नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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सूचीविद्धमविद्धं वा तदश्वक्रान्तमुच्यते¹ ॥ १६८ ॥
अश्वक्रान्तस्थान—यदि एक पैर उठा हुआ, दूसरा पैर 'अग्रतल' संचर
(दूसरा पैर उसके पंजे पर रखे हुए) स्थिति में सूची या आविद्धा चारी
में हो अथवा न हो तो (भी) 'अश्वक्रान्त' स्थान होता है ॥ १६८ ॥
शाखावलम्बने कार्ये² स्तबकग्रहणे तथा।
विश्रामेष्वथ³ नीचानां नारीणाञ्चार्थयोगतः⁴ ॥ १६९ ॥
योजना—इस स्थान के द्वारा वृक्ष की टहनी को छूने, गुच्छे को ग्रहण
करने, अधम पात्र के विश्राम लेने तथा स्त्रियों के किसी प्रयोजन को उसके
अर्थानुसार प्रदर्शन किया जाता है ॥ १६९ ॥
स्थानकन्तावदेव स्याद्यावच्चेष्टा प्रवर्तते।
भग्नञ्चै⁵ स्थानकं नृत्ते चारी चेत् समुपस्थिता ॥ १७० ॥
एवं स्थानविधिः कार्यः स्त्रीणां⁶ नृणामथापि च ।
पुनँश्चासां⁷ प्रवक्ष्यामि गतिं⁸ प्रकृतिसंस्थिताम् ॥ १७१ ॥
ये 'स्थान' किसी चेष्टा के प्रारंभ करने के पूर्व तक ही (केवल कुछ
क्षण तक) किसी अभिनेत्री (नर्तकी) द्वारा प्रदर्शित किये जाएँ परन्तु इसी
प्रकार 'नृत्त' में चारी का प्रदर्शन प्रारंभ करने पर 'स्थान' समाप्त कर देना
चाहिए। (अर्थात् चारी के पूर्व ही 'स्थान' का प्रदर्शन किया जाए।)
पुरुष तथा स्त्रियों के लिए 'स्थान' के ये ही नियम हैं। अब मैं स्त्रियों की उन
गतियों को बतलाता हूँ जो उनके स्वभावानुसार होती हैं ॥ १७०-१७१ ॥
युवती स्त्रीगति—
कृत्वावहित्थं स्थानन्तु वामञ्चाधोमुखं भुजम्⁹ ।
१. अस्मात् परं क पुस्तकेऽधिकं पद्यद्वयं लभ्यते । तद्यथा—
स्खलितं घूर्णितं चैव गलिताम्बरधारणम् ।
कुसुमस्तबकादानं परिरक्षणमेव च ॥
वित्रासनं सललितं तरुशाखावलम्बनम् ।
स्थानेऽस्मिन् संविधानीयं स्त्रीणामेतत् प्रयोक्तृभिः ॥ इति ।
२. कार्या—क० ।
३. विश्रान्तिषु तथैव स्यात् पादताडन एव च—क० ।
४. देवानां दाराणाञ्चात्र योगतः—ख०; ग । ५. भग्नेऽवस्थानके—क० ।
६. स्त्रीणां सम्यग् द्विजोत्तमाः—क० । ७. पुनरासां—क० ।
८. गतीस्तु प्रकृतिस्थिताः—क० । ९. करम्—ख०; ग० घ० ।