सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

१४२ नाट्यशास्त्रम्
लिए) रखना, शरीर को झुका लेना, दाँत और ओठों का फड़काना, ठुड्डी का
धुजाना धीरे-धीरे कार्य करना आदि प्रदर्शित करना चाहिये । इस शीता-
भिनय की दशा में गति अत्यन्त धीमी (स्थित लय में) रखना चाहिए ॥
भयानक-रस गति—
तथा भयानके चैव गतिः कार्या विचक्षणैः ॥ ७० ॥
स्त्रीणां कापुरुषाणाञ्च ये चान्ये सत्ववर्जिताः ।
विस्फारिते चले नेत्रे विधुतञ्च शिरस्तथा ॥ ७१ ॥
भयसंयुक्तया दृष्ट्या पार्श्वयोश्च ³विलोकितैः ।
द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव बद्ध्वा हस्तं कपोतकम् ॥ ७२ ॥
प्रवेपितशरीरश्च शुष्कोष्ठः स्खलितं व्रजेत् ।
एषानुसरणे कार्या तर्जने त्रासने तथा ॥ ७३ ॥
सत्त्वञ्च विकृतं दृष्ट्वा श्रुत्वा च विकृतं रवम् ।
एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या ¹⁰नृणामाक्षिप्तविक्रमा ॥ ७४ ॥
क्वचिदासन्नपतितैर्विकृष्टपतितैः क्वचित् ।
एलकाक्रीडितैः पादैरुपर्युपरि पतितैः ॥ ७५ ॥
एषामेवानुगैर्हस्तैर्गति¹¹ भीतेषु योजयेत् ।
भयानकरस में स्त्री तथा ( उन ) अधम पात्रों की—जो डरपोक या
कमजोर (सत्वहीन) हों—प्रकृति के अनुसार सहज गति रखनी चाहिए ।
भयानक रस की दशा में इनके नेत्र खुले तथा धूजते हुए, मस्तक 'विधुत'
(ना० शा० ८।२२) मुद्रा में तथा भययुक्त दृष्टि में क्रमशः बगलों को देखना
प्रदर्शित करना चाहिए । इसमें गति द्रुत तथा 'चूर्णपद' लक्षण की, हाथों
को 'कपोत' मुद्रा में, शरीर को कम्पित तथा ओठों को सूखते हुए रखे
यह 'धैर्यविभासित' गति है जो भयानक रस में संयोजित की जाती है ।
१. विस्फारितचलन्नेत्रो विधून्वन् स्वशिरस्तथा—क० ।
२ भयाकुलितचित्तत्वात् पार्श्वानि च विलोकयन्—क० ।
३.-विलोकनैः—ग० । ४. पूर्णपदैश्चैव—ख० ।
५. कृत्वा—क० । ६. प्रलेपितशरीरस्तु शुष्कोष्ठश्च स्खलन् व्रजेत्—क० ।
७. एषानुकरणे—ख०, ग० । ८. कलहे—क० ।
९. विकृतं स्वरम्—क०, विकृतस्वरम्—ग० ।
१०. नृणाञ्च क्षिप्तविक्रमा—क०, नृणाञ्चावक्षिप्त—ख०, ग० ।
११. गतिर्भीतेषु—क० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४३
यही गति शत्रु द्वारा पीछा करने, डराने या दुःख देने की स्थिति में
भी प्रदर्शित करना चाहिए। किसी भयंकर प्राणी को देखने या किसी
भयानक आवाज को सुनने की स्थिति में भी इसी गति की योजना
की जाए। तथा डरपोक पुरुष-स्त्री पात्रों में भी इसी गति की संयोजना की
जाए (पर पुरुष पात्र में थोड़ी धैर्य या पराक्रम प्रदर्शन (आक्षत विक्रमा)
की वृत्ति का संमिश्रण रखते हुए उक्त गति रहे।) भयभीत पुरुष की गति
में 'एलकाक्रीडित' चारी (ना० शा० ११।२०) में पैरों को शीघ्रता
से ऊपर रखते हुए या कभी वहीं टिकाकर या एक-दूसरे से बहुत दूर
रखकर तथा हाथों को पैरों की गति के अनुसार रखते हुए रहना
चाहिए ॥ ७०-७६ ॥१
(विविध-पात्र-गति)—
वणिक् तथा मन्त्रिगण की गति—
वणिजां सचिवानाञ्च१ गतिः कार्या स्वभावजा ॥ ७६ ॥
अतिक्रान्तैः पदैर्विप्रा द्वितालान्तरगामिभिः ।
कृत्वा नाभितटे हस्तमुत्तानं३ खटकामुखम् ॥ ७७ ॥
आद्यं चारालमुत्तानं कुर्यात्४ पार्श्वे तथान्तरे ।
न निष्पण्णं न च स्तब्धं नै५ चापि परिवाहितम् ॥ ७८ ॥
कृत्वा गात्रं तथा६ गच्छेत्तेन चैव क्रमेण तु ।
वणिक् तथा सचिव गण की गति उनकी प्रकृति के अनुकूल
रखनी चाहिए (अर्थात् यह मध्यमगति में रहना चाहिए। क्योंकि
ये मध्यमपात्र हैं) इन्हें 'अतिक्रान्ताचारी' में दो ताल के प्रमाणवाली
डग भरना चाहिए। इनका बायाँ हाथ 'कटकामुख' मुद्रा में हथेली
१. ७०-७६ श्लोक के उपरान्त ना० शा० में शान्तरसगति का निरूपण नहीं
है। अभिनव गुप्त के अनुसार (तथा अन्य नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार)
शान्तरस में 'अचंचल या स्थिर गति' रहती है। जिसकी योजना स्थित-प्रज्ञ या
शांत-प्रकृति के योगी जैसे पात्र में रखनी चाहिए।
१. मन्त्रिणाञ्चैव—क०। २. अतिक्रान्तपदैः सा तु—क० ।
३. हस्तमुत्थानं—क०, हस्तं मुक्ताङ्गकटका—ख०, ग० ।
४. कुर्यात् पार्श्वस्तनान्तरे—क०, कुर्यात् पार्श्वं तदन्तरे—क०, ख० ।
५. न ततो—क०; न चैव—ग०। ६. ततो—क० ।

१४४ नाट्यशास्त्रम्
को उठी हुई रखकर नाभि पर रहे तथा दाहिना हाथ 'अराल' मुद्रा में
एक बाजू (पार्श्व) पर रखा जाए। ये अपने शरीर को स्थित, स्तब्ध या
हिलाते हुए न रखें (किन्तु वर्णित गति में ही शरीर को रखें) ॥७६-७८॥
यति, श्रमण (आदि की) गति—
यतीनां श्रमणानाञ्च ये चान्ये तपसि स्थिताः ।
तेषां कार्या गतिर्यै² तु नैष्ठिकं व्रतमास्थिताः ॥ ७९ ॥
अलोलंचक्षुश्च भवेद्युगमात्रनिरीक्षणः⁴ ।
उपस्थितस्मृतिश्चैव गात्रं सर्वं विधाय⁵ च ॥ ८० ॥
अचञ्चलमनाश्चैव यथावल्लिङ्गमाश्रितः ।
विनीतवेषश्च भवेत्काषायवसनस्तथा ॥ ८१ ॥
प्रथमं समपादेन स्थित्वा स्थानेन⁸ वै बुधः ।
हस्तञ्च चतुरङ्कृत्वो तथा चैकम्प्रसारयेत् ॥ ८२ ॥
प्रसन्नं¹¹ वदनं कृत्वा प्रयोगस्य वशानुगम् ।
अनिष्पणेन¹² गात्रेण गतिं गच्छेद्व्यतिक्रमात्¹³ ॥ ८३ ॥
उत्तमानां भवेदेषा लिङ्गिनां ये महाव्रताः ।
एभिरेव विपर्यस्तैर्गुणैरन्येषु योजयेत् ॥ ८४ ॥
तथा¹⁵ व्रतानुगावस्था अन्येषां लिङ्गिनामपि ।
विभ्रान्ता चाप्युदात्ता वा ¹⁶विभ्रान्ता निभृतापि वा ॥ ८५ ॥
शकटास्यस्थितैः पादैरतिक्रान्तैस्तथैव च ।
कार्या पाशुपतानाञ्च ¹⁷गतिरुद्धतगामिनी ॥ ८६ ॥
१. यतिनश्चाश्रमस्था ये—क०, यतीनाञ्चैव सर्वेषां—ख० ।
२. ऋषयस्तपसाञ्चैव—क० । ३. आलोलचक्षुः स्याच्चैव—क० ।
४. निरीक्षणे—क० । ५. नियम्य च—क० ।
६. तथा लिङ्गं समाश्रितः—ग० । ७. कृत्वा—ग० ।
८. स्थानेन नाट्यवित्—क० । ९. चतुरकं कृत्वा—क० ।
१०. प्रयोजनम्—ग० । ११. प्रसन्नवदनं—क० ग० ।
१२. सुनिष्पणेन—क० ।
१३. गच्छेदतिक्रमात्—क०, दतिक्रमान्—ग० । १४. लिङ्गिषु—क० ।
१५. व्रतानुगा च स्यादन्येषां लिङ्गिनां गतिः—ख०, ग० ।
१६. विभ्रान्ता विहृता तथा—क०; विभ्रान्तनिभृतापि वा—ख० ग० ।
१७. रुद्भ्रान्तगामिनी—क०; ग० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४५
यति, श्रमण, तपस्वी तथा नैष्ठिकब्रह्मचारी जैसे पात्रों की गति में
चतुर अभिनेता नेत्रों को स्थिर (अलोलचक्षु) तथा चार हाथ आगे
(सामने) की भूमि को देखते हुए रखे, वह अपना चित्त स्थिर तथा अपने
पन्थ का स्वरूप या धर्म-चिह्न धारण करे। इसका वेष विनीत तथा भगवां
कपड़े वाला (या अपने सम्प्रदायानुसार पीला, सफेद वस्त्रधारी आदि भी)
रहना चाहिए।
यह ‘समपाद’ चारी तथा समपाद स्थान में स्थित होकर दोनों हाथों
को ‘चतुर’ मुद्रा में रखकर एक को फैला दे। वह अपना मुँह प्रसन्न तथा
प्रयोग के अनुसार रखते हुए स्वाभाविक गति में ‘अतिक्रान्ता’ चारी में चले।
यह गति उत्तम यतियों की तथा महाव्रतचारी या इसी कोटि के
साधुओं आदि की होती है शेष साधुजन जो इनसे गुणों से हीन या विपरीत
लक्षण वाले हों, जो उन्मत्त, शान्त प्रकृति (उदात्त) या दयालु (निभृत)
स्वभाव के हों, या पाशुपतसम्प्रदाय के शैव संन्यासी हों तो उन्हें ‘शकटास्या’
तथा ‘अतिक्रान्ता’ चारी में उद्धत डग भरते हुए रखा जाए ॥ ७९-८६ ॥
(अन्धकार में स्थित या) अन्धे पात्र की गति—
अन्धकारेऽथ याने च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ।
भूमौ विसर्पितैः पादैर्हस्तैर्मार्गप्रदर्शिभिः ॥ ८७ ॥
अन्धेरे में चलने वाले या अन्धे पात्र की गति पैरों को पृथ्वी पर
रगड़ते हुए तथा हाथों से रास्ता टटोलते हुए रखना चाहिए ॥ ८७ ॥
रथावरोही पात्र की गति—
रथस्थस्यापि कर्तव्या गतिश्चूर्णपदैरथ ।
समपादं तथा स्थानङ्कृत्वा रथगतिं व्रजेत् ॥ ८८ ॥
धनुर्गृहीत्वा चैकेन तथा चैकेन कूबरम् ।
सूतश्चास्य भवेदेवं प्रतोदप्रग्रहाकुलः ॥ ८९ ॥
वाहनानि विचित्राणि कर्तव्यानि विभागशः ।
द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव गन्तव्यं रङ्गमण्डले ॥ ९० ॥
१. अन्धस्येव गतिं कुर्यादन्धकारेषु योगवत्—क०, अन्धयाने च—ग० ।
२. हस्तदर्शितमार्गभिः—क०; हस्तैर्मार्गप्रदर्शितैः—ग० ।
३. चूर्णपदक्रमा—क०, तूर्णपदैरथ—ख० ।
४. धनुरेकेन हस्तेन गृहीत्वान्येन सायकम्—क० ।
५. करणानि विचित्राणि—क० । ६. रङ्गमण्डलम्—क० ।
१० ना० शा० द्वि०

१४६ नाट्यशास्त्रम्
रथ पर आरोहण करने वाले पात्र की गति सामान्य डगों ( चूर्णपद )
द्वारा प्रदर्शित की जाए। वह समपादस्थान के द्वारा ( दोनों पैरों को
समान रूप से पृथ्वी पर टिकाते हुए ) रथ की गति को सूचित करे । वह
एक हाथ में धनुष तथा दूसरे में रथ का डण्डा (कूबर) सम्हाले रहे । ( इसी
प्रकार ) इसका सारथि भी चाबुक तथा लगाम के सम्हालने में व्यस्त रहे ।
इसके वाहन भी रथ की स्थिति के अनुसार विभिन्न प्रकार के स्वरूप वाले
प्रदर्शित किये जाएँ तथा वह द्रुत गति में सामान्य डगों को भरते हुए
रङ्गमञ्च पर प्रवेश करे ॥ ८८-६० ॥
विमानावरोहण गति —
विमानस्थस्य कर्तव्या ह्येषैवं स्यन्दनी गतिः ।
आरोदुमुद्वहेद्गात्रं किञ्चित्स्यादुन्मुखस्थितम् ॥ ९१ ॥
अस्यैव वैपरीत्येन कुर्याच्चाप्यवरोहणम् ।
अधोऽवलोकनैश्चैव मण्डलावर्तनेन च ॥ ९२ ॥
रथ पर चढ़ने की गति का ही विमान पर अधिरोहण करते समय भी
अनुसरण किया जाए जिसमें केवल शरीर ऊपर की ओर रखते हुए स्थित रहे
तथा अवतरण (आकाश से नीचे उतरने) की दशा में अधिरोहण के विरुद्ध
कार्यों का प्रदर्शन करे ( अर्थात् शरीर को झुकाकर नीचा मुँह किये रहे ) ॥
आकाश गति—
आकाशगमने चैव कर्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः ।
स्थानेन समपादेन तथा चूर्णपदैरपि ॥ ९३ ॥
व्योम्नश्चावतरेद्यस्तु तस्यैतां कारयेद्गतिम् ।
ऋज्वायतोन्नततनैः कुटिलावर्तितैरथ ॥ ९४ ॥
१. समपाद-स्थान में दोनों पैर पृथ्वी पर टिकाकर रथ के मार्ग पर
या रथ से चलने का अभिनय किया जाता है परन्तु कथकलि में एक पैर को
पृथ्वी पर टिका कर ही रथस्थ रथी का अभिनय करने की परम्परा है । (सम्पा०)
१. गती रथगतोपमा—क० ।
२. स्यादुन्मुखस्तथा—क०, उन्मुखस्थितः—ख० ।
३. अधोऽवलोकनेनैव—क० ।
४. कर्त्तव्यं गतिचेष्टितम्—क० । ५. पदैरथ—क० ।
६. स्तंववतरेद्यस्तु—क० । ७. रुद्धायतोन्नुतननै—ख० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १४७
आकाश-गमन — आकाशगामी पात्र की गति आकाशिकी चारियों के
प्रभूत प्रदर्शन (मण्डलावर्तन) तथा ऊँचा मुँह कर देखने के द्वारा प्रदर्शित
करे और (इसके अतिरिक्त) यह समपादस्थान में साधारण डग (चूर्णपद)
भरते हुए हो। आकाश से अवतरण करने वाले पात्र की भी इसी प्रकार
'गति' रहना चाहिए। ऐसी गति सीधे या लम्बे, ऊँचे, नीचे या तिरछे
(अव्यवस्थित) घूमते हुए डगों को भरते हुए प्रदर्शित करना चाहिए ॥
१भ्रश्यतश्च तथाकाशादपविद्ध२र्भुजा गतिः ।
विकीर्ण३वसना चैव तथा भूगतलोचना ॥ ९५ ॥
आकाशावतरण — आकाश से गिरते हुए पात्र की गति में भुजाओं को
झूले के समान डोलते हुए (अपविद्ध भुज) कपड़ों के छोर इधर-उधर
बिखराते हुए तथा दृष्टि पृथ्वी की ओर नीची रहनी चाहिएँ ॥ ९५ ॥
उन्नतप्रदेशारोहण गति —
प्रासा४दद्रुम-शैलेषु नदीनिम्नोन्नतेषु च ।
आरोहणावतरणं कार्यमर्थ५वशात्तथा ॥ ९६ ॥
प्रासादारोहणं कार्यमतिक्रान्तैः पदैरथ ।
उद्वाह्य गात्रं पादञ्च६ न्यसेत्सोपानपङ्क्तिषु ॥ ९७ ॥
७तथावतरणञ्चैव गात्रमस्यैव८ कारयेत् ।
९अतिक्रान्तेन पादेन द्वितीयेनाञ्चितेन च ॥ ९८ ॥
(नाटक में पात्रों के) प्रासाद, वृक्ष या पर्वत (अथवा किसी ऊँचे
स्थान) पर चढ़ने की या उनसे उतरने की तथा नदी, गढ़ तथा टीलों
पर से (ऊँचे-नीचे प्रदेशों पर से) चढ़ने-उतरने की आवश्यकता
१. दिव्यपात्र का पृथ्वी पर अवतरण होने पर उक्त पात्र की गति
आकाशमार्ग से विमान द्वारा या किसी दूसरे विचित्र प्रकार द्वारा भी बतलाना
चाहिए। क्योंकि ऐसे पात्रों की सभी खण्डों में स्वेच्छानुसार गति रहती है।
१. भ्रममाणस्य — क० । २. दपरुद्धभुजा गतिः — क० ।
३. वदना — क० । ४. द्रुमप्रासाद — क० ।
५. मर्थवशाद् बुधैः — क०, ख० ।
६. सोपानं निक्षिपेद् बुधः — क०, सोपाने निक्षिपेत्ररः — ग० ।
७. वतरणे चैव — क० । ८. गात्रमानम्य रेचयेत् — क०; ग० ।
९. पद्यार्धमेतत् — ख० पुस्तके प्रक्षिप्तम् ।

१४८ नाट्यशास्त्रम्
( कथावस्तु के कारण ) रहती है । प्रासाद पर चढ़ने ( के अभिनय ) में
'अतिक्रान्ता' चारी के पैरों द्वारा शरीर को उपर उठाते हुए सीढ़ी पर चढ़े
तथा प्रासाद से उतरने ( की दशा में ) में शरीर को थोड़ा झुकाते हुए एक
पैर को 'अतिक्रान्ता' चारी तथा दूसरे को 'अंचित' गति में रखते हुए
चलना चाहिए ॥ ९६-९८ ॥
प्रासादारोहणं यत्तु तदेवाद्रिषु कारयेत् ।
केवलं तच्चै² निक्षेपमङ्घ्रिपक्ष्णं भवेदथ ॥ ९९ ॥
द्रुमे चारोहणङ्कार्यमतिक्रान्तोत्थितैः³ पदैः ।
सूचीविद्धैरपक्रान्तैः पार्श्वक्रान्तैस्तथैव च ॥ १०० ॥
मैंने प्रासादारोहण में जिस 'गति' का प्रदर्शन बतलाया पर्वतारोहण में
भी वही गति रखे, केवल पर्वतारोहण की दशा में पैर के पंजों पर अंग को
ऊपर उठाए रखना ( पाठान्तर से अर्थ—मस्तक को ऊपर-नीचे उठाकर
तथा हाथ का सहारा पैर को देते हुए रखना ) चाहिए। वृक्ष पर चढ़

त्रयोदशोऽध्यायः १४९
(के अभिनय) में पानी की गहराई के अनुसार तैरने की गति रखना
चाहिए। यदि उथला (थोड़ा) जल हो तो कपड़ों को उठाते हुए तथा गहरा
होने पर शरीर को झुकाकर हाथों को हिलाते हुए (जिससे पानी काटने
का भाव या तैरने की क्रिया की अभिव्यक्ति हो) अभिनय करना चाहिए।
(तैरने का अभिनय करते समय हाथों को 'पताक' या सर्पशीर्ष मुद्रा में
रखना चाहिए) ॥ १०१-१०३ ॥
प्रसार्य बाहुमेकैकं मुहुर्वारिविकर्षणैः ॥ १०३ ॥
तिर्यक्प्रसारिता चैव ह्रियमाणा च वारिणा ।
अशोषाङ्गाकुलापूरे¹वदना गतिरिष्यते ॥ १०४ ॥
यदि नदी के बहाव को पार करने का अभिनय करना हो तो हाथों
को फैलाकर बार-बार पानी को काटने, थपथपाने तिरछा होकर हाथों
को फैलाते हुए सम्पूर्ण शरीर को तैरने में लगे हुए और मुँह को पानी भर
जाने के कारण बन्द रखते (या हिलाते हुए—पाठान्तर से अर्थ) हुए
बतलाना चाहिए ॥ १०३-१०४ ॥
नौका-यात्रा में गति—
नौस्थस्यापि प्रयोक्तव्या द्रुतै²श्चूर्णपदैर्गतिः ।
अनेनैव विधानेन कर्तव्यं गतिचेष्टितम् ॥ १०५ ॥
संज्ञामात्रेण कर्त्तव्यान्येतानि विधिपूर्वकम् ।
³कस्मान्मृत इति प्रोक्ते किं मर्तव्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १०६ ॥
अङ्कुशग्रहणाच्चाङ्गं खलीन⁵ग्रहणाद्धयम् ।
प्रग्रह⁴ग्रहणाच्चानमेवमेवापरेष्वपि ॥ १०७ ॥
नौका से यात्रा करने वाले पात्र की गति शीघ्रतापूर्वक डग भरते
हुए (द्रुतैः चूर्णपदैः) बतलाना चाहिए। इसी प्रकार विभिन्न गति तथा
क्रियाओं को प्रदर्शित करना चाहिए। ये सभी कार्य निर्दिष्ट लक्षणानुसार
इंगितों से प्रदर्शित करे। (क्योंकि ये कार्य यथार्थ में तो रहते नहीं केवल
अनुकरण भर रहता है) जैसे किसी पात्र का मरण प्रदर्शित करने पर
अभिनेता नहीं मरता (केवल मरने का अभिनय करता है।) यह
१. कुलाधूतवदना—क०।
२. द्रुतैस्तूर्णैः पदै—क०, गतिश्चूर्णपदैर्गतैः—ग०।
३. तस्मान्मृत—क०, ग०। ४. प्रग्रहग्रहणाद् रथम्—क०।
५. खलीनग्रहणादश्वम्—क०।

१५० नाट्यशास्त्रम्
उसी प्रकार सूचित हो जाता है जैसे अंकुश के हाथ में लेने पर हाथी
की, पावड़ी लगाने पर घोड़े की तथा रास लेने पर रथ की अभिव्यक्ति
होती है । ( अतएव नौका गमन अनुकरणात्मक क्रियाओं के द्वारा
अभिनीत किया१ जाए ) ॥ १०५-१०७ ॥
अश्वाधिरोहण-गति—
अश्वयाने गतिः कार्या वैशाखस्थानकेन तु ।
तथा१ चूर्णपदैश्चित्रैरुपर्युपरि-पातितैः ॥ १०८ ॥
घुड़सवारी या घोड़े पर चढ़ते हुए पात्र की गति वैशाखस्थान तथा
शीघ्रता से उठाई जाने वाली डगों ( चूर्णपदैः ) द्वारा प्रदर्शित
की जाए ॥ १०८ ॥
सर्पगति—
पन्नगानां गतिः कार्या पादैः स्वस्तिकैः२संयुतैः ।
पार्श्वक्रान्तं पदं कृत्वा३ स्वस्तिकं रेचयेदिह४ ॥ १०९ ॥
सर्पों की गति ‘स्वस्तिक’ पदों के द्वारा की जाए जिसमें पहिले
पार्श्वक्रान्ता चारी को प्रदर्शित कर फिर स्वस्तिक पदों के रेचक द्वारा
अभिनय प्रस्तुत नाट्यधर्मिता के द्वारा करना चाहिए ॥ १०९ ॥
१ नौकाभिनय के इस भाग से यह स्पष्ट हो जाता है कि सादे रंगमंच पर
कई कार्य तथा दृश्य शारीरिक अनुकरण पर ही प्रदर्शित किये जाते थे । तदनुसारी
दृश्यों से चित्रित पर्दों आदि से सुसज्जित मंच पर नहीं । आचार्य अभिनवगुप्ता-
चार्य ने चित्रपट (दृश्याङ्कित पर्दों) के बिना भी उक्त अभिनय के प्रदर्शन करने की
सहमति प्रदर्शित की है तथा चित्रपट द्वारा बतलाने का उल्लेख भी किया है ।
‘तेन चित्रपटादिवियोगेऽपि रथगमनाद्यभिनयं नायुक्तम् । सौकर्यात् तु तत्क-
रणमपि भवतीति भावः’ ॥
( अभि० Vol. II, पृ० १५४ )
१. इच्चैव—क०, तथा तूर्णंपादैश्चित्तै—ख० ।
२. संस्थितैः—क०; संज्ञितैः—ख० ।
३. पार्श्वक्रान्तक्रमं कृत्वा स्वस्तिकं योजयेत्तथा—क० ।
४ कुर्यात्—क० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १५१
विटगति—
विटस्यापि च कर्तव्या ¹गतिर्ललितविभ्रमा² ।
पादै³राकुञ्चितैः⁴ किञ्चित्तालभ्यन्तरपातितैः ॥ ११० ॥
स्वैरसौष्ठवसमायुक्तौ⁵ तथा हस्तौ⁶ पदानुगौ ।
खटकावर्धमानौ तु कृत्वा विटंगतिं⁷ व्रजेत् ॥ १११ ॥
विट¹ पात्र की गति 'ललित विलासित' होती है। विट की गति को
अभिनेता 'कुंचित' पाद को एक ताल के अन्दर से रखते हुए
'खटकावर्धमानक' हाथों तथा सौष्ठवयुक्त अंगों द्वारा पैरों की गति के
अनुसार हाथों को गतिशील हुए अभिनीत करे ॥ ११०-१११ ॥
कञ्चुकी-गति—
कञ्चुकीयस्य कर्तव्या वयोऽवस्था विशेषतः ।
अवृद्धस्य⁹ प्रयोगज्ञो गतिमेवं⁸ प्रयोजयेत् ॥ ११२ ॥
अर्द्धतालोत्थितैः पादैर्विष्कम्भैरृजुभिस्तथा¹⁰ ।
समुद्वहन्निवाङ्गानि¹¹ पङ्गुलन्न इव¹² व्रजेत् ॥ ११३ ॥
'कञ्चुकी'² (अन्तःपुर रक्षक) की गति उसकी अवस्था तथा स्थिति
१. विट—कलाविद् तथा वेशोपचार कुशल व्यक्ति जो राजा या राजपरिवार
का प्रच्छन्न सेवक (और कभी यह खलनायक का सेवक) भी होता है।
२. कञ्चुकी—कञ्चुकी का कार्य अन्तःपुर-रक्षण, कवच आदि लाना ले
जाना तथा वेत्रधारण करना होता है। कंचुकी का लक्षण भावप्रकाशन में उसके
उपर्युक्त स्वरूपानुसार प्राप्त होता है—
अकामा ब्राह्मणाश्चैव कंचुकोष्णीषवेत्रिणः ।
ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्ना कञ्चुकीया स्मृता बुधैः ॥
(भा० प्र० बड़ौदा सं० पृ० २९२)
१. गतीर्ललितविक्रमाः—क०। २. विक्रमा—ख०।
३. किञ्चिदाकुञ्चितैः पादैः—क०। ४. राकुञ्चिता—क०।
५. रङ्गसौष्ठवसंयुक्तं तथा—क०। ६. कटिस्थितौ—क०।
७. कार्या विटे गतिः—क०। ८. गतिः काञ्चुकिनी प्रोक्ता—क०।
९ वृद्धे वा मध्यमे वापि तथा चैव कनीयसि—क०।
१०. तदा—क०।
११. उद्वहन्निव गात्राणि—क; समुद्वहंस्तथाङ्गानि—ख०।
१२. व्रजन्—क०।

१५२ नाट्यशास्त्रम्
के अनुकूल रखना चाहिए। यदि कंचुकी युवक हो तो उसकी गति अर्ध
ताल पर उठने वाले सीधे पैरों से साधारण गति रखनी चाहिए। वह
अपने शरीरावयवों को कीचड़ से सने व्यक्ति की तरह बतलाते हुए
अपनी गति प्रदर्शित करे ॥ ११२-११३ ॥
अथ वृद्धस्य कर्त्तव्या गतिः कम्पितदेहिका ।
विष्कम्भनकृतप्राणा$^{१}$ मन्दोत्क्षिप्तपदक्रमा ॥ ११४ ॥
यदि वह वृद्ध हो तो शरीर को घुमाते हुए तथा धीरे-धीरे पैरों को
उठाते हुए लकड़ी पर शरीर को टिकाकर (प्रत्येक) कदम रखे ॥ ११४ ॥
कृश, व्याधिग्रस्त तथा श्रान्त गति—
कृशस्यापि हि कर्तव्या गतिर्मन्दपरिक्र॑मा$^{२}$ ।
व्याधिग्रस्ते ज्वरार्ते च तपःश्रान्ते क्षुधान्विते ॥ ११५ ॥
विष्कम्भनकृतप्राणः कृशः क्षामोदरस्तथा$^{५}$।
क्षामस्वरक॑पोलश्च दीन॑नेत्रस्तथैव च$^{६}$ ॥ ११६ ॥
शनैरुत्क्षेपणञ्चैव कर्तव्यं हस्तपादयोः$^{७}$ ।
कम्पनञ्चैव गात्राणां क्ले॑शनञ्च तथैव हि$^{८}$ ॥ ११७ ॥
कञ्चुकी का वृद्ध होना आवश्यक नहीं क्योंकि नाट्यरचनाओं में उसके दोनों
स्वरूप प्राप्त हैं। अवृद्ध कञ्चुकी का प्रतिमा, स्वप्न, वासवदत्त आदि अविमारक,
आदि में तथा वृद्ध कंचुकी का शाकुन्तलं, वेणीसंहार आदि नाटकों में उल्लेख
मिलता है। अतः वृद्धावस्था में कंचुकी—पद दिये जाने का कोई नियम नहीं है
तथा सभी नाट्यरचनाओं में सम्प्राप्त उक्तियों के आधार पर इसकी नियुक्ति
अवृद्धावस्था या वृद्धावस्था में होने की पुष्टि भी होती है।
१. विष्कम्भितगतिप्राणा—क; विष्कम्भेन कृतप्राणा—ख०; ग० ।
२. कृशाङ्गानां तु—क०; कृशस्याप्यभिनेया वै—ख०, ग० ।
३. मन्दपदक्रमा—ग० ।
४. व्याधिग्रस्तो ज्वरार्त्तश्च तपःश्रान्तः क्षुधान्वितः—क०; व्याधिस्त्रस्तस्य
च तथा तपः शान्तस्य चैव हि—ग० ।
५. विष्टम्भनगतप्राणस्तथा क्षामोदरस्तथा—क० ।
६. सन्नगात्रस्तथैव च—क० ।
७. हस्तपादसमुत्क्षेपं शनैस्तत्र प्रयोजयेत्—क० ।
८. इलथनञ्चैव योजयेत्—क० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १५३
कृशपात्र की गति धीरे-धीरे पैर उठाकर चलते हुए प्रदर्शित की जाए।
रुग्ण (व्याधिग्रस्त) ज्वरार्त, तपः क्लेशित तथा क्षुधाग्रस्त पात्र की गति में
उसे किसी लकड़ी के सहारे चलने वाला, कृशकाय, खाली पेट (या
सिकुड़े हुए पेट) वाला क्षीणस्वर, पिचके गाल तथा डबडबायी आँखोंवाला
बतलाना चाहिए। यह अपने हाथ और पैरों को धीरे-धीरे उठाता हुआ
चले। इसका शरीर घूमता हुआ तथा डग भरते समय प्रत्येक कदम
पर साँस लेता हुआ प्रदर्शित किया जाए ॥ ११५-११७ ॥
पथिक—(लम्बी यात्रा करने वाले पात्र की) गति—
दूरोऽध्वानं गतस्यापि गतिर्मन्द^२परिक्रमा।
विकू^३णनञ्च गात्रस्य जानुनोश्च विमर्दनम् ॥ ११८ ॥
यात्रा पर निकले हुए या बहुत दूर चल कर आए हुए व्यक्ति की गति
धीरे-धीरे डग भरते, शरीर को झुकाते तथा जंघाओं को दबाते हुए प्रदर्शित
करनी चाहिए ॥ ११८ ॥
स्थूल-गति—
स्थूलस्यापि हि कर्त्तव्या गतिर्द्देहानुकर्षिणी ।
स^४मुद्वहनभूयिष्ठा मन्दोत्क्षिप्तपदक्रमा ॥ ११९ ॥
विष्क^५म्भगामी च भवेन्निश्वासबहुलस्तथा ।
श्रम^६स्वेदाभिभूतश्च व्रजेच्चू^७र्णपदैस्तथा ॥ १२० ॥
स्थूल या मोटे पुरुष की गति धीरे-धीरे पैर रखकर बहुत भारी वजन
ढोने की चेष्टा करते हुए पुरुष के समान प्रदर्शित की जाए। यह चलते
समय जोरों से साँस लेता हुआ, थोड़ा सा श्रम करने पर पसीने से लथपथ
तथा सादी चाल (चूर्णपद) वाला प्रदर्शित किया जाए ॥ ११९-१२० ॥
१. प्रकर्त्तव्याध्वगस्यापि—क०, दूराध्वगस्यापि गतिः—क०; ।
२. मन्दपदक्रमा—क०, ग० ।
३. विकूणनेन वक्त्रस्य जानुनोश्च विमर्शनात्—क० ।
४. समुद्वहितगात्रा च विलम्बितपदक्रमा—क० ।
५. विष्कम्भगामिनी चैव निश्वासबहुला तथा—क० ।
६. अतिक्रान्ता च कर्त्तव्या—क० ।
७. तथा चूर्णपदैः सदा—क; व्रजेत् तूर्णपदैस्तथा—ख० ।

१५४ नाट्यशास्त्रम्
मत्त-गति—
मत्तानान्तु गतिः कार्या मदे तरुणमध्यमे ।
वामदक्षिणपादाभ्यां घूर्णमानाऽपंसर्पणैः ॥ १२१ ॥
मद्यपान में तरुण तथा मध्यम मद की अवस्था वाले पात्र की गति
बायें तथा दाहिने पैर को घुमाते या लड़खड़ाकर आगे-पीछे ले जाते हुए
चलने वाली प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ १२१ ॥
अवंकृष्टे मदे चैव ह्यनवस्थितपादिका ।
विधूर्णितशरीरा च करैः प्रस्खलितैस्तथा ॥ १२२ ॥
मद्यपान में अधम मद की अवस्था वाले पात्र की गति पैरों को पृथ्वी
अनियमित तौर से रखते, शरीर को (चारों ओर) डोलाते तथा हाथों
को घुमाते हुए प्रदर्शित करना चाहिए ॥ १२२ ॥
उन्मत्त-गति—
उन्मत्तस्यापि कर्तव्या गतिस्त्वनियतक्रमा ।
बहुचारीसमायुक्ता लोकानुकरणाश्रया ॥ १२३ ॥
रूक्षस्फुटितकेशश्च रजोर्ध्वस्ततनुस्तथा ।
अनिमित्तप्रकथनो बहुभाषी विकारँवान् ॥ १२४ ॥
गायत्यकस्माद्धसति सङ्गे चापि न सज्जते ।
नृत्यत्यपि च संहृष्टो वादयत्यपि वा पुनः ॥ १२५ ॥
कदाचिद्धावति जवात् कदाचिदवतिष्ठते ।
कदाचिदुपविष्टस्तु शयानः स्यात् कदाचन ॥ १२६ ॥
१. तरुणे मध्यमे मदे; क० (भ०) मन्दे, पदे—क० ।
२. घूर्णमानोऽपसर्पणैः, घूर्णमानापसर्पणात्—क० ।
३. अवकृष्टमदे, अपकृष्टे मदे—क; आकाश स्खलितैः प्रायः पादैश्चाप्यन-
वस्थितैः—क०; अवकृष्टे पदे—ख० ।
४. प्रचलितैः—क; पदैः प्रस्खलितैरथ—ख०; ग० ।
५. गतिस्तु नियत—क०, ग०; गतिस्त्वभिनयक्रमात्—ख० ।
६. रेणुध्वस्त—क० । ७. विकारवाक्—क० ।
८. प्रगीतहसितश्चापि नानाविकृतभूषणः ।
नृत्यते गीते च वाद्ये च भाषणे च सदा रतः ॥—क० (भ०) ।
९. शयानश्च कदाचन—क०; शयितः स्यात् कदाचन—ग० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १५५
नानाचीरधरश्चैव रथ्यास्वनियतालयः ।
उन्मत्तो भवति ह्येवं¹ तस्यैतां²ङ्कारयेद् गतिम् ॥ १२७ ॥
स्थित्वा नूपुरपादेन दण्डपादं प्रसारयेत् ।
बद्धां³चारीन्तथा चैवङ्कृत्वा स्वस्तिकमेव च ॥ १२८ ॥
अनेन चारीयोगेन परिभ्राम्यं⁴तु मण्डलम् ।
बाह्यं⁵भ्रमरकञ्चैव रङ्गकोणे प्रसारयेत् ॥ १२९ ॥
त्रिकं सु⁶र्वलितङ्कृत्वा लताख्यं हस्तमेव च ।
विपर्ययगतैर्हस्तैः पद्भ्यां⁷ सह गतिर्भवेत् ॥ १३० ॥
उन्मत्त (पागल) पात्र की गति में पैरों को अनियन्त्रित दशा में
(रखते हुए) लोक क्रियाओं के अनुकरण पर अनेक चारी को प्रदर्शित करते
हुए रखना चाहिए। इस पात्र के बाल रूखे तथा बढ़े हुए, तथा शरीर
धूल से सना हुआ होता है। अकारण ही यह बोलने तथा अप्राकृतिक
प्रकार से चिल्लानेवाला होता है। यह कभी गाता और कभी हँसता है।
इसे किसी का साथ नहीं सुहाता । (तथा बार-बार रोता है—पाठान्तर से
अर्थ) । यह कभी प्रसन्न होकर नाचता है, कभी कुछ बजाने लगता है।
कभी जोर से दौड़ता, कभी ठहर जाता है। कभी बैठा रहता तथा कभी
लेट जाता है। यह अनेक वस्त्र पहिने हुए रहता है। उन्मत्त पात्र का यही
स्वरूप होता है। इसकी गति निम्न विधि के अनुसार रहे—जिसमें सर्वप्रथम
यह 'नूपुरपाद' पैर में स्थित होकर फिर उसे 'दण्डपादा' दशा में फैला दे
फिर 'बद्धा' चारी को प्रदर्शित कर पैरों को 'स्वस्तिक' दशा में रखे। इसी
प्रकार चारों दिशाओं में घूमकर 'मण्डल' बनाकर अभिनय करे (अर्थात्
एक चक्करदार घुमाव ले ले) और फिर पीठ को चारों ओर घुमाते हुए लता
हस्तों का अव्यवस्थित रूप में पैरों की गति के साथ हाथों को हिलाते
हुए प्रदर्शन करे ॥ १२३-१३० ॥
१. उन्मत्ताभिनयस्त्वेवं तस्येमां कारयेद् गतिम्—क० ।
२. तस्य तां कारयेद्—क० ।
३. कृत्वा चारीं तथोद्धामथ स्वस्तिकमेव च—क० ।
४. परिक्रम्य चतुर्दिशम्—ग० ।
५. वक्रन्तु भ्रमणञ्चैव रङ्गकोणेषु योजयेत्—क० ।
६. सल्लितं—क; सुललितं—ग० । ७. पादैहंसगतिं व्रजेत्—क० ।

१५६ नाट्यशास्त्रम्
खंज ( लँगड़ा ), पंगु ( लूला ) तथा वामन ( बौने ) पात्रों की गति-
त्रिविधौ १ तु गतिः कार्या खञ्जपङ्गु३कवामनैः ।
विकं२लाङ्गप्रयोगेण कुहँ३काभिनयं प्रति ॥ १३१ ॥
एकैः४ खञ्जगतौ नित्यं५ स्तब्धो वै चरणो भवेत् ।
तथा द्वितीयः कार्यस्तु पादोऽग्रतलसञ्चरः ॥ १३२ ॥
स्तब्धेनो६त्थापनं कार्यमङ्गस्य चरणेन तु ।
गमनेनै७ निष्षण्णः स्यादन्येनै चरणेन तु ॥ १३३ ॥
इतरेण निषीदेच्च क्रमेणानेन वै व्रजेत् ।
एषा१० खञ्जगतिः कार्या तलशल्यक्षतेषु च ॥ १३४ ॥
अवयवों की विकलता ( कमी या दोष ) के द्वारा हास्य उत्पन्न करने
के लिए लँगड़े, लूले तथा बौने पात्र की गति तीन प्रकार ( की स्थितियों
वाली ) रखी जाती है । (प्रथम प्रकार की दशा में) लँगड़े पुरुष की गति में
एक पैर स्तब्ध रहता है । (दूसरे प्रकार की स्थिति में) दूसरे पैर को 'अग्रत-
लसंचर' कर उससे डग भरी जाए तथा स्तब्ध पैर पर शरीर का भार रहे ।
(तीसरी बार की स्थिति में) शरीर को उसी के सहारे आगे बढ़ाते हुए दूसरे
पैर से बैठा या चला जाए । लँगड़े पात्र के चलने-बैठने में यही क्रम रखा
जाए । किसी पात्र के पैर तले चोट, कील या काँटा लगने पर भी इसी
गति का प्रदर्शन करना चाहिए ॥ १३१-१३४ ॥
११ पादेनाग्रतलस्थेन १२ गतिः कार्याऽञ्चितेन तु ।
१३ निष्षण्णदेहा पङ्गोस्तु नतजङ्घा तथैव च ॥ १३५ ॥
१ हासे त्वथगतिः कार्या तथा खञ्जनवामने—क० (भ); विविधानुगतिः—क० ।
२. द्विकलाधंप्रयोगेषु—क० । ३. कुहना—क० ।
४. खञ्जे गतिस्तु कर्त्तव्या स्तब्धैकचरणाश्रया—क० ।
५. नित्यः स्तब्धो—क० । ६. नोन्नमनं—क०; नोद्वाहनं—ख ।
७. गमने च निष्षण्णः—क० । ८. विषण्णः—ग० ।
९. दन्यो न चरणेन तु—ग० ।
१०. एष खञ्जप्रयोगेषु तलशल्यक्षते तथा—क० ।
११. पादेनाग्रतलेनाथ—क० । १२. अञ्चितेन व्रजेत्तथा—ग० ।
१३. निष्षण्णदेहा कर्त्तव्या—क० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १५७
सर्वसङ्कुचिताङ्गा¹ च वामने गतिरिष्यते ।
न तस्य² विक्रमः कार्यों विक्षेपश्चरणस्य च ॥ १३६ ॥
सोद्वाहिता³ चूर्णपदे सा कार्या कुहकात्मिका ।
पंगु पात्र की गति 'अग्रतलसंचर' तथा अंचितपाद कर बैठे हुए तथा
जंघा को मोड़कर चलते हुए बतलाई जाती है ।
वामन (बौने) पात्र की गति में सारे अंग सिकुड़े हुए रखते हैं,
पैर शीघ्रता से बड़ी डग नहीं भर पाते तथा जोर से पृथ्वी पर पटके नहीं
जाते । यह साधारण चाल में उचक कर चलते हुए दर्शकों को हँसाता है ॥
विदूषक गति—
विदूषकस्यापि गतिर्हास्यत्रयविभूषिता⁴ ॥ १३७ ॥
अङ्गै⁵काव्यकृतं हास्यं हास्यं नेपथ्यजं स्मृतम् ।
दन्तुरः⁶ खलतिः कुब्जः खञ्जश्च विकृताननः ॥ १३८ ॥
यदीदृशः⁷ प्रवेशः स्यादङ्गहास्यन्तु तद्भवेत् ।
यदा तु बकवद् गच्छेदूल्लोकितविलोकितेः ॥ १३९ ॥
अत्यायतपदत्त्वाच्च⁸ अङ्गहास्यो भवेत्तु⁹ सः ।
इसी प्रकार विदूषक की गति भी (हास्य उत्पन्न करने के लिए)
साधारण प्रकार की रखना चाहिए, जिसमें तीन प्रकार के हास्य रहते
हों । ये हास्य अंगों के विकार से होने वाले, (उच्चारित वाक्यों के) शब्दों
द्वारा (काव्यकृत) होने वाले तथा वेश से (नेपथ्यजं) होने वाले होते हैं ।
इन हास्यों में यदि विदूषक भद्दे और बड़े दाँतवाला (दन्तुर), गंजा,
कुबड़ा, लँगड़ा तथा बदसूरत हो तो शरीर के द्वारा उत्पन्न हास्य होने से
ऐसा हास्य 'अंगजहास्य' कहलाता है । यदि यही ऊपर-नीचे (तथा दाँएँ-
बाँएँ) देखते हुए बगुले के समान चले और लम्बी-लम्बी डग भरे तो उसे
भी 'अंगहास्य' कहते हैं ॥ १३७-१४० ॥
१. सङ्कोचिताङ्गी च—क०; २. न तस्यातिक्रमः कार्यों—क० ।
३. उद्वाहिता चूर्णपदैः—क० । ४. समन्विता—ग० ।
५ अङ्गहास्यं कार्यहास्यं हास्यं नेपथ्यजं तथा—क०; अङ्गवाक्यकृतं
हास्यं—ग० ।
६ कुब्जः खञ्जोऽथ खलतिर्दन्तुरो विकृताननः—क० ।
७. यत्तादृशो भवेद् विप्राः अङ्गहास्यन्तु तद्भवेत्—क० ।
८. पदत्वाच्चाप्यङ्गहास्यो—क० । ९. भवेत् स तु—ग० ।

१५८ नाट्यशास्त्रम्
काव्यं¹हास्यन्तु विज्ञेयमसम्वद्धै²प्रभाषणैः ॥ १४० ॥
अनर्थकै³र्विकारैश्च तथा चाश्लीलभाषणैः ।
असम्बद्ध प्रलाप, अश्लील भाषा तथा निरर्थक शब्दों के अप्राकृतिक प्रकार
से ( विकारैः ) उच्चारण किये जाने पर 'काव्यहास्य' ( या शब्दज-हास्य )
होता है ॥ १४०-१४१ ॥
चीरचर्ममषीभस्मगैरिकाद्यै⁴स्तु मण्डितः ॥ १४१ ॥
यै⁵स्तादृशो भवेद्विप्रा हास्यो नेपथ्यजस्तु सः ।
यदि चिथड़े, चमड़े से मढ़ा तथा स्याही, राख या गेरू से रँगा हुआ
पात्र हो तो 'नेपथ्यज हास्य' कहलाता है ॥ १४१-१४२ ॥
तस्मां⁶त्तु प्रकृतिं ज्ञात्वा भावं कार्यञ्च तत्त्वतः ॥ १४२ ॥
गतिप्रचारं विभजेन्नानावस्थान्तरात्मकम् ।
अतएव प्रसंगानुसार पात्र की प्रकृति का विचार करते हुए तथा भाव
और कार्यों को समझते हुए अनेक अवस्थाओं से युक्त इन ( भावों वाली )
एक या अनेक विदूषक की गतियों को आवश्यकतानुसार प्रदर्शित करना
चाहिए ।
विदूषक की गति उसकी विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार प्रकट करनी
चाहिए या विभाजित करते हुए रखनी चाहिए ॥ १४२-१४३ ॥
स्वभावजायां विन्यस्य कुटिलं वामके करे ॥ १४३ ॥
तथा⁷ दक्षिणहस्ते च कुर्याच्चतुरकम्⁸पुनः ।
पार्श्वमेकं शिरश्चैव⁹ हस्तोऽर्थं¹⁰ चरणस्तथा ॥ १४४ ॥
पर्यायशः¹¹ ¹²सन्नमयेल्लयतालवशानुगः ।
१. वाक्यहास्यं—ग० । २. मसम्बद्धप्रभाषणात्—ग० ।
३. अनर्थवाक्यैर्विविधैस्तथा—क० ।
४. गैरिकादिविभूषणैः—क०; गैरिकाद्यैस्तु मण्डितः—ग० ।
५. यत्तादृशो भवेद्विप्राः हास्यं नेपथ्यजं तु तत्—क० ।
६. तस्य तु प्रकृतिं ज्ञात्वा तथा भावं विचक्षणः—क० ।
७. दक्षिणञ्चैव हस्तञ्च कुर्याच्चितुरकं तथा—क० ।
८. चतुरकं ततः—ग० ।
९. शिरश्चापि—क० ।
१०. हस्तं चरणमेव च—क; करः सचरणस्तथा—ग० ।
११. पर्यायतः—क० । १२. सन्नमेत—क० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १५९
इस पात्र की स्वाभाविक अवस्था में रहने वाली 'गति' में बाएँ
हाथ में 'कुटिलक' (दण्डकाष्ठ जो टेढ़ा होता है) का धारण तथा दाहिने
हाथ से 'चतुर' मुद्रा का प्रदर्शन होता है। इसके अतिरिक्त वह अपनी
एक कोख, मस्तक तथा हाथ-पैरों को लय तथा ताल के अनुसार
झुकाता हुआ चलता है ॥ १४३-१४५ ॥
स्वभावजा तु तस्यैषा गतिरन्या विकारजा ॥ १४५ ॥
अलभ्यलाभाद्भुक्तस्य स्तब्धा तस्य गतिर्भवेत् ।
इस स्वाभाविक गति के अतिरिक्त (इसकी) दूसरी विकारज गति
भी होती है। इस गति का अलभ्य भक्ष्य (लड्डू आदि पक्वान्न) के या
मूल्यवान् वस्तु के प्राप्त होने पर स्तब्ध होकर प्रदर्शन किया जाता है ॥
दासादि गति—
कार्या चैव हि नीचानां चेटादीनां परिक्रमात् ॥ १४६ ॥
अधमा इति ये ख्याता नानाशीलाश्च ते पुनः ।
पार्श्वमेकं शिरश्चैव करैः सचरणस्तथा ॥ १४७ ॥
गतौ नमेत चेतानां दृष्टिश्श्वार्थविचारिणी ।
नीच तथा चेट आदि अनेकविध स्वभाव के अधम पात्रों को गति का
प्रदर्शन करना चाहिए। सेवकों की गति चारों ओर घूमते हुए एक
कोख, सिर, हाथ या पैर झुकते हुए और उनकी आँखें विभिन्न वस्तुओं पर
टिकने वाली (चंचल) रखना चाहिए ॥ १४६-१४८ ॥
शकारगति—
शकारस्यापि कर्तव्या गतिश्चञ्चलदेहिका ॥ १४८ ॥
वस्त्राभरणसंस्पर्शैर्मुहुर्मुहुरवेक्षितैः ।
गात्रैर्विकारविक्षिप्तैर्लम्बवस्त्रस्रजा तथा ॥ १४९ ॥
सगर्विता चूर्णपदा शकारस्य गतिर्भवेत् ।
१. स्वभावजाता—क० ।
२. लाभे तथा च भुक्तस्य तुष्टे चापि गतिर्भवेत्—क० ।
३. कार्या चैव तु हीनानां चेष्टादीनां द्विजोत्तमाः—क० ।
४. नानाशीलाः कुवृत्तयः—क० । ५. करं चरणमेव च—क० ।
६. नामयेत्तद्गतौ किञ्चित्कुजन्मा चेटसंज्ञितः—क० ।
७. वस्त्राभरणसंस्पर्श—क० । ८. वस्त्रस्रजस्तथा—ग० ।
९. चूर्णपादस्य—क; चूर्णपादा—ग० ।

१६० नाट्यशास्त्रम्
शकार की गति अहंकार पूर्ण तथा साधारण डगों ( चूर्णपाद ) वाली
होती है। यह चलते समय अपने वस्त्र तथा अलंकारों को छूता या बार-बार
कभी-कभी देखता हुआ चलता है। यह अस्वाभाविकता से अपने अंगों को
उठा कर तथा लटकने वाली अपनी माला तथा वस्त्रों को फटकारता
हुआ चलता है ॥ १४८-१५० ॥
नीचपात्र गति—
जात्यो¹ नीचेषु योक्तव्या² विलोकनपरा गतिः ॥ १५० ॥
असंस्पर्शाच्च³ लोकस्य स्वाङ्गानि विनिगूह्य च ।
नीच कुल में उत्पन्न पात्रों की गति चारों ओर आँखों को घुमाते हुए
तथा दूसरों से शरीर को सिकुड़ा कर स्पर्श न करते हुए चलने वाली
रखना चाहिए ॥ १५०-१५१ ॥
म्लेच्छ गति—
म्लेच्छानां जातयो यास्तु पुलिन्दैः⁴शबरादयः ॥ १५१ ॥
तेषां देशौनुरूपेण कार्ये गतिविचेष्टितम्⁶ ।
म्लेच्छों तथा ( इसी प्रकार ) पुलिन्ध्र, शबर आदि जातियों की गति
उनके आचार, जाति, स्वभाव तथा देश के अनुसार रखनी चाहिए ॥१५१॥
पशु-पक्षी गति—
पक्षिणां श्वापदानाञ्च पशूनाञ्च द्विजोत्तमाः ॥ १५२ ॥
स्वस्वजातिसमुत्थेन स्वभावेन⁷ गतिर्भवेत् ।
पक्षियों, हिंस्र जानवरों तथा चौपायों की गति उनकी अपनी प्रकृति
तथा चेष्टाओं के अनुसार प्रदर्शित की जाए ॥ १५२-१५३ ॥
सिंहर्क्षवानराणाञ्च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ १५३ ॥
या कृता नरसिंहेन विष्णुना प्रभविष्णुना ।
सिंह, रीछ तथा वानर जैसे पात्रों की गति को—जो भगवान् विष्णु
द्वारा नरसिंह अवतार में की गई थी—इस प्रकार प्रदर्शित करना चाहिए ॥
आलीढं⁸ स्थानकङ्कृत्वा गात्रन्तस्यैव चानुगम् ॥ १५४ ॥
जानूपरि करं ह्येकमपरं⁹ वक्षसि स्थितम् ।
१. जातिनीचेषु—क० । २. कर्त्तव्या—क० । ३. अत्यस्पर्शाच्च—ग० ।
४. पुलिन्दाद्याः द्विजोत्तमाः—क० । ५. गतिविचारेण—क०, ग० ।
६. विचेष्टितैः—क० । ७. स्वभावे प्रतियोजयेत्—क० ।
८. आलीढस्थानकं—क०, ग० । ९. चैकमपरं—ग० ।

त्रयोदशोऽध्यायः १६१
१अवलोक्य दिशः सर्वा२श्चिबुकं बाहुमस्तके ॥ १५५ ॥
गन्तव्यं विक्रमै३र्विप्राः पञ्चतालान्तरोत्थितैः ।
(इसमें) आलीढ़ स्थान को प्रदर्शित कर शरीर को उसी गति के
अनुसार रखे। एक हाथ को घुटने पर तथा दूसरे को वक्षस्थल पर रखकर
चारों ओर एक बार ठुड्डी को कन्धे पर रखते हुए तथा क्रूर दृष्टि से देखते
हुए एवं पैरों को पाँच ताल के अन्तर से रखते हुए चले ॥ १५४-१५६ ॥
नियुद्धसमये चैव रङ्गावतरणे तथा ॥ १५६ ॥
सिंहादीनां प्रयोक्तव्या गतिरेषा प्रयोक्तृभिः ।
सिंह आदि (पात्रों) की यही गति रंगमंच पर प्रवेश तथा उनके
युद्ध के समय भी प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ १५६-१५७ ॥
शेषाणामर्थयोगेन गतिं स्थानै६श्च योजयेत्७ ॥ १५७ ॥
वाहनार्थप्रयोगेषु रङ्गावतरणेषु च।
शेष प्राणियों की गति तथा स्थानों की योजना उनके मंच पर
अवतरित होने, पीठ पर किसी वस्तु के ढोने, चढ़ाने आदि अर्थों के
प्रदर्शन में उपयुक्त स्वरूप के अनुसार करनी चाहिए ॥ १५७-१५८ ॥
एवमेताः प्रयोक्तव्या नराणाङ्गतयो९ बुधैः ॥ १५८ ॥
नोक्ता१० या या मया ह्यत्र ग्राह्यास्तास्ताश्च लोकतः।
अतः परं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां गति विचेष्टितम् ॥ १५९ ॥
इस प्रकार विभिन्न प्राणियों की ये गतियाँ चतुर पात्रों द्वारा अभिनीत
की जाएँ। जिन प्राणियों की गति मेरे द्वारा इस प्रसंग में न बतलाई जा
सकी हो उन्हें स्वयं बुद्धि द्वारा लोक व्यवहार को देखते हुए प्रदर्शित किया
जाए। अब मैं स्त्रियों की गति तथा चेष्टाओं का वर्णन करता हूँ।
१. विलोलितं शिरः कृत्वा—क०।
२. दिशः कृत्वा चिबुकं—ग० घ०।
३. विक्रमैश्चैव पञ्चतालान्तरस्थितैः—क०।
४. नियुद्धे संशये चैव—क०। ५. च योक्तव्या—क०।
६. स्थानान्यपि च कारयेत्—क०। ७. स्थाने च—ग०।
८. अतः परं गजवाजिरथादींस्तु चिह्नमात्रेण कारयेदित्यधिकम्—क० पुस्तके।
९. नृणान्तु गतयो बुधैः—क०।
१०. अत्र नाभिहिता यास्तु विज्ञेया शास्त्रलोकतः—क०; नोक्ताश्च या मया
ह्यत्र ग्राह्यास्ता अपि लोकतः—ग० घ०।
११ ना० शा० द्वि०