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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 668 में से

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पृष्ठ 284

त्रयोदशोऽध्यायः १७३
घुटनों को पृथ्वी पर टिका कर बैठना चाहिए। मुनिजन के दैनिक आचरण
तथा नियम आदि में भी बैठने की यही विधि रखें ॥ २०४-२०६ ॥
विभिन्न पात्रों के लिये निर्धारित आसन—
तथासनविधिः कार्यों विविधो¹ नाटकाश्रयः ॥ २०६ ॥
स्त्रीणाञ्च पुरुषाणाञ्च बोह्यश्चाभ्यन्तरस्तथा।
आभ्यन्तरस्तु नृपतेर्बाह्यो बाह्यगतस्य च ॥ २०७ ॥
नाटक में स्त्री तथा पुरुष पात्रों के लिए निर्धारित आसन विधान को
सुनिये। यह दो प्रकार का होता है—(१) आभ्यन्तर (स्वतन्त्र आसन)
तथा (२) बाह्य (सामान्यजन के हेतु) आसन-विधान। इन दोनों
आसनों में आभ्यन्तर आसन राजा से तथा बाह्य आसन सामान्यजन से
सम्बद्ध होते हैं ॥ २०६-२०७ ॥
पुरुष पात्रों के लिए निर्धारित आसन—
देवानां नृपतीनाञ्च दद्यात्³ सिंहासनं द्विजाः⁴।
पुरोधसाममात्यानां भवेद्वेत्रासनन्तथा ॥ २०८ ॥
मुण्डासनन्तु दातव्यं⁵ सेनानीयुवराजयोः।
काष्ठासनं ब्राह्मणानां कुमाराणां कुथासनम् ॥ २०९ ॥
एवं राजसभां प्राप्य कार्यस्त्ववासनजो विधिः⁶।
हे मुनियो, नाट्य प्रदर्शन में देवता तथा राजा के लिए सिंहासन,
पुरोहित तथा अमात्यों (मन्त्रियों) के लिए वेत्रासन, सेनापति तथा
युवराज के लिए मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिए काष्ठासन (चौकोर पाटला)
तथा राजकुमारों के लिए कुथासन (गलीचे सा आसन) की व्यवस्था
रहनी चाहिए। राजसभा में इन्हीं आसनों का यथायोग्य व्यक्तियों को
देने का नियम रखना चाहिए ॥ २०८ ॥
१. विविधन्नाटकाश्रयः—क०। २. बाह्योऽथाभ्यन्तरस्तथा—क०।
३. योज्यं—क०। ४. तथा—क०।
५. कर्त्तव्यं—क०। ६. अस्मादनन्तरं क० पुस्तके तु—
प्रकृतीनान्तु सर्वासां तथा ज्ञानसमुत्थितम्।
पुरुषाणां भवेदेष विधिरासनसंश्रयः॥ इति अधिकम्।