे हुए) स्थिति में सूची या आविद्धा चारी
में हो अथवा न हो तो (भी) 'अश्वक्रान्त' स्थान होता है ॥ १६८ ॥
शाखावलम्बने कार्ये² स्तबकग्रहणे तथा।
विश्रामेष्वथ³ नीचानां नारीणाञ्चार्थयोगतः⁴ ॥ १६९ ॥
योजना—इस स्थान के द्वारा वृक्ष की टहनी को छूने, गुच्छे को ग्रहण
करने, अधम पात्र के विश्राम लेने तथा स्त्रियों के किसी प्रयोजन को उसके
अर्थानुसार प्रदर्शन किया जाता है ॥ १६९ ॥
स्थानकन्तावदेव स्याद्यावच्चेष्टा प्रवर्तते।
भग्नञ्चै⁵ स्थानकं नृत्ते चारी चेत् समुपस्थिता ॥ १७० ॥
एवं स्थानविधिः कार्यः स्त्रीणां⁶ नृणामथापि च ।
पुनँश्चासां⁷ प्रवक्ष्यामि गतिं⁸ प्रकृतिसंस्थिताम् ॥ १७१ ॥
ये 'स्थान' किसी चेष्टा के प्रारंभ करने के पूर्व तक ही (केवल कुछ
क्षण तक) किसी अभिनेत्री (नर्तकी) द्वारा प्रदर्शित किये जाएँ परन्तु इसी
प्रकार 'नृत्त' में चारी का प्रदर्शन प्रारंभ करने पर 'स्थान' समाप्त कर देना
चाहिए। (अर्थात् चारी के पूर्व ही 'स्थान' का प्रदर्शन किया जाए।)
पुरुष तथा स्त्रियों के लिए 'स्थान' के ये ही नियम हैं। अब मैं स्त्रियों की उन
गतियों को बतलाता हूँ जो उनके स्वभावानुसार होती हैं ॥ १७०-१७१ ॥
युवती स्त्रीगति—
कृत्वावहित्थं स्थानन्तु वामञ्चाधोमुखं भुजम्⁹ ।
१. अस्मात् परं क पुस्तकेऽधिकं पद्यद्वयं लभ्यते । तद्यथा—
स्खलितं घूर्णितं चैव गलिताम्बरधारणम् ।
कुसुमस्तबकादानं परिरक्षणमेव च ॥
वित्रासनं सललितं तरुशाखावलम्बनम् ।
स्थानेऽस्मिन् संविधानीयं स्त्रीणामेतत् प्रयोक्तृभिः ॥ इति ।
२. कार्या—क० ।
३. विश्रान्तिषु तथैव स्यात् पादताडन एव च—क० ।
४. देवानां दाराणाञ्चात्र योगतः—ख०; ग । ५. भग्नेऽवस्थानके—क० ।
६. स्त्रीणां सम्यग् द्विजोत्तमाः—क० । ७. पुनरासां—क० ।
८. गतीस्तु प्रकृतिस्थिताः—क० । ९. करम्—ख०; ग० घ० ।
त्रयोदशोऽध्यायः १६५
नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यञ्च कटकामुखम् ॥ १७२ ॥
ततः सललितं पादं तालं¹मात्रसमुत्थितम् ।
दक्षिणं वामपादस्य बाह्य²पार्श्वे विनिक्षिपेत् ॥ १७३ ॥
तेनैव सम³कालञ्च लताख्यं वामकं भुजम् ।
दक्षिणं विन⁵मेत्पार्श्वं न्यसेन्नाभितटे ततः ॥ १७४ ॥
नितम्बे दक्षिणङ्कृत्वा हस्तञ्चोद्वेष्ट्य वामकम्⁴ ।
ततो वामपदं दद्याल्लता⁶हस्तञ्च दक्षिणम् ॥ १७५ ॥
लीलयोद्वाहितेनाथ शिरसाँ⁷नुगतेन च ।
किञ्चिन्नतेन गात्रेण⁸ गच्छेत्पञ्चपदीं ततः ॥ १७६ ॥
(युवती स्त्री की गति में क्रमशः स्थान एवं कार्यों को इस प्रकार
प्रदर्शित करते हैं), सर्व प्रथम 'अवहत्थ' स्थान को प्रदर्शित कर बांयी
भुजा (बाएँ हाथ) को नीचे की ओर हाथ वाली रखे और दाहिना हाथ
'कटकामुख' मुद्रा में नाभि पर रखे। फिर दाहिने 'ललित-संचर' पाद को
एक ताल के प्रमाण पर उठाए और उसे बायें पैर के बगल में रखे, फिर
बाएं हाथ को उसी समय 'लता' मुद्रा में नाभि पर रखकर दाहिनी कोख
को झुकावे, फिर दाहिने हाथ को नितम्ब पर तथा बाएँ हाथ को 'उद्वेष्टित'
मुद्रा में करे। फिर बाएं पैर को आगे बढ़ाए और दाहिने हाथ को 'लता'
मुद्रा में रखे (इस प्रकार स्थान तथा क्रियाओं के प्रदर्शनोपरान्त) फिर
शरीर को थोड़ा झुका कर तथा मस्तक को 'उद्वाहित' मुद्रा में रखते
हुए पांच कदम चले ॥ १७२–१७६ ॥
यो⁹ विधिः पुरुषाणान्तु रङ्गपीठपरिक्रमे ।
स एव प्रमदानां वै कर्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः ॥ १७७ ॥
रंग मंच पर पुरुष पात्रों के चलने की जो विधि है वही स्त्रियों के लिए
भी समझना चाहिए ॥ १७७ ॥
षट्कलन्तुं¹⁰ न कर्तव्यं तथाष्टकलमेव च ।
१. तालमात्रं समु—क०। २. बाह्ये पार्श्वे—क०।
३. समतालाख्यं—क०। ४. वामपादकम्—क०।
५. च नयेत् पार्श्व—क; विनयेत्—क० (म०)।
६. लतापादञ्च—क०। ७. शिरसोऽनुगतेन च—ख०; ग०।
८. चाङ्गेन—क०। ९. सार्धः श्लोकः ख०ग०पुस्तकर्योर्नास्ति।
१०. षट्कलं तत्तु कर्तव्यं—क०; षट्कलं न प्रयोक्तव्यं—क० (भ)।
१६६ नाट्यशास्त्रम्
पादस्य पातनं तज्ज्ञैः खेदनं११ तद्भवेत् स्त्रियाः ॥ १७८ ॥
स्त्रियों की डग छः या आठ कला के प्रमाण वाली नहीं रखनी चाहिए
क्योंकि ऐसी डग स्त्रियों को थका देती है तथा प्रदर्शन करने में भी बड़ा
आयास करना होता है ॥ १७८ ॥
सयौवनानां नारीणामेवं कार्या गतिर्बुधैः ।
स्थोनीया१ या स्त्रियस्तासां सम्प्रवक्ष्याम्यहं गतिम् ॥ १७९ ॥
युवती स्त्रियों की गति इसी प्रकार की रहनी चाहिए। अब मैं मध्या
( प्रौढ़ा ) स्त्रियों की गति बतलाता हूँ ॥ १७९ ॥
प्रौढ़ास्त्री गति—
कृत्वाऽवहित्थं स्थानन्तु वामं न्यस्य कटीतटे ।
आद्यञ्चारालमुत्तानं कुर्यान्नाभिस्तनान्तरे ॥ १८० ॥
न निषण्णं न च स्तब्धन्न चापि परिवाहितम् ।
कृत्वा गात्रं ततो गच्छेत्तेनैवेहं३ क्रमेण तु ॥ १८१ ॥
ये ‘अवहित्थ’ स्थान को बाएं हाथ को कटि पर तथा दाहिने हाथ
को ‘अराल’ मुद्रा में ऊपर की ओर मुंह करते हुए नाभि तथा स्तनों के
मध्य रखते हुए प्रदर्शित करने के पश्चात् शरीर को ढीला, स्थिर और न
हिलाते डुलाते हुए ( उसी प्रकार ) चलें ॥ १७९-१८१ ॥
दासी ( प्रेष्या ) की गति—
प्रेष्याणामपि कर्तव्या गतिरु४द्भ्रान्तगामिनी ।
किञ्चिदुन्नमितैर्गात्रैराविद्धै५र्भुजविक्रमा ॥ १८२ ॥
स्थानङ्कृ२त्वावहित्थञ्च वामञ्चाधोमुखं भुजम् ।
नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यञ्च खटकामुखम् ॥ १८३ ॥
दासियों की ‘गति’ भ्रान्ति के कारण ऊपर देखते हुए रखी जाए। वे
शरीर को थोड़ा तान कर भुजाओं को घुमाती हुई रहें। ( अर्थात् भुजाओं
को ‘आविद्ध’ दशा में रखें )। ये ‘अवहित्थ स्थान’ को बाएँ हाथ को
नीचे तथा दाहिने हाथ को ‘कटकामुख’ मुद्रा में रखते हुए प्रदर्शित करते
हुए ( उपर्युक्त नियमानुसार ) चलें ॥ १८२-१८३ ॥
११. खेदने—क० ।
१. स्थवीयसीनामेता
त्रयोदशोऽध्यायः १६७
नपुंसक गति—
अर्धनारीगतिः कार्या स्त्रीपुंसाभ्यां विमिश्रिता ।
उदात्तललितैर्गात्रैः १पादैर्लीलासमन्वितैः ॥ १८४ ॥
नपुंसक पात्र की गति में पुरुष तथा स्त्री पात्र की मिश्रित 'गति'
रहनी चाहिए। ये शरीर को उदात्त तथा ललित हलचल में रखते हुए
लालित्यपूर्ण डग भरें ॥ १८४ ॥
यो^२ पूर्वमेवाभिहिता ह्युत्तमानाङ्गतिर्मया^३ ।
स्त्रीणां कापुरुषाणाञ्च त^४तोऽर्धार्धन्तु योजयेत् ॥ १८५ ॥
पहिले मैंने उत्तम पुरुष तथा स्त्री पात्रों की गति में जो समय बतलाया
उसका आधा भाग स्त्रियों (दासी आदि स्त्रियों) तथा उसका भी आधा
भाग नपुंसकपात्र की गति के लिए रखा जाए ॥ १८५ ॥
^५मध्यमोत्तमनीचानां नृणां यद्गतिचेष्टितम् ।
स्त्रीणान्तदेव कर्तव्यं ललितैः ^६पदविक्रमैः ॥ १८६ ॥
उत्तम, मध्यम, तथा अधम पुरुष पात्रों की जो 'गति' बतलाई गई
वही गति (उत्तम, मध्यम तथा अधम) स्त्रीपात्र की भी होती है केवल
स्त्री पात्र के डग 'ललितसंचरपाद' स्थिति में रखे जाते हैं ॥ १८६ ॥
बालगति—
बालानामपि कर्तव्या स्वच्छन्दपदविक्रमा।
न त^७स्यां सौष्ठवं कार्यं न ^८प्रमाणं प्रयोक्तृभिः ॥ १८७ ॥
बालकों की गति उनके इच्छानुसार रखी जाए। इसमें न सौष्ठव और
न समय-प्रमाण (तालानुसारिता आदि) रहता है ॥ १८७ ॥
नपुंसक (अथवा स्त्री-पुरुष-लक्षणधारी पात्र) गति—
तृतीया प्रकृतिः कार्या नाग्ना चैव नपुंसका^९।
नरस्वभावमुत्सृज्य स्त्रीगतिं तत्र योजयेत् ॥ १८८ ॥
१. पदैर्लीला—ख० ।
२. या मयाभिहितापूर्वं—क०; या पूर्वमेव विहिता—घ० ।
३. गतिर्बुधाः—क० ( म० )। ४. तदर्धेन तु—क० ।
५. उत्तमाधममध्यानां—क० । ६. गतिविक्रमा—ख; ग० ।
७. तस्याः—ख; ग० । ८ न प्रमाणं तथाविधम्—क० ।
९. नपुंसके—क० ।
३६८ नाट्यशास्त्रम्
जो नपुंसक पात्र हैं उनमें पुरुष पात्र से विलग कर 'स्त्री' पात्र की
'गति' की योजना करनी चाहिए ॥ १८८ ॥
भूमिका परिवर्तन में पात्रों की गति—
१विपर्ययः प्रयोक्तव्यः पुरुषस्त्रीनपुंसकैः ।
स्वभावमात्मनस्त्यक्त्वा २तद्भावगमनादिह ॥ १८९ ॥
पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक पात्रों ने यदि अपना स्वरूप परिवर्तन कर जिस
वेष को धारण किया हो उसी के अनुरूप तब उन्हें 'गति' का प्रदर्शन
करना चाहिए ॥
३व्याजेन क्रीडया वापि तथा भूयश्च वञ्चनात् ।
स्त्री पुंसः प्रकृतिं कुर्यात् स्त्रीभावं पुरुषोऽपि च ॥ १९० ॥
धैर्यादौदार्येण सत्त्वेन बुद्ध्या तद्वच्च कर्मणा ।
स्त्री पुमांसं त्वभिनयेद् वेषवाक्यविचेष्टितैः ॥ १९१ ॥
पुरुष स्त्री का तथा स्त्री पुरुष का वेष (परिवर्तन) व्याज, क्रीडा तथा
धोखा देने के लिए करें। स्त्री पुरुष का अभिनय करते समय धैर्य, औदार्य,
सत्व, बुद्धि और उपयुक्त वेष, वचन तथा कार्यों का प्रदर्शन करें ॥१९०-१९१॥
स्त्रीवेषभाषितैर्युक्तैः ६प्रेक्षितांप्रेक्षितैस्तथा७।
मृदुसंन्नतगतिश्चैव पुमान् स्त्रीभावमाचरेत् ॥ १९२ ॥
इसी प्रकार पुरुष स्त्री का अभिनय करते समय स्त्री के वेष तथा भाषण,
उसी के अनुसार कभी किसी वस्तु के देखने तथा न देखने की क्रियाओं
द्वारा कोमल तथा मन्द गति का प्रदर्शन करे ॥ १९२ ॥
नीचजाति की स्त्रियों की गति—
जातिहीनाश्च या नार्यः पुलिन्दशबराङ्गनाः ।
याश्चापि तासां कर्तव्या तज्जातिसदृशी गतिः ॥ १९३ ॥
जो नीच कुल में उत्पन्न या पुलिन्द, भील आदि अनार्यजाति की स्त्रियां
हों उनकी अपनी जाति के अनुकूल स्वाभाविक 'गति' रखनी चाहिए ॥
१. विपर्यस्तप्रयोगस्तु पुरुषस्त्रीनपुंसके—क० ।
२. परभावेन योजयेत्—क० ।
३. निजां प्रकृतिमुत्सृज्य क्रीडयावञ्चनेन वा—क० ।
४. सौष्ठवेनाथ सत्वेन—क०; धैर्यादारेण—क० । ५. युक्तं—क० ।
६. प्रेषिताप्रेषितैस्तथा—ख०; ग० । ७. स्मितैः—क० ।
८. मृदु मन्दगति—ख०; ग० ।
त्रयोदशोऽध्यायः १६९
तपस्विनी स्त्री गति—
व्रतस्थानां तपःस्थानां लिङ्गस्थानां तथा¹ पुनः ।
खस्थानाञ्चैव² नारीणां समपादम्प्रयोजयेत् ॥ १९४ ॥
जो स्त्रियां व्रत, तप, दीक्षा लिए हुए संन्यासिनी तथा आकाशगामिनी
दिव्य हों तो उनकी गति में 'समपाद' चारी की योजना की जाए ॥१९४॥
उद्धता येऽङ्गहाराः स्युर्याश्चार्यो मण्डलानि वा ।
तानि नाट्यप्रयोगज्ञैर्न कर्तव्यानि योषिताम्³ ॥ १९५ ॥
जो अङ्गहार, चारी और मण्डल उद्धत प्रकार के हों उनकी स्त्री पात्रों
में चतुर नाट्यनिर्देशक योजना न करे ॥ १९५ ॥
(स्त्री तथा पुरुष पात्रों का) आसन विधान—
अथासन⁴विधिः कार्यः स्त्रीणां नृणामथापि च ।
नानाभावसमायुक्तस्तथैव⁵ शयनाश्रयः ॥ १९६ ॥
पुरुष तथा स्त्रियों के बैठने की विधि (आसन-विधि) उनके विभिन्न
भावों से युक्त एवं प्रसंगानुसार रखना चाहिए और इसी प्रकार इनकी
शयन विधि भी होती है ॥ १९६ ॥
स्वस्थ दशा में उपवेशन-विधि—
विष्कम्भिताञ्चितौ⁷ पादौ त्रिकं⁸ किञ्चित्समुन्नतम् ।
हस्तौ⁹ कट्यूरुविन्यस्तौ स्वस्थे¹⁰ स्यादुपवेशने¹¹ ॥ १९७ ॥
१. तथैव च—ख०; ग० घ० । २. स्वस्थानाञ्चैव—ख०; ग० घ० ।
३. योषिता—ख०; ग० । ४. तथासन—ख० ।
५. स्तथा च—क०, ग० ।
६. अनयोर्मध्ये श्लोकद्वयं क (म०) मातृकायाम् पठ्यते । तद्यथा—
स्वस्थं मन्दालसं क्लान्तं स्रस्तालसमथापि च ।
विष्कम्भितमुत्कटिकं मुक्तजानु तथासनम् ॥
जानुगतं विमुक्तञ्च स्थानकान्युपवेशने ।
लक्षणं पुनरेतेषां विनियोगञ्च वक्ष्यते ॥
७. विष्कम्भेना—ख०; ग० घ० । ८. वक्षः—क० ।
९. हस्ताः कट्यूरुष्विन्यस्ताः—ग० । १०. बाहुशोषाश्रितं शिरः—ख० ।
११ अस्मादनन्तरं—
स्वभावभिनये चैव तथा स्वस्थोपवेशने ।
आविष्कृतेषु सर्वेषु भावेष्वेतत् प्रयोजयेत् ॥ इति अधिकं पद्यम् क० पु० ।
१७० नाट्यशास्त्रम्
स्वस्थ दशा में (विश्रामावस्था में) (स्वस्थे) बैठने पर दोनों पैरों को
वैशाखस्थान में फैलाकर सुन्दरता से रखे, पीठ थोड़ी तनी हुई और दोनों
हाथ ऊपर और पिंडली पर (रखे) रहना चाहिए ॥ १६७ ॥
विचारावस्था में उपवेशन-विधि—
१पादः प्रसारितः किञ्चिदेकश्चैवासनाश्रयः ।
२शिरः पार्श्वानतञ्चैव सचिन्त उपवेशने ॥ १९८ ॥
यदि कोई पुरुष गहरे विचार में बैठा हो तो उसे (स्वस्थ दशा के
स्वरूप में) अपना एक पैर कुछ फैला कर रखना तथा दूसरा पैर किसी
आसन पर टिकाते हुए मस्तक को एक ओर झुका हुआ रखना चाहिए ॥
शोकावस्था में उपवेशन-विधि—
चिबुकोपाश्रितौ३ हस्तौ बाहुशीर्षानतं शिरः ।
सम्प्रणष्टेन्द्रियमना ४भवेच्छोकोपवेशने ॥ १९९ ॥
यदि पुरुष गहरे शोक में हो तो (स्वस्थ दशा के स्वरूप में) अपनी
ठुड्डी को दोनों हाथों पर रखे या उसका मस्तक दोनों भुजाओं के सहारे
टिका रहे तथा मन और इन्द्रियां अपनी दशा को खोये से रहें ॥ १९९ ॥
मूर्च्छा आदि में उपवेशन—
प्रसार्य बाहू शिथिलौ तथा ५चौपाश्रयाश्रितः ।
७मूर्च्छामदभ्रमग्लानिविषादेषूपवेशयेत्६ ॥ २०० ॥
१. एकः प्रसारितः किञ्चित्पादोऽन्यस्त्वासनाश्रितः—क० ।
२. शिरः पार्श्वगतञ्चैव स्थानं मन्दालसं तु तत् ।
चिन्तायाञ्च तदौत्सुक्ये निर्वेदे विरहे तथा ।
विवादादिषु चाधेयं स्थानमेतत् प्रयोक्तृभिः ॥
इति सार्धश्लोकमधिकम् क० पुस्तके ।
३. चिबुकोपाश्रयौ हस्तौ बाहुशीर्षाश्रयं शिरः ।
सम्प्रनष्टेन्द्रियमना विज्ञेयं क्लान्तमासनम् ॥
बलेन निगृहीतस्य रिपुणा खण्डितस्य च ।
शोकग्लानस्य चौत्सुक्ये स्थानमेतद्विनिर्दिशेत् ॥ इति क० पुस्तके पाठः ।
४. शोकोत्सुक्योपवेशने—ग० घ० ।
५. चोपाश्रयाश्रितः—ख०, ग० घ० ।
६. श्रमग्लानिविषादेषु मदे चोपविशेद् बुधः—क० ।
७. क० (भ०) पुस्तके एतस्य स्थाने—
त्रयोदशोऽध्यायः १७१
यदि पुरुष मूर्च्छा, मद, श्रम, ग्लानि तथा विषाद की दशा में हो तो
दोनों भुजाओं को फैलाकर ढीली छोड़ दे और किसी वस्तु के सहारे
टिककर बैठे ॥ २०० ॥
लज्जा-रोग-निद्रा आदि में उपवेशन—
सर्वपिण्डीकृताङ्गस्तु संयुक्तैः पादजानुभिः ।
व्याधिब्रीडितनिद्रासु ध्याने चोपविशेन्नरः² ॥ २०२ ॥
यदि कोई ( पुरुष ) पात्र व्याधि, लज्जा, निद्रा तथा ध्यान में हो तो
उसे पैर और घुटनों के बीच अपने शरीर को सिकुड़ा कर रखना
चाहिए ॥ २०१ ॥
धार्मिक-विधि सम्पादन में उपवेशन—
तथो³त्कटिकं स्थानं स्फिक्पाष्णीनां समागमः ।
पित्र्ये⁴ निवापे जप्ये च सन्ध्यास्वाचमनेऽपि च ॥ २०२ ॥
पितरों का तर्पण करने, मन्त्र जपने, सन्ध्या करने तथा आचमन करने
में कूबड़ तनी हुई ( उत्कटिकं ) तथा दोनों पैरों के गट्टों ( स्फिक् ) और
पंजों को मिलाकर बैठना चाहिए ॥ २०२ ॥
स्रस्तौ हस्तौ विमुक्तौ च शरीरमलसं तथा ।
खेदालसं तथा चक्षुर्यत्र स्रस्तालसं तु तत् ॥
श्रमग्लानौ मदे चैव मूर्च्छायां व्याधितेषु च ।
मोहे प्राणभये चैव विषादे चैव तद्भवेत् ॥ इति वर्तते ।
१. सम्पाते—ख० । २. एतस्य स्थाने क ( म० ) पुस्तके तु—
विष्कम्भादञ्चितौ पादौ ऊरू विष्कम्भितौ भुजौ ।
निमीलितं तथा चक्षुः स्थाने विष्कम्भनामनि ॥
स्ववक्षोगतया दृष्ट्या योगध्याने विधीयते ।
स्वभावसंस्थया चैव नटानामुपवेशने ॥
३. तथा चोत्कटकं स्थानं—ख०; तथा चोत्कटिकास्थानस्फिक्पार्ष्णीनां
समागमः—ग० । एतस्य स्थाने क ( म० ) पुस्तके च—
समौ पादौ समाधाय समं यदुपविश्यते ।
अस्पृष्टभूतलञ्चैव ज्ञेयमुत्कटिकासनम् ॥
पित्र्ये समाधिजप्ये च होमादिकरणेषु च ।
एतत्स्थानं विधातव्यं तथाचमनकर्मणि ॥ इति वर्तते ।
४. पित्र्ये निवापसलिले—ख० ।
१७२ नाट्यशास्त्रम्
प्रियाप्रसादन में उपवेशन—
विष्कम्भितम्पुनश्चैव जानु भूमौ निपातयेत् ।
प्रियाप्रसादने कार्यं होमादिकरणेषु च ।
महीगताभ्यां जानुभ्यामधोमुखमवस्थितम् ॥ २०३ ॥
मान ले कर बैठी हुई प्रियतमा को रिझाने तथा होम आदि धार्मिक
विधि सम्पन्न करने की दशा में (सामान्य अवस्था में) पुरुष अपने फैले हुए
घुटनों को पृथ्वी पर रखे और नीचा मुंह किये हुए बैठे ॥ २०३ ॥
देव वंदना आदि दशा में उपवेशन—
देवाभिवन्दने कार्यं रुषितानां प्रसादने ।
शोके चाक्रन्दने तीव्रे मृतानाञ्चैव दर्शने ॥ २०४ ॥
त्रासने च कुसत्त्वानां नीचानाञ्चैव याचने ।
होमंमज्ञक्रियायाञ्च प्रेष्याणाञ्चैव कारयेत् ॥ २०५ ॥
मुनीनां नियमेष्वेवं भवेदासनजो विधिः ।
देवगण की वन्दना, क्रुद्ध स्वामी को प्रसन्न करने, तीव्र शोक में क्रन्दन
करने, मृत पुरुष को देखने, (छोटे मनुष्यों को) सताने वाले पशुओं को
डराने, नीच पुरुष या सेवकों से याचना करने तथा होम या यज्ञ क्रिया
में दर्शनार्थ उपस्थित होने की दशा में भी पूर्ववत् नीचा मुंह और दोनों
१. एतस्य स्थाने क० (म०) पुस्तके तु—
एकं जानु यदास्यैव महीपृष्ठे निधीयते ।
मुक्तजानुकमेतद्धि विज्ञेयं ह्यासनं बुधैः ॥
एतत्कृतव्यलीकानां प्रियाणां सम्प्रसादने ।
मार्जने कुट्टिमानाञ्च तथा भूम्यनुलेपने ॥ इति वर्तते ।
२. एतस्य स्थाने क० (म०) पुस्तके च—महीगताभ्यां जानुभ्यां स्थानं
जानुगतं भवेत्—इति पाठः ।
३. देवाभिगमने चैव—क०, ख० । ४. रुष्टानाञ्च—क (म)।
५. तीव्रं मृतानां—ख०; तीव्रम्मृतानां—ग० । ६. सन्त्रासने—क० ।
७ एतस्य स्थाने क (म) पुस्तके तु ।
भूमौ यदूर्ध्वंपतनं तद्विमुक्तमिति स्मृतम् ।
प्रहारे तत्प्रयोक्तव्यमावेगे क्रन्दिते तथा ॥ इति ।
८. नियमेष्वेष—ख०; ग० ।
त्रयोदशोऽध्यायः १७३
घुटनों को पृथ्वी पर टिका कर बैठना चाहिए। मुनिजन के दैनिक आचरण
तथा नियम आदि में भी बैठने की यही विधि रखें ॥ २०४-२०६ ॥
विभिन्न पात्रों के लिये निर्धारित आसन—
तथासनविधिः कार्यों विविधो¹ नाटकाश्रयः ॥ २०६ ॥
स्त्रीणाञ्च पुरुषाणाञ्च बोह्यश्चाभ्यन्तरस्तथा।
आभ्यन्तरस्तु नृपतेर्बाह्यो बाह्यगतस्य च ॥ २०७ ॥
नाटक में स्त्री तथा पुरुष पात्रों के लिए निर्धारित आसन विधान को
सुनिये। यह दो प्रकार का होता है—(१) आभ्यन्तर (स्वतन्त्र आसन)
तथा (२) बाह्य (सामान्यजन के हेतु) आसन-विधान। इन दोनों
आसनों में आभ्यन्तर आसन राजा से तथा बाह्य आसन सामान्यजन से
सम्बद्ध होते हैं ॥ २०६-२०७ ॥
पुरुष पात्रों के लिए निर्धारित आसन—
देवानां नृपतीनाञ्च दद्यात्³ सिंहासनं द्विजाः⁴।
पुरोधसाममात्यानां भवेद्वेत्रासनन्तथा ॥ २०८ ॥
मुण्डासनन्तु दातव्यं⁵ सेनानीयुवराजयोः।
काष्ठासनं ब्राह्मणानां कुमाराणां कुथासनम् ॥ २०९ ॥
एवं राजसभां प्राप्य कार्यस्त्ववासनजो विधिः⁶।
हे मुनियो, नाट्य प्रदर्शन में देवता तथा राजा के लिए सिंहासन,
पुरोहित तथा अमात्यों (मन्त्रियों) के लिए वेत्रासन, सेनापति तथा
युवराज के लिए मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिए काष्ठासन (चौकोर पाटला)
तथा राजकुमारों के लिए कुथासन (गलीचे सा आसन) की व्यवस्था
रहनी चाहिए। राजसभा में इन्हीं आसनों का यथायोग्य व्यक्तियों को
देने का नियम रखना चाहिए ॥ २०८ ॥
१. विविधन्नाटकाश्रयः—क०। २. बाह्योऽथाभ्यन्तरस्तथा—क०।
३. योज्यं—क०। ४. तथा—क०।
५. कर्त्तव्यं—क०। ६. अस्मादनन्तरं क० पुस्तके तु—
प्रकृतीनान्तु सर्वासां तथा ज्ञानसमुत्थितम्।
पुरुषाणां भवेदेष विधिरासनसंश्रयः॥ इति अधिकम्।
१७४ नाट्यशास्त्रम्
स्त्री पात्र के लिये आसन—
स्त्रीणाञ्चैवासनविधिं सम्प्रवक्ष्याम्यहं१पुनः ॥ २१० ॥
सिंहासनं२तु राज्ञीनां देवीनां मुण्डमासनम् ।
पुरोधोऽमात्यपत्नीनां देयं३ह्येत्रासनन्तथा ॥ २११ ॥
भोगिनीनां तथा चैव वस्त्रं चर्म कुथापि वा ।
ब्राह्मणीतापसीनाञ्च पट्टासनमथापि च ॥ २१२ ॥
वेश्या६नामपि कर्त्तव्यमासनं हि मसूरकम् ।
शेषाणां प्रमदानाञ्च भवेद् भूम्यासनं द्विजाः ॥ २१३ ॥
एवमाभ्यन्तरो ज्ञेयो बाह्यश्वासनजो विधिः ।
तथा स्वगृहवार्तासु च्छन्देनासनमिष्यते ॥ २१४ ॥
अब मैं स्त्री पात्रों के लिए दिये जाने वाले आसन नियम बतलाता
हूँ । पट्टरानी को सिंहासन, रानियों को मुण्डासन, पुरोहित और मन्त्रियों
की पत्नियों को वेत्रासन, भोगिनी ( राजा द्वारा विवाहित या रक्षित
[L15
त्रयोदशोऽध्यायः १७५
मुनिजन के अपने नियमानुकूल आसन रहते हैं तथा विभिन्न
मतावलम्बी संन्यासी पात्रों के उनके व्रतानुसार आसन रहते हैं ॥ २१५ ॥
वृसीमुण्डासनप्रायं वेत्रासनमथापि वा ।
होमे यज्ञक्रियायाञ्च पित्र्यर्थे च प्रयोजयेत् ॥ २१६ ॥
जब होम, यज्ञ, तथा पितृतर्पण करना हो तो उस समय वृसी,
मुण्डासन या वेत्रासन पर बैठना चाहिए ॥ २१६ ॥
आसन का सामान्य विधान—
स्थानीया ये च पुरुषाः कुलविद्यासमन्विताः ।
तेषामासनसत्कारः कर्तव्यं इह पार्थिवैः ॥ २१७ ॥
समे समासनं दद्यान्मध्यमे मध्यमासनम् ।
अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च हीने भूम्यासर्न भवेत् ॥ २१८ ॥
उपाध्यायस्य नृपतेर्गुरुणोश्चाग्रतो बुधैः ।
भूम्यासनन्तथा कार्यमथवा काष्ठासनम् ॥ २१९ ॥
नौ-नाग-रथैयानेषु भूमिकाष्ठासनेषु च ।
सहासनं न दुष्येत गुरुपाध्यायपार्थिवैः ॥ २२० ॥
जो स्थानीय पुरुष अवस्था में बड़े, कुलीन तथा विद्वान हों उनका
राजा उचित आसन देते हुए सत्कार करे ।
इनमें भी जो समान स्थिति के हों उन्हें बराबरी का, मध्यम पात्रों को
मध्यम, श्रेष्ठ जन को ( अपने ) से ऊंचा तथा हीन पात्रों का पृथ्वी पर
( नीचा ) आसन रखना चाहिए ।
बुद्धिमान पुरुष अपने उपाध्याय, राजा तथा गुरुजन के सम्मुख पृथ्वी
पर या काष्ठासन पर ही बैठे । ( परन्तु )
नौका, हाथी, रथ तथा यान में अपने गुरु, उपाध्याय तथा राजा के
साथ-साथ बैठने पर भी आसन दोष नहीं रहता ॥ २१६-२२० ॥
शयनावस्था में शरीर की स्थिति—
आकुञ्चितं समञ्चैव प्रसारितविवर्तने ।
उद्वाहितं नर्तञ्चैव शयने कर्म कीर्त्यते ॥ २२१ ॥
१. कर्तव्यो गुरुपार्थिवैः—क० ।
२. मध्ये मध्यं तथासनम्—क० । ३. गुरुणामग्रतो बुधैः—ग० ।
४. भूम्यासर्न सदा कार्यमथवा—ख० । ५ रथभूमीषु—क० ।
६. नतं षोढा शय्यास्थानानि निर्दिशेत्—क० ।
१७६ नाट्यशास्त्रम्
शयनावस्था में होने वाली छः स्थितियाँ हैं—(१) आकुंचित, (२)
सम, (३) प्रसारित, (४) विवर्तित, (५) उद्वाहित तथा (६) नत ॥
आकुंचित—
सर्वैराकुञ्चितैरङ्गैः शय्याविद्धे तु जानुनी।
स्थानमाकुञ्चितं नाम शीतोर्तानां¹ प्रयोजयेत् ॥ २२२ ॥
दोनों घुटनों को बिछोने में रखकर सारे शरीर को झुकाकर सिकुड़ाते
हुए सोना 'आकुंचित' दशा कहलाती है। इसकी योजना ठण्ड से
ठिठुरते पात्र में की जाती है ॥ २२२ ॥
सम—
उत्तानितमुखञ्चैव प्रत्यङ्मुक्तकरन्तथा।
समं नाम प्रसु²प्तस्य स्थानकं संविधीयते ॥ २२३ ॥
मुंह ऊपर की ओर, हाथ खाली ढीले और नीचे की ओर फैले हुए
रखकर सोने को 'सम' स्थान जानो। इसकी सोये हुए पुरुष में योजना
की जाए ॥ २२३ ॥
प्रसारित—
एकं भुजमुपाधाय सम्प्रसारित-जानुकम्।
स्थानं प्रसारितं नाम सुखं³सुप्तस्य कारयेत् ॥ २२४ ॥
एक बाँह को सिरहाना बनाकर जंघाओं को फैलाते हुए सोना
'प्रसारित' स्थान होता है। इसकी आनन्दपूर्वक या निश्चिन्तता से सोने की
अवस्था बतलाने में योजना करनी चाहिए ॥ २२४ ॥
विवर्तित—
अधोमुखस्थितश्चैव विवर्ति⁴तमिति स्मृतम्।
शस्त्रक्षतमृतोत्क्षिप्तमत्तोन्मत्तेषु कारयेत् ॥ २२५ ॥
नीचा मुंह कर सोना 'विवर्तित' कहलाता है। शस्त्रों के घाव लग जाने,
मरण, ऊपर से या ऊंचे स्थान से गिर जाने, (उत्क्षिप्त), नशे के कारण मस्त
हो जाने तथा पागल होने की दशा में इसकी योजना की जाती है ॥ २२५ ॥
१. शीतानान्तु—ख०; ग०। २. तु सुप्तस्य—ख०; ग०।
३. खलु सुप्तस्य—ख०; ग०।
४. विवर्तनम्—क०; विकर्तनम्—ख०; ग०।
त्रयोदशोऽध्यायः १७७
उद्वाहित—
अंसोपरि शिरः कृत्वा कूर्परक्षोभमेव च ।
उद्वाहितन्तु विज्ञेयं लीलायां वचने प्रभोः ॥ २२६ ॥
यदि सिर को कन्धे पर या कलाई को दबाते हुए शयन किया जाए
(कूर्परक्षोभ) तो 'उद्वाहित' स्थान जानो । इसकी क्रीडा तथा (अपने)
स्वामी के साथ संभाषण (बैठने, प्रवेश) करने की दशा में योजना
की जाए ॥ २२६ ॥
नत—
ईषत्प्रसारिते जङ्घे यत्र स्रस्तौ करावुभौ ।
आलस्यश्रमखेदेषु नतं स्थानं विधीयते ॥ २२७ ॥
यदि जंघाएं थोड़ी फैली हुई हों (तथा) दोनों हाथ ढीले रखकर
सोया जाने पर 'नत' स्थान कहलाता है । इसकी योजना आलस्य, श्रम
तथा थकावट क 'दशा प्रदर्शन में की जाए ॥ २२७ ॥
गतिप्रचारस्तु मयोदितोऽयं
नोक्तश्च यः सोऽर्थवशेन साध्यः ।
अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य
वक्ष्यामि कक्ष्यान्तरसंविधानम् ॥ २२८ ॥
हे मुनियो, इस प्रकार मैंने आपको गतिप्रचार के ये स्वरूप तथा लक्षण
बतलाये । इसमें जो बातें बतलाई न जा सकी हों उन्हें आप लोक-
व्यवहार में प्रयुक्त अर्थों के आधार पर स्वयं साध लें। अब मैं रंगमंच
(पर) की (जाने वाली) कक्ष्याओं की तथा उनमें संचार करने की
विधियों को (अगले अध्याय में) कहूँगा ॥ २२८ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे गतिप्रचारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः
भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का 'गतिप्रचार' नामक त्रयोदश अध्याय सम्पूर्ण
—-❖—-
१. हस्तोपरि—क० । २. लीलयाविशने—क० । ३. सृष्टौ—क० ।
४. अस्मात् परं क—पुस्तके 'रङ्गे विकृष्टे' इत्यादि (ना० शा० १३।२०)
पद्यं 'वयोनुरूपः प्रथमस्तु वेषः' (१४।६८) इत्यादि पद्यञ्च समुपलभ्यते ।
५. नोक्तस्तु—क० । ६. रङ्गविधिक्रमस्य—ख०; ग० ।
७. कक्ष्यां प्रविभागयुक्ताम्—ग०, घ० ।
८. द्वादशोऽध्यायः—क, क (भ०), ख० ।
१२ ना० शा० द्वि०
९०१ नाट्यशास्त्रम्
चतुर्दशोऽध्याय
( कक्ष्यापरिधि तथा लोकधर्मि-निरूपणाध्याय )
ये तु पूर्वं मया प्रोक्तास्त्रयो वै नाट्यमण्डपाः ।
तेषां विभागं विज्ञाय ततः कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ १ ॥
नाट्यगृह के तीन प्रकारों को समझते हुए जिनका कि पहिले वर्णन
किया जा चुका है अतः उनके विभेदों को जानकर रंग-मंच की कक्ष्याओं का
विभाग नियत किया जाए १ ॥ १ ॥
वाद्यों की स्थापना
३ये नेपथ्यगृहद्वारे मया पूर्वं प्रकीर्तिते४।
तयोर्भाण्डस्य विन्यासो मध्ये कार्यः प्रयोक्तृभिः ॥ २ ॥
नेपथ्य गृह के जिन दो द्वारों को पहिले बतलाया जा चुका है उनके
मध्यवर्ती प्रदेश में ( बीच में ) भाण्ड वाद्य वादकों को बिठाया जाए ॥२॥
१. पूर्व अध्याय में गति के प्रचारादि में उपयोगी स्थानों का विभागपूर्वक
उल्लेख नहीं किया गया । इन स्थानों का रंगमंच पर विभाजित रूप से निर्देश
आवश्यक होने के कारण पिछले अध्याय से इस अध्याय की संगति स्थापित
होती है ।
यद्यपि उद्देशक्रम में 'कक्ष्या' का स्थान अन्तिम है तथापि बिना कक्ष्या के
अभिनयादि उपपन्न नहीं हो सकते इसलिये यहां भरतमुनि ने उसे विषयप्र-
तिपादन की आवश्यकता को दृष्टि में रखकर ही उचित स्थान दे दिया है। यहाँ
क्रम का उल्लंघन भी इसी कारण हो गया है तथा इसके यहाँ प्रतिपादन करने
का विशेष कारण यह भी है कि गन्तव्य प्रदेश का आश्रय लेने के कारण गतियों
का एवं जल, स्थल आदि अनेक सम या विषम प्रदेशों का आश्रय रखने के
कारण देशों का रंगमंच के प्रयोग स्थान पर कक्ष्या के बिना प्रदर्शन सम्भव नहीं
हो सकता था । अतएव इस कारण भी कक्ष्याओं का निरूपण अब आगे नहीं
बढ़ाया जा सकता था ।
१. अथ त्रयोदशोऽध्यायः—क०, ख० । २. कक्षां—ख० ।
३. नेपथ्यरङ्गभूमौ तु यौ विभागौ प्रकीर्तितौ—क० ।
४. प्रकीर्तिताः—क० । ५. तेषां—क० ।
चतुर्दशोऽध्यायः १७९
कक्ष्या-गत विभाग—
कक्ष्या¹विभागो निर्देश्यो रङ्गपीठपरिक्रमात् ।
परिक्रमेणं² रङ्गस्य ह्यान्या कक्ष्या भवेदिह³ ॥ ३ ॥
रंगमंच की परिधि के भाग में चलने से उसके विभाग सूचित (या
प्रतीत ) हो जाते हैं । जब किसी पात्र को अपनी कक्ष्या परिधि परिवर्तित
करना हो वह उसे परिक्रमण-या अन्य कक्ष्या में चलने-के द्वारा प्रदर्शित
करे³ ॥ ३ ॥
कक्ष्या विभाग की उपयोगिता—
कक्ष्याविभागे ज्ञेयानि गृहाणि नगराणि च ।
उद्या⁴नारामसरितस्त्वाश्रमा अटवी तथा ॥ ४ ॥
पृथिवी⁵ सागराश्चैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
वर्षाणि⁶ सप्त द्वीपाश्च पर्वता विविधास्तथा ॥ ५ ॥
आलोकश्चैव लोकश्च रसातलमथापि च ।
दैत्या⁷नागालयाश्चैव गृहाणि भव⁸नानि च ॥ ६ ॥
इस कक्ष्या विभाग की परिधि में (जो पात्र के किसी विभाग विशेष
पर स्थित होने से जानी जाती हो तथा जिस दृश्य का निरूपण करना
इष्ट हो) गृह, नगर, उद्यान, आदि से युक्त प्रदेश, ग्राम तथा नगर, नदी,
आश्रम, वन, पृथ्वी, समुद्र, जड़, चेतन पदार्थ समन्वित त्रैलोक्य, पृथ्वी के
किसी भी वर्ष, द्वीप, विविध पर्वत, लोकालोक पर्वत, पाताल, दैत्य तथा
सर्पों के निवासस्थान, आराम गृह तथा नगर आ जाते हैं ॥ ४–६ ॥
१. इस विवरण से प्रतीत होता है कि केवल रंगमंच पर विभिन्न स्थानों के
द्वारा ही दृश्य और प्रदेश बतलाये जाते थे और दृश्य-परिवर्तन की अधिक
आवश्यकता होने पर अन्य अंक के द्वारा यह भी हो सकता था । दृश्यों के
परिवर्तनार्थ पटपरिवर्तन जैसे किसी विधान का कम ही उपयोग होता था ।
१. कक्ष्याविभागौ निर्देश्यौ रङ्गपीठपरिक्रमैः—क० ।
२. परिक्रमे च—क० । ३. विधीयते—ग०, घ० ।
४. उद्यानारामसहितो देशो ग्रामोटवीं तथा—ख०, ग० ।
५. ससागरा च पृथिवी तथा त्रैलोक्यमेव च—क० ।
६. द्वीपा सप्ताथ वर्षाणि—क० ।
७. दैत्यानामालयश्चैव—ख०, ग० । ८. च वनानि च—घ० ।
१८० नाट्यशास्त्रम्
¹नगरे वा वने वापि वर्षे वा पर्वतेऽपि वा ।
यत्र वार्ता² प्रवर्तेत³ तत्र कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥
ये परिधियां नाटक की कथावस्तु के विषयानुसार मंच पर (वहीं)
स्थापित की जायें जहाँ प्रस्तुत किये जाने वाले कथानक के नगर, वन, वर्ष
या पर्वत के दृश्य (रखे गये) हों ॥ ७ ॥
रंगमंच पर सम्बन्धित प्रदेश की सूचनाएँ—
बाह्यं⁴ वा मध्यमं वापि तथैवाभ्यन्तरं पुनः ।
दूरं वा सन्निकृष्टं वा देशन्तु⁵ परिकल्पयेत्⁶ ॥ ८ ॥
रंगमंच पर ये कक्ष्या विभाग अन्दर, बाहर, मध्य, दूर तथा समीप के
प्रदेश से (कथावस्तु के अनुसार परस्पर) सम्बद्ध रहें ॥ ८ ॥
पूर्वं प्रविष्टा ये रङ्गं ज्ञेयास्ते⁸ऽभ्यन्तरा बुधैः⁷ ।
पश्चात्प्रविष्टा विज्ञेया कक्ष्या-भागे तु बाह्यतः ॥ ९ ॥
इन कक्ष्या विभागों की रूढ़ि (प्रथा) के अनुसार जो रंगमंच पर
पहिले प्रविष्ट हो चुके हों वे अभ्यन्तर पात्र (गृह या प्रासाद आदि में स्थित)
तथा बाद में मंच पर प्रविष्ट होने वाले बाह्य पात्र कहलाते हैं ॥ ९ ॥
तेषान्तु दर्शनेच्छुर्यः⁹ प्रविशेदङ्गमण्डलम् ।
दक्षिणाभिमुखः¹⁰ सोऽथ कुर्यादात्मनिवेदनम् ॥ १० ॥
और जो पात्र इन (पूर्व प्रविष्ट) पात्रों को देखने या मिलने के लिए
मंच पर आए वह अपनी बात दाहिनी (दक्षिण दिशा की) ओर मुंह
करते हुए कहे ॥ १० ॥
रंगमंच की पूर्व-दिशा—
¹¹यतो मुखं भवेद्भाण्डद्वारं नेपथ्यकस्य¹² च ।
सा¹³ मन्तव्या तु दिक्पूर्वा नाट्ययोगेन¹⁴ नित्यशः ॥ ११ ॥
१. तथा सप्तसमुद्राश्च वर्षा वै पर्वतास्तथा—ख०, ग०।
२. वार्ताः प्रवर्त्तन्ते—क०। ३. प्रवर्तयेत्—ख०, ग०।
४. बाह्याच्च—क०। ५. देशात्तु—ग०।
६. समुपपादयेत्, समुपलक्षयेत्—क०।
७. भ्यन्तरे बुधैः, तेऽभ्यन्तरस्थिताः—क०। ८. ज्ञेयाश्च—क०।
९. दर्शनस्पर्शै—क०; दर्शनेच्छुः सन्—ख०।
१०. मुखः सो वै—क०; मुखं सोऽथ—ग०।
११. पद्यमेतत् ग-पुस्तके नास्ति। १२. नेपथ्यमेव च—क०।
१३. पूर्वादिदिक्षु विज्ञेयं प्रयोगे नाट्यसंश्रये—क०। १४. योगेषु—क०।
चतुर्दशोऽध्यायः १८१
जिस ओर भाण्ड-वाद्य तथा नेपथ्य-द्वारों का मुँह रहे उसे नाटक
प्रदर्शन के नियमानुसार पूर्व-दिशा समझी जाए ॥ ११ ॥
रंगमंच पर प्रवेश-निर्गम-विधान—
निष्क्रामेद्यै¹श्च तस्माद्वै स तेनैव तथा व्रजेत् ।
यत²स्तस्य कृतं तेन पुरुषेण निवेशनम् ॥ १२ ॥
जो व्यक्ति जिस स्थान से (जिस भवन आदि से) निष्क्रमण करे या
जो अपना कार्य पूर्ण कर चुका हो—तो वह पूर्ववत् उसी मार्ग से चला
जाए जिसका प्रवेश के समय उसने आने में उपयोग किया था ॥ १२ ॥
निष्क्रान्तोऽर्थवशाच्चा³पि प्रविशेद्यदि⁴ तद्गृहम् ।
यतः प्राप्तः⁵ स पुरुषस्तेन मार्गेण निष्क्रमेत् ॥ १३ ॥
किसी कार्यवश बाहर निकल जाने पर यदि वही पात्र पुनः वहीं (गृह
या स्थान पर) आवे तो उसी मार्ग या द्वार से प्रवेश करे जिससे वह
निकलकर (बाहर) गया था।
अर्थवार्थवशाच्चापि⁶ तेनैव सह गच्छति ।
तथैव⁷ प्रविशेद्गेहमेकाकी सहितोऽपि वा ॥ १४ ॥
तयोश्चापि⁸ प्रविशतोः कक्षामन्यां⁹ विनिर्दिशेत् ।
परिक्रमेण रङ्गस्य त्वन्या कक्ष्या विधीयते ॥ १५ ॥
या किसी कार्यवश (जिसे कहा हो) यदि वह उसी पात्र के साथ गृह
(आदि) में (पुनः) प्रवेश करे तो उस पात्र के साथ या अकेले—जैसा भी
आवश्यक हो—वह उसी तरह प्रवेश करे। इस प्रकार दोनों पात्रों के प्रवेश
के समय अन्य कक्ष्या की सूचना दी जाए। रंगमंच पर एक या अनेक बार
(जैसा भी आवश्यकतानुसार हो) परिक्रमा करने से दूसरी कक्ष्या सूचित हो
जाती है ॥ १४-१५ ॥
१. निष्क्रामेच्चापि यस्तत्र नरः कार्येण केनचित् । स निष्क्रमेत्तु तेनैव कृतं येन
निवेशनम्—ख०, ग० । २. यतस्तस्य कृते—क० ।
३. वशाद्वापि—क० । ४. न विशेद्यदि—क० ।
५. प्राप्तः सः पुरुषो येन स तेनैव पथा व्रजेत्—क० ।
६. यदप्यर्थवशाच्चैव—क० । ७. तेनैव प्रविशेद्गेह—क० ।
८. तयोश्चैव—क० । ९. काष्ठामन्यां—ख०, ग० ।